आदमी चाहे तो विश्वास बदल सकता है, ये घटा और ये आकाश बदल सकता है ! आदमी ही यहाँ इतिहास लिखा करता है, आदमी चाहे तो इतिहास बदल सकता है ! ++++++=========+++++++++++++
मेरा मस्तक अपनी चरण धूलि तल में झुका दे प्रभू ! मेरे समस्त अहंकार को आँखों के पानी में डुबा दे ! अपने झूठे महत्त्व की रक्षा करते हुए मैं केवल अपनी लघुता दिखाता हूँ अपने ही को घेरे मैं घूमता-घूमता प्रतिपल मरता हूँ प्रभू मेरे समस्त अहंकार को आँखों के पानी में डुबा दे ! मात्र अपने निजी कार्यों से ही मैं अपने को प्रचारित न करुँ ! तू अपनी इच्छा मेरे जीवन के माध्यम से पूरी कर ! मैं तुझसे चरम शांति की भीख माँगता हूँ प्राणों में तेरी परम कांति हो ! मुझे ओट देता मेरे ह्रदय कमल में तू खड़ा रह ! प्रभू मेरा समस्त अहंकार मेरे आँखों के पानी में डुबा दे ! ========================== गुरुदेव की 'गीतांजलि' से सश्रद्ध.
नदी के हाथ निर्झर की मिली पाती समंदर को सतह भी आ गई गहराइयों तक तुम नहीं आए किसी को देखते ही आपका आभास होता है निगाहें आ गईं परछाइयों तक तुम नहीं आए ============================== बलबीर सिंह 'रंग'
मंज़िल-ए-ग़म से गुज़रना तो है आसां इक़बाल इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुज़र जाने का =========================== इक़बाल लबों पे उसके कोई बददुआ नहीं होती बस एक माँ है जो मुझसे खपा नहीं होती =========================== मुनव्वर राणा सपना झरना नींद का,जागी आँखें प्यास खाना,खोना,खोजना साँसों का इतिहास ============================ निदा फ़ाजली
समुन्दर इतना उबलेगा किसे मालूम था पहले किसी का दम यूँ निकलेगा किसे मालूम था पहले कभी पत्थर पिघलता था किसी की आह से घायल मगर इंसां न पिघलेगा किसे मालूम था पहले ======================= श्री आर.पी.'घायल' की रचना साभार.
रोया हूँ मैं भी किताब पढ़कर पर अब याद नहीं कौन-सी शायद वह कोई वृत्तान्त था पात्र जिसके अनेक बनते थे चारों तरफ़ से मंडराते हुए आते थे पढ़ता जाता और रोता जाता था मैं क्षण भर में सहसा पहचाना यह पढ़ता कुछ और हूँ रोता कुछ और हूँ ! लेकिन मैंने जो पढ़ा था उसे नहीं रोया था पढ़ने ने तो मुझमें रोने का बल दिया मैंने दुःख पाया था बाहर किताब के जीवन से पढ़ता जाता और रोता जाता था मैं जो पढ़ता हूँ उस पर मैं नहीं रोता हूँ बाहर किताब के जीवन से पाता हूँ रोने का कारण मैं पर किताब रोना सम्भव बनाती है। ============================ श्री रघुवीर सहाय की कविता कृतज्ञता पूर्वक.