Thursday, March 13, 2008

मैं पतझड़ में सावन की सुरभि बिछा दूँ ...

तुम अगर रुदन को छोड़ जरा मुस्का दो
मैं पतझड़ में सावन की सुरभि बिछा दूँ ।

क्या सिंधु सुखा सकता है भानु तपन से ?
तुम चढ़े रहो शैतानों की छाती पर
क्या मृत्यु रोक पाई जीवन की धारा ?
तुम अड़े रहो बलिदानों की माटी पर
तुम वीणा के तारों पर हाथ घुमा दो
मैं कर्म क्षेत्र में गीत भैरवी गा दूँ ।

जब करुणा का सागर हिलोरें लेता है
कोई नौका तब नहीं डुबोयी जाती
मत रोओं, सहो वेदना अभी समय है
अनमोल नई गरिमा तब जोड़ी जाती
तुम बाँहों में अपनी पतवार थमा दो
मैं मंझधारों से तट पर तुम्हें बिठा दूँ ।

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