Friday, March 7, 2008

जीवन के गीत लिखो ...

जीवन के गीत लिखो
कितनी भी पीड़ा हो तुम हँसते मीत दिखो .

संकल्पी आंखों में सूरज के सपने हों
अंधियारी रातों में एक दीया बार दो
पलकों पर जो ठहरे आंसू उनको भी तुम
मोती सी कीमत दो थोड़ा सा प्यार दो
और नई रीत लिखो ...जीवन के गीत लिखो .

जीवन की गागर से छलक-छलक जो जाए
उस पानी की कीमत आंकना बेमानी है
और जो समा जाए गागर में सागर-सा
मीत वही पानी तो जीवन का पानी है
आज नई रीत लिखो ...जीवन के गीत लिखो ।

मुक्त गगन में उड़कर धरती पर जो आया
पंछी ने समझाया घोसला ही क्यों भाया !
छेद बड़े अन्तर में कितने भी हों लेकिन
बांसुरी से पूछो तो मन उसका क्यों गाया ?
दर्द सहो और हंसो...जीवन के गीत लिखो.

2 comments:

अजित वडनेरकर said...

आशा जगाने वाली सुंदर , प्रेरक कविता है।

anitakumar said...

अच्छी सीख डाकटर साहब