Monday, March 10, 2008

एक दीप सूरज के आगे...

लीक से हटकर अलग चाहे हुआ अपराध लेकिन
सच कहूँ सूरज के आगे दीप मैंने रख दिया है !

इन्द्रधनुषी स्वप्न का बिखराव मैंने खूब देखा
वक्त का रूठा हुआ बर्ताव मैंने खूब देखा
पर सुबह की चाह मैंने ताक पर रखना न सीखा
हर चुनौती को सहज जीवन का कडवा सच लिया है .

प्रश्नों के उत्तर नए देकर उलझना जनता हूँ
और हर उत्तर में गर्भित प्रश्न को पहचानता हूँ
जाने क्यों संसार मेरे प्रश्न पर कुछ मौन सा है
बेसबब इस मौन का हर स्वाद मैंने चख लिया है .

स्वप्न मृत होते नहीं यदि मन की आखें देख पाएं
धीरे -धीरे ही सही पर दीप की लौ मुस्कुराये
कोई मानें या न मानें ,मान दे या फेर ले मुख
लड़ सकूं हर अंधेरे से मैंने ऐसा हठ किया है ।

लीक से हटकर ......

2 comments:

anitakumar said...

बड़िया सोच, आप का ई-मेल पता कहीं नही दिखा ब्लोग पर कृप्या दें।

Sanjeet Tripathi said...

सुंदर, काश ऐसे हठी हम सब हो सकें!!
डॉक्टर साहब कृपया अपना ई मेल आई डी ब्लॉग प्रोफाईल पर या ब्लॉग पर दें जिससे कि आपसे संपर्क करना आसान हो सके!!