मेरे गीतों में तुम देखो शब्दों के ये दीप जलेंगे .
करुणा से नाता है इनका
चिर विश्वास सदा संगी है
दूर भ्रमों की दुनिया से ये
इनका सत भी सतरंगी है
छूकर जरा इन्हें देखो तुम ये जीने की रीत मिलेंगे .
राजमहल को छोड़ कभी ये
वन में भी जाया करते हैं
और बेर शबरी के खाकर
सच्चा सुख पाया करते हैं
इनमे रमे राम कह दूँ मैं ,ये केंवट की प्रीत मिलेंगे .
गीत मेरे दुखियों के आंसू
चुनते हैं अपनी पलकों से
मुस्कानों की नई कहानी
लिखते हैं अपने अश्कों से
पीड़ा का मंथन करते हैं ,पर ख़ुद ये नवनीत मिलेंगे .
Monday, March 10, 2008
शब्दों के ये दीप जलेंगे ...
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

2 comments:
"इनमे रमे राम कह दूँ मैं ,ये केंवट की प्रीत मिलेंगे "
वाह जैन साहेब वाह...कमाल किया है आपने इतने सुंदर शब्द और वैसे ही अद्भुत भाव....क्या कहने हैं. बधाई
नीरज
बहुत सुन्दर रचना है।
गीत मेरे दुखियों के आंसू
चुनते हैं अपनी पलकों से
मुस्कानों की नई कहानी
लिखते हैं अपने अश्कों से
पीड़ा का मंथन करते हैं ,पर ख़ुद ये नवनीत मिलेंगे .
Post a Comment