Monday, March 3, 2008

एक पल के बाद ...

एक पल के बाद दूसरा पल क्या है ?
हंसने के बाद रोना पड़े तो आश्चर्य क्या है ?
कली जो खिल रही चंपा ,चमेली बेल में
दूसरे पल टूटकर गिर जाए तो आश्चर्य क्या है ?
एक पल पहले जिसे देखा यहाँ हँसते हुए
दूसरे पल रुदन में ढल जाए तो आश्चर्य क्या है ?
इसलिए कहता हूँ कि...
पल-पल जियो यह जिन्दगी
वरना वह हाथों से निकल जाए तो आश्चर्य क्या है ?

1 comments:

अनिल रघुराज said...

एक तो आप मेरे साहित्यिक प्रेरणास्रोत मुक्तिबोध के राजनांदगांव से ताल्लुक रखते हैं, दूसरे इतनी गहरी बातें अपनी कविता में कहते हैं, फिर वरिष्ठ हैं, इसलिए आपका स्थान मेरी नज़र में गुरु जैसा है। आपके आशीर्वाद और मार्गदर्शन की अपेक्षा हमेशा रहेगी।