Saturday, April 12, 2008

दो मुक्तक.


बार कितनी प्रियजनों का साथ छूटा है
कल्पना का कलश कितनी बार फूटा है
हाथ में आई सुधा भी छीन ली जग ने
पर अटल विश्वास का धागा न टूटा है
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तिमिर घिरा है सघन व्यथा का पार नहीं है
किंतु शिथिल हो मेरे मन ने मानी हार नहीं है
प्रीत प्रगति के साथ अचंचल मेरी सदा रही है
तुम कितना भी रोको मेरा थमता प्यार नहीं है

Thursday, April 10, 2008

ख़ुद को मसीहा तो न मानें !!!


बरगद की तरह छांह जो देना नहीं जानें
तौबा करें वो ख़ुद को मसीहा तो न मानें

उठते ही नहीं जिनके क़दम मंज़िलों की ओर
बेहतर है वो चलने के ख़्वाब मन में न पालें

कोहराम मचाने से कोई फायदा नहीं
चुप रहना मुनासिब है कोई माने न माने

पिंजरे में कभी रहना वो जाने तो बताओ
कह दो उन्हें कि वक़्त के पंछी को न पालें

जो धूप में निकले ,न ही बरखा में नहाए
अच्छा है वो घर अपना कहीं और बसा लें

जो ख़ुद किसी के दिल में कभी रह नहीं सकते
वो गैर को अपने किसी सांचे में न ढालें

आओ कि तार ज़िंदगी के छेड़ लें जरा
जी लें इसे और प्यार का नगमा कोई गा लें

Wednesday, April 9, 2008

किसे घटाएँ !.....किसको जोड़ें !!

किसे घटाएँ,किसको जोड़ें

कैसे दुनिया का रुख मोड़ें

जब चलने में हर्ज़ यहाँ है

तुम्हीं बताओ कैसे दौड़े

किसे ले चलें साथ सफर में

और बताओ किसको छोड़ें

धारा के विपरीत खड़े हैं

क्यों हम धाराओं को मोड़ें

मंजिल एक दिन मिल जायेगी

मगर शिकायत करना छोड़ें

Tuesday, April 8, 2008

ग़ज़ल हो गई ....!

आँखें हुईं सजल कि ग़ज़ल हो गई समझो

आहें हुईं विरल कि ग़ज़ल हो गई समझो

सुनकर करुण पुकार मदद के लिए बढ़ीं

बाहें हुईं सबल कि ग़ज़ल हो गई समझो

Monday, April 7, 2008

दौलत की बात मत करना ......!

तुम ऐसे दौर में शोहरत की बात मत करना
नमक के पानी में शरबत की बात मत करना

ख़याल अपने ही किरदार का अगर आए
तो इस ज़माने में इज्ज़त की बात मत करना

वफ़ा की राह में चलना अगर गवारा हो
ज़माने भर की शिकायत की बात मत करना

किसी के वास्ते सब कुछ अगर लुटाना हो
तो भूल कर कभी शोहरत की बात मत करना

नज़रिया चाहे किसी का हो अपनी नज़रों से
जो चाहो देखना तोहमत की बात मत करना

जो चल सको तो चलो नेकियों की ज़ानिब तुम
ये राह प्यार की दौलत की बात मत करना

जो कर सको तो करो बन पड़े भला जो भी
भलाई छोड़ कर ज़न्नत की बात मत करना

सोचिए ज़नाब !

कितना कठिन होना है सरल सोचिए ज़नाब !
कितना कठिन होना है तरल सोचिए ज़नाब !!
बेशक अनेक हल हैं समस्या के हर मगर !
कितना कठिन है एक पहल सोचिए ज़नाब !!

समय के पाँव थमते नहीं .

रोओं मत, रात गुजरेगी प्रभात होगा
धैर्य रखो ,शांत सब झंझावात होगा
समय को समय पर गर समझ पाओ
आज दुःख तो कल सुख का साथ होगा