Sunday, June 8, 2008

छोटी सी बात ...!


जैसे धरती पर क्यारी के लिए
क्यारी में डाली के लिए
डाली में फूल के लिए
फूल में फल के लिए
होती है जगह, थोड़ी सी या बहुत
वैसे ही हर इंसान के लिए रहे
थोड़ी सी जगह, धरती पर
ताकि फल-फूल सके
संस्कृति मानवता की
और जीवित रहे एक दूसरे की
एक दूसरे को जगह देने की परम्परा...!

Saturday, June 7, 2008

सीप के मोती...!


तल्ख़ बातें हमें पसंद नहीं
जो भी पूछो वो प्यार से पूछो
- नामालूम
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ये बरगद आड़ में साए की छल करते हैं दूबों से
पता है धूप का इन पर करम होना ज़रूरी है
- जिगर श्योपुरी
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मैं देर तक तुझे ख़ुद न रोकता लेकिन
तू जिस अदा से उठा है उसी का रोना है
- फ़िराक गोरखपुरी
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चमकते लफ्ज़ सितारों से छीन लाये हैं
हम आसमां से ग़ज़ल की ज़मीन लाये हैं
- डा.राहत इन्दौरी
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सच है मेरी बात का क्या ऐतबार
सच कहूँगा झूठ मानी जायेगी
- दिल शाह्ज़हांपुरी
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लेने वाले तेरा करम होगा
मौत के बदले ज़िंदगी ले ले
- कमेश्वरदयाल 'हज़ीं'
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Thursday, June 5, 2008

एक और ग़ज़ल ...


जब बगावत ज़ुल्म से करने लगे हैं
लोग हमसे बेसबब डरने लगे हैं

सिर्फ़ जीना ही है मक़सद ज़िंदगी का
इस तरह जी-जी के हम मरने लगे हैं

कल्पना और आस्था के बीज बोकर
सेज़ पर काटों की हम चलने लगे हैं

रोशनी की चाह दिल में जब से आई
क्यों अँधेरे मेरे घर पलने लगे हैं

जो कभी उभरे थे सूरज की तरह वो
शाम जब होने लगी ढलने लगे हैं

Wednesday, June 4, 2008

चमन को बहार दे ...


हम मीर से कहते हैं तू न रोया कर


हँस-खेल के टुक चैन से भी सोया कर


- मीर तकी 'मीर'


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जब आए थे तो रोते हुए आए थे


अब जायेंगे, औरों को रुला जायेंगे


- अब्राहिम ज़ौक


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दुःख जी को पसंद आ गया है ग़ालिब


दिल रूककर बंद हो गया है ग़ालिब


- मिर्ज़ा ग़ालिब


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रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह


अटका कहीं जो आपका दिल भी मेरी तरह


- मोमिन खां 'मोमिन'


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परवरदिगार ही तो है, गुल दे कि खार दे


जी चाहे जिस तरह वो चमन को बहार दे


- हीरालाल 'फ़लक'


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आदमी हूँ गुनाह करता हूँ


इसमें ऐ रब मेरी खता क्या है


- कृष्णकुमार 'चमन'


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पंछी उड़े तो सूखे हुए पेड़ ने कहा


रुत फिर गयी तो ये भी मुझे छोड़कर चले


- नौबहार 'साबिर'


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Tuesday, June 3, 2008

चेहरों का हाल.....!


मुझसे वैसे चेहरों का हाल मत पूछो
आदमी की है दुरंगी चाल मत पूछो

बेचकर ईमान जो हैं जीतते अक़्सर
झूठ है मज़बूत उनकी ढाल मत पूछो

आईना पढ़ लेता जो चेहरा तो बात थी
है मुझे किस बात का मलाल मत पूछो

वक्त आने पर दूंगा सौ सवालों के ज़वाब
पर कभी बेवक्त तुम सवाल मत पूछो

हादसे में जो मरा वो आदमी था और क्या
हादसे पर क्यों हुआ बवाल मत पूछो

Monday, June 2, 2008

नई ताज़गी चाहिए !


ज़िन्दगी के लिए बंदगी चाहिए
है अँधेरा घना रोशनी चाहिए

तुम नहीं हो तो है ज़िन्दगी बेमज़ा
जिस तरह चाँद को चाँदनी चाहिए

सजनी हो तो साजन से क्यों दूर हो
चाँदनी को तो बस चाँद ही चाहिए

लाज की लालिमा आँखों में सपन
आरज़ू को कहो क्या नहीं चाहिए

मैं बताऊँ तुम्हें ज़िन्दगी के लिए
हर क़दम पर नई ताज़गी चाहिए

तू जो भूखा रहे मैं भी खा न सकूँ
आदमी बस रहे आदमी चाहिए

बूँद भर नर्म उजाला....!


थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें


सलीकामंद शाखों का लचक जाना ज़रूरी है


- वसीम बरेलवी


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आ गया मैं किसी जुगनू के नज़र में कैसे


बूँद भर नर्म उजाला मेरे घर में कैसे


- मुज़फ्फ़र हनफी


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ख़ुद मुसीबत में मुसीबत हर तरफ़ से घिर गई


मेरे घर आई तो लेकिन आ के पछताई बहुत


- सलीम अहमद ज़ख्मी


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हमीं को क़त्ल करते हैं,हमीं से पूछते हैं वो


शहीदे-नाज़ बतलाओ मेरी तलवार कैसी है


- नामालूम


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हाल घर का न कोई पूछने वाला आया


दोस्त भी आए तो मौसम की सुनाने आए


- नामालूम


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