Friday, March 10, 2017

लबहिंयाँ डाले मिलें, 
ग़ालिब अरु घनश्याम 

डॉ. चन्द्रकुमार जैन 

ई उमंग,उल्लास,
प्रेम,सौहार्द की कविता रचता, 
दूरियों का दर्द मिटाता, 
अपनत्व का संगीत छेड़ता 
रंगों में जीवन की कला के चित्र उकेरता 
पर्वों का पर्व  है होली। 

क्यों न हम  होली पर पहले बिहारी के कुछ दोहों के रंग में डूब लें, फिर रच लेंगे होली पर कुछ और शब्द-रास ! तैयार हैं न आप ? अगर हाँ तो पहले गुनगुना लें कि सतसैया के नाविक के तीर वाले कविवर बिहारी फरमाते हैं -

उड़ि गुलाल घूँघर भई तनि रह्यो लाल बितान।
चौरी चारु निकुंजनमें ब्याह फाग सुखदान॥

फूलनके सिर सेहरा, फाग रंग रँगे बेस।
भाँवरही में दौड़ते, लै गति सुलभ सुदेस॥

भीण्यो केसर रंगसूँ लगे अरुन पट पीत।
डालै चाँचा चौकमें गहि बहियाँ दोउ मीत॥

रच्यौ रँगीली रैन में, होरी के बिच ब्याह।
बनी बिहारन रसमयी रसिक बिहारी नाह॥

होली शब्द होला शब्द से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है नई और अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए भगवान की पूजा। होली के त्योहार पर होलिका दहन इंगित करता है कि, जो भगवान के प्रिय लोग है उन्हे पौराणिक चरित्र प्रहलाद की तरह बचा लिया जाएगा, जबकि जो भगवान के लोगों से तंग आ चुके है उन्हे एक दिन पौराणिक चरित्र होलिका की तरह दंडित किया जाएगा ।

होली के त्यौहार को मनाने के कई कारण हैं। यह रंग, स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ, एकता और प्रेम का भव्य उत्सव है। परंपरागत रूप से, यह बुराई की सत्ता पर या बुराई पर अच्छाई की सफलता के रुप मे मनाया जाता है। यह फगवाह के रूप में नामित किया गया है, क्योंकि यह हिन्दी महीने, फाल्गुन में मनाया जाता है।

होली का त्यौहार मनाने के पीछे (भारत में पौराणिक कहानी के) कई ऐतिहासिक महत्व और किंवदंतियों रही हैं। यह कई सालों से मनाया जाने वाला, सबसे पुराने हिंदू त्यौहारों में से एक है। प्राचीन भारतीय मंदिरों की दीवारों पर होली उत्सव से संबंधित विभिन्न अवशेष पाये गये हैं। अहमदनगर चित्रों और मेवाड़ चित्रों में 16 वीं सदी के मध्यकालीन चित्रों की मौजूदा किस्में हैं जो प्राचीन समय के दौरान होली समारोह का प्रतिनिधित्व करती है।

होली का त्योहार प्रत्येक राज्य में अलग-अलग है जैसे देश के कई राज्यों में, होली महोत्सव लगातार तीन दिन के लिए मनाया जाता है जबकि,अन्य विभिन्न राज्यों में यह एक दिन का त्यौहार है। 

लोग पहला दिन होली, घर के अन्य सदस्यों पर रंग का पाउडर बरसाकर मनाते हैं। वे एक थाली में कुछ रंग का पाउडर और पानी से भरे पीतल के बर्तन डालने से समारोह शुरू करते हैं। त्यौहार का दूसरा दिन पुनो कहा गया इसका अर्थ है कि त्यौहार का मुख्य दिन, जब लोग मुहूर्त के अनुसार होलिका का अलाव जलाते है। यह प्रक्रिया बुराई के ऊपर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में होलिका और प्रहलाद के प्राचीन इतिहास के मिथक के रुप मनाया जाता है। तीसरे दिन का त्योहार पर्व कहलाता है अर्थात् त्योहार का अंतिम दिन, जब लोग अपने घरों से बाहर आते है, एक दूसरे को गले लगाते है, माथे पर गुलाल लगाते है, रंगों से खेलते है, नाचते है, गाते है, एक दूसरे से मिलते है, स्वादिष्ट व्यंजन खाते हैं और बहुत सारी गतिविधियॉ करते है। 

मनुष्य समाज में सामाजिक रूप से प्रचलित प्रत्येक पर्व की एक लम्बी ऐतिहासिक परम्परा विद्यमान है। प्राचीन भारतवर्ष ऋतु-सम्बन्धी उत्सवों को भलीभाँति मनाया करता था। ये उत्सव आज भी यथावत् या स्वरूप में हुए परिवर्तन के साथ मनाए जाते हैं। ऐसा ही एक पर्व, त्यौहार, उत्सव है- होली। होली अपने में मानव सभ्यता की कहानी के सभी रंगों को संजोए हुए है। वास्तव में होली एक अकेला पर्व न होकर एक लम्बे उत्सव के अन्तर्गत होने वाला विनोद था। कौन नहीं जनता कि ’वसन्तोत्सव’ भारत में मनाया जाने वाला बहुत प्रसिद्ध उत्सव था। इस का प्रारम्भ ‘सुवसन्तक’ पर्व से होता था, प्राचीन ग्रन्थ ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ के अनुसार इस दिन पहली बार वसन्त का पृथ्वी पर आगमन होता है। 

तो आइये होली पर कुछ लाज़वाब अंदाज़ वाले दोहों से क्यों न 'होलिया' जाएँ । पेश हैं मेरी पसंद के चुनिंदा दोहे के शब्द रंगकारों की लेखनी पर होली का गुलाल मलते हुए। ये रहे दोहे की दुनिया में होली के रंग - 

कुमार रवीन्द्र क्या खूब लिखते हैं - 

बदल गई घर-घाट की, देखो तो बू-बास।
बाँच रही हैं डालियाँ, रंगों का इतिहास॥

उमगे रँग आकाश में, धरती हुई गुलाल।
उषा सुन्दरी घाट पर, बैठी खोले बाल ॥

हुआ बावरा वक्त यह, सुन चैती के बोल।
पहली-पहली छुवन के, भेद रही रितु खोल ॥

बीते बर्फीले समय, हवा गा रही फाग।
देवा एक अनंग है- रहा देह में जाग॥

फिर भी रवीन्द्र एक सवाल भी कर रहे हैं - 

पर्व हुआ दिन, किन्तु, है, फिर भी वही सवाल।
'होरी के घर' क्यों भला, अब भी वही अकाल॥

लोकेश ‘साहिल' कुछ इस तरह निराले अंदाज़ में आपको होली की लहरों से खेलने आमंत्रित कर रहे हैं -

होली पर साजन दिखे, छूटा मन का धीर।
गोरी के मन-आँगने, उड़ने लगा अबीर॥ 

होली अब के बार की, ऐसी कर दे राम।
गलबहिंया डाले मिलें, ग़ालिब अरु घनश्याम ॥

मनसा-वाचा-कर्मणा, भूल गए सब रीत।
होली के संतूर से, गूँजे ऐसे गीत॥

इक तो वो मादक बदन, दूजे ये बौछार।
क्यों ना चलता साल भर, होली का त्यौहार॥ 

थोड़ी-थोड़ी मस्तियाँ, थोड़ा मान-गुमान।
होली पर 'साहिल' मियाँ, रखना मन का ध्यान ॥

योगराज प्रभाकर कहना चाहते हैं -

नाच उठा आकाश भी, ऐसा उड़ा अबीर।
ताज नशे में झूमता,यमुना जी के तीर ॥
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बरसाने की लाठियाँ, खाते हैं बड़भाग। 
जो पावै सौगात ये, तन मन बागो बाग़ ॥
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तन मन पे यूँ छा गई, होली की तासीर।
राँझे को रँगने चली, ले पिचकारी हीर॥ 

और ये दबंगाई तो देखिये ज़नाब - 

रंग लगावें सालियाँ, बापू भयो जवान। 
हुड़ हुड़ हुड़ करता फिरे, बन दबंग सलमान ॥

समीर लाल 'समीर' की यादें के रंग देखिये - 

होली के हुड़दंग में, नाचे पी कर भाँग।
दिन भर फिर सोते रहे, सब खूँटे पर टाँग ॥

नयन हमारे नम हुए, गाँव आ गया याद।
वो होली की मस्तियाँ,  कीचड़ वाला नाद ॥

महेन्द्र वर्मा को तो होली की मस्ती में पतझड़ की उदासी कुछ इस तरह दिखती है -

निरखत बासंती छटा, फागुन हुआ निहाल।
इतराता सा वह चला, लेकर रंग गुलाल ॥

कलियों के संकोच से, फागुन हुआ अधीर।
वन-उपवन के भाल पर, मलता गया अबीर॥ 

अमराई की छाँव में, फागुन छेड़े गीत।
बेचारे बौरा गए, गात हो गए पीत ॥

फागुन और बसंत मिल, करें हास-परिहास।
उनको हंसता देखकर, पतझर हुआ उदास ॥

और लीजिये, मयंक अवस्थी का होलियाना ऐलान है कि - 

आज अबीर-गुलाल में, हुई मनोरम जंग।
इन्द्रधनुष सा हो गया, युद्धक्षेत्र का रंग ॥
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राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़ )
मो.9301054300 
नानाजी देशमुख : 'समाजशिल्पी दंपत्ति' के समर्थ सर्जक

डॉ. चन्द्रकुमार जैन 

मानस के राजहंस डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र हिंदी की वह विरल विभूति हैं जिनकी वाणी ग्राम्य-कुटीर से लेकर राष्ट्रपति भवन तक गूंजी। उनका एक मुक्तक है -

निश्चय समझो जो कभी तुम्हारा बाधक था
वह देख तुम्हारा तेज स्वयं साधक होगा
तुम अपने आदर्शों के आराधक हो लो
पथ स्वयं तुम्हारे पथ का आराधक होगा

इस वर्ष को दो महान विभूतियों के जन्म शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। दोनों का जन्म 1916 में हुआ था। दोनों परम राष्ट्र भक्त हुए। दोनों पर पूरे राष्ट्र को गर्व है। दोनों विभूतियों के संदेशों में राष्ट्रोदय का अद्भुत मर्म हैं। ये विभूतियाँ हैं - एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय और निश्च्छल-निर्मल समाज सचेतक नानाजी देखमुख, जिनके जीवन और दर्शन पर मिश्र जी की उक्त पंक्तियाँ अक्षरशः सटीक प्रतीत होती हैं। 

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साल 2005 में भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम चित्रकूट आए थे। यहां पर उनका समाजसेवी नानाजी देशमुख आश्रम में आना हुआ, तो वे प्रोटोकॉल तोड़कर सामान्य नागरिकों के साथ पंगत में बैठकर भोजन करने लगे. इस दौरान डॉ. कलाम काफी भावुक हो गए थे क्योंकि उन्हें अपने बचपन की याद आ गई थी। दरअसल चित्रकूट आने पर डॉ. कलाम ने जमीन पर पंगत में ही बैठकर महिला सरपंचों के साथ भोजन किया था। जबकि राष्ट्रपति होने के नाते उनकी भोजन व्यवस्था अलग थी।  तत्कालीन राष्ट्रपति कलाम ने आश्रम के आसपास के गांवों की मुकदमेबाजी से मुक्त व्यवस्था देखी तो कहा कि मुझे रामेश्वरम् में बिताए अपने बचपन की याद आ जाती है। 

उन्होंने बताया कि जब हर दिन नमाज के बाद मेरे पिताजी के पास 10-20 परिवार अपने घर और जमीन की समस्याएं लेकर आते थे। दो-तीन दिन में उन सबको मेरे पिताजी उनकी समस्याओं के बारे में सुझाव व निदान बताया करते थे। हर शुक्रवार को मेरी मां भी मुस्लिम महिलाओं की समस्याएं सुनती थीं औऱ उन्हें निपटाने में मदद करती थीं। मेरे बड़े भाई पंचायती अदालत के प्रमुख थे, लेकिन 70 के दशक के बाद मानवीय स्पर्श से गुंथी ये व्यवस्थाएं खत्म हो गईं और अब ज्यादातर झगड़े अदालतों में जाते हैं. इस परिदृश्य में चित्रकूट के आस-पास के 80 गांवों का झगड़े-मुकदमेबाजी से मुक्त होना एक आदर्श उदाहरण है। दरअसल नाना जी ऐसे ही विराट व्यक्तित्व थे। उन्हें किसी पहचान की दरकार नहीं है। उनकी विलक्षणता और समर्पित सामाजिक सरोकारों ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी है। जन-मन में एक अमिट छाप छोड़ी है। 

एक प्रखर संगठक, लोकप्रिय नेता और ग्रामोदय के प्रति समर्पित समाजसेवी के नाते नानाजी देशमुख अगाध प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं। राजनीति से संन्यास लेने के बाद उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सुदूर ग्रामीण इलाकों और ग्रामीणों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। भोले भले ग्राम्य जनों में नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का संचार करने का बीड़ा उठाया। ग्रामोदय से भारत के भाग्योदय का सपना देखा। उसे धरातल पर उतार लेन का अभियान चलाया। अधिक उम्र को मार्ग की बढ़ा नहीं बनने दी। सेवा निवृत्त होने की उम्र में अपने जीवन के क्षण-क्षण को सेवा समृद्ध बनाने में जुटे रहे। 

सामाज योद्धा नानाजी ने पहले उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े जिले गोंडा में काम शुरू किया। फिर, सूखा पीडि़त और गरीबी से त्रस्त महाराष्ट्र के बीड जिले को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। अंत में वे उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में करीब 500 गांवों में नैतिक मूल्यों के साथ व्यापक सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए वहीं जम गए। चित्रकूट परियोजना संस्थागत विकास और ग्रामीण विकास के एक मॉडल के रूप में अनोखा प्रयास है। इसमें ऐसे विकास पर जोर दिया गया है, जो भारत के लिए सबसे उपयुक्त है। वह जनता की शक्ति पर आश्रित है। उन्होंने सिखाया कि  शोषितों और उपेक्षितों के साथ एक रूप होकर ही प्रशासन और राजकाज का गुर सीखा जा सकता है। यह भी कि युवा पीढ़ी में सामाज निर्माण की चेतना जगाना अनिवार्य है। 

चित्रकूट परियोजना चित्रकूट के आसपास के पांच गांवों के समूह बनाकर सौ गांव समूहों को विकसित करने के लिए तैयार की गई। चित्रकूट परियोजना आत्मनिर्भरता की मिसाल है। इसके तहत गांव के हर व्यक्ति, परिवार और समाज के जीवन के हर पहलू पर गौर किया जाता है। इस मुहिम की कुंजी है समाज शिल्पी दंपती। ये दंपती गांव के ही होते हैं और पांच गांवों के समूह में प्ररेणा देने की जिम्मेदारी निभाते हैं। सबसे पहले इनकी आय वृद्घि पर विचार किया जाता है। इसके लिए जरूरत के मुताबिक जल संचयन और मृदा प्रबंधन की तकनीक अपनाई जाती है। साथ-साथ उद्यम कौशल और स्व-सहायता समूह के जरिए आय बढ़ाने के उपाय अलग होते हैं और ये सभी उपक्रम जुड़े होते हैं। (1) कोई बेकार न रहे (2) कोई गरीब न रहे (3) कोई बीमार न रहे (4) कोई अशिक्षित न रहे (5) हरा-भरा और विवादमुक्त गांव हो। ग्राम विकास की इस नवरचना का आधार है समाजशिल्पी दम्पत्ति, जो पांच वर्ष तक गांव में रहकर इस पांच सूत्रीय लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम करते हैं।

ग्रामोदय से राष्ट्रोदय के अभिनव प्रयोग के लिए नानाजी ने 1996 में स्नातक युवा दम्पत्तियों से पांच वर्ष का समय देने का आह्वान किया। पति-पत्नी दोनों कम से कम स्नातक हों, आयु 35 वर्ष से कम हो तथा दो से अधिक बच्चे न हों। इस आह्वान पर दूर-दूर के प्रदेशों से प्रतिवर्ष ऐसे दम्पत्ति चित्रकूट पहुंचने लगे। चयनित दम्पत्तियों को 15-20 दिन का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान नानाजी का मार्गदर्शन मिलता है। नानाजी उनसे कहते हैं- "राजा की बेटी सीता उस समय की परिस्थितियों में इस क्षेत्र में 11 वर्ष तक रह सकती है, तो आज इतने प्रकार के संसाधनों के सहारे तुम पांच वर्ष क्यों नहीं रह सकतीं?" ये शब्द सुनकर नवदाम्पत्य में बंधी युवतियों में सेवा भाव और गहरा होता है तो कदम अपने सुनहरे शहर एवं घर की तरफ नहीं, सीता की तरह अपने पति के साथ जंगलों- पहाड़ों बीच बसे गांवों की ओर बढ़ते हैं। तब इनको नाम दिया जाता है- समाजशिल्पी दम्पत्ति। वर्तमान में 40 समाजशिल्पी दम्पत्ति यहां कार्यरत हैं।

अपनी मातृभूमि के गौरव और उसकी सेवा के लिए नानाजी ने पूरा जीवन होम कर दिया। उन्हें गाँवों की मिट्टी की सोंधी महक में सदा महसूस किया जाएगा। लोगों के हृदयों में उनका राज रहेगा। हमेशा आबाद उनका ग्रामीण समाज रहेगा। 
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प्राध्यापक, हिंदी विभाग, 
दिग्विजय कालेज, राजनांदगांव 
मो. 93010 54300 

Sunday, March 5, 2017

एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता

एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

भारत की आजादी के समय विश्व दो ध्रुवी विचारों में बंटा था पूंजीवाद और साम्यवाद। यद्यपि हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के जन-नायकों का इस विषय पर मत था कि भारत अपने पुरातन जीवन-मूल्यों से युक्त रास्ते पर चले। परंतु इसे विडंबना  हैं कि देश ऊपर लिखे दोनों विचारों के व्यामोह में फंस कर घड़ी के पेंडुलम की तरह झूलता रहा। आजादी के बाद ही प्रसिध्द चिंतक, राजनीतिज्ञ एवं समाजसेवक पं. दीनदयाल उपाध्याय ने इन दोनों विचाराें,पूंजीवाद एवं साम्यवाद के विकल्प के रूप में एकात्म मानववाद का दर्शन रखा था।उन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर जोर दिया।अब जब कि साम्यवाद ध्वस्त हो चुका है, पूंजीवाद को विखरते-टूटते हम देख ही रहे हैं, भारत एवं विश्व के समक्ष इस दर्शन की प्रासंगिकता पर नए सिरे से विचार का समय आ गया है। 

विश्व ग्राम की अजब विडम्बना 
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आज सर्वविदित है कि संचार एवं सम्पर्क की दृष्टि से विश्व एक ग्राम बनता जा रहा है, वहीं, दूसरी ओर व्यक्ति का व्यवहार एवं कार्य स्वकेन्द्रित होते जा रहे हैं. सुख की खोज में अधिक से अधिक भौतिक साधनों की प्राप्ति ही मनुष्य के जीवन का उद्देश्य बन गया है. परिणाम स्वरूप मनुष्य के व्यक्तित्व, समाज तथा सम्पूर्ण विश्व में आन्तरिक विरोधाभास दिखलाई पड़ रहा है. हमारे प्राचीन चिंतकों ने मनुष्य के आन्तरिक व्यक्तित्व के पहलुओं तथा व्यक्ति समाज एवं सृष्टि के बीच गूढ़ सम्बन्धों पर गहन चिन्तन किया. इन विचारों के आधार पर पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद के दर्शन का प्रतिपादन किया. अर्थ के एकांगी मोह में व्यर्थ हो रहे मानव जीवन को उन्होंने सही माने में समर्थ बनाने का मार्गदर्शन किया। 

आर्थिक जीवन के तीन लक्ष्य 
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पंडित दीनदयाल जी ने एक ऐसे आर्थिक विकास के प्रारूप की बात कही जो व्यक्ति के आन्तरिक व्यक्तित्व एवं परिवार, समाज तथा सृष्टि के साथ  सम्बन्धों में कोई संघर्ष उत्पन्न न करे. हमारे शास्त्रों में धर्म के साथ अर्थ को जोड़कर कामनाओं के पूर्ति की बात कही गई है, जिसका अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है. किन्तु अर्थ यानि पैसा आज जीवन का आवश्यक आधार नहीं अपितु सम्पूर्ण जीवन का लक्ष्य बन गया है. पं. दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार आर्थिक विकास के तीन लक्ष्य हैं. हमारी आर्थिक योजनाओं का प्रथम लक्ष्य राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा का सामर्थ्य उत्पन्न करना, दूसरा लक्ष्य प्रजातंत्रीय पद्धति के मार्ग में बाधक न होना और तीसरा हमारे जीवन के कुछ सांस्कृतिक मूल्य जो राष्ट्रीय जीवन के कारण, परिणाम और सूचक हैं तथा विश्व के लिये भी उपादेय हैं, उनकी रक्षा करना होना चाहिये. यदि उन्हें गवांकर कर हमने अर्थ कमाया तो वह अनर्थकारी और निरर्थक होगा. 

अधिकार का जनक है कर्तव्य 
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उल्लेखनीय है कि एकात्म मानवतावाद व्यक्ति के विभिन्न रूपों और समाज की अनेक संस्थाओं में स्थायी संघर्ष या हित विरोध नहीं मानता। यदि यह कहीं दीखता है तो वह विकृति का प्रतीक  है। वर्ग संघर्ष की कल्पना ही धोखा है। राष्ट्र के निर्माण व्यक्तियों या संस्थाओं में संघर्ष हो तो यज्ञ चलेगा कैसे? वर्ग की कल्पना ही संघर्ष की जन्मदात्री है। हम मानते हैं कि समानता न होते हुए भी एकात्मता हो सकती है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का बाल्यकाल बेहद कष्टों में गुजरा. बहुत छोटी सी उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया था. अपने प्रयासों से उन्होंने शिक्षा-दीक्षा हासिल की. बाद के समय में भारतीय विचारों से ओतप्रेत नेताओं का साथ मिला. यहीं से उनके जीवन में बदलाव आया लेकिन जो कष्ट उन्होंने बचपन में उठाये थे, उन कष्टों के चलते वे पूरी जिंदगी सादगी से जीते रहे. विद्यार्थियों के प्रति उनका विशेष अनुराग था. वे चाहते थे कि समाज में शिक्षा का अधिकाधिक प्रसार हो ताकि लोग अधिकारों के साथ कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो सकें. उन्हें इस बात का रंज रहता था कि समाज में लोग अधिकारों के प्रति तो चौंकन्ने हैं लेकिन कर्तव्य पूर्ति की भावना नगण्य हैं. उनका मानना था कि कर्तव्यपूर्ति के साथ ही अधिकार स्वयं ही मिल जाता है. 

एकात्म मानववाद का सार 
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पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि भारतवर्ष विश्व में सर्वप्रथम रहेगा तो अपनी सांस्कृतिक संस्कारों के कारण. उनके द्वारा स्थापित एकात्म मानववाद की परिभाषा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ज्यादा सामयिक है. उन्होंने कहा था कि मनुष्य का शरीर,मन, बुद्धि और आत्मा ये चारों अंग ठीक रहेंगे तभी मनुष्य को चरम सुख और वैभव की प्राप्ति हो सकती है. जब किसी मनुष्य के शरीर के किसी अंग में कांटा चुभता है तो मन को कष्ट होता है , बुद्धि हाथ को निर्देशित करती है कि तब हाथ चुभे हुए स्थान पर पल भर में पहुँच जाता है और कांटें को निकालने की चेष्टा करता है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. सामान्यत: मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन चारों की चिंता करता है. मानव की इसी स्वाभाविक प्रवृति को पं. दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद की संज्ञा दी. 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की दृष्टि को समझना और भी जरूरी हो जाता है. वे कहते हैं कि विश्व को भी यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं। अर्थ, काम और मोक्ष के विपरीत धर्म की प्रमुख भावना ने भोग के स्थान पर त्याग, अधिकार के स्थान पर कर्तव्य तथा संकुचित असहिष्णुता के स्थान पर विशाल एकात्मता प्रकट की है। पंडित जी का विश्वास अडिग है कि इनके साथ ही हम विश्व में गौरव के साथ खड़े हो सकते हैं। 
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हिन्दी विभाग, दिग्विजय कालेज,
राजनांदगांव, मो.9301054300