Sunday, July 19, 2009

इतिहास बदल सकता है....!

आदमी चाहे तो विश्वास बदल सकता है,
ये घटा और ये आकाश बदल सकता है !
आदमी ही यहाँ इतिहास लिखा करता है,
आदमी चाहे तो इतिहास बदल सकता है !
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Thursday, July 16, 2009

चरण धूलि तल में.

मेरा मस्तक अपनी चरण धूलि तल में झुका दे
प्रभू ! मेरे समस्त अहंकार को
आँखों के पानी में डुबा दे !
अपने झूठे महत्त्व की रक्षा करते हुए
मैं केवल अपनी लघुता दिखाता हूँ
अपने ही को घेरे मैं
घूमता-घूमता प्रतिपल मरता हूँ
प्रभू मेरे समस्त अहंकार को
आँखों के पानी में डुबा दे !
मात्र अपने निजी कार्यों से ही
मैं अपने को प्रचारित न करुँ !
तू अपनी इच्छा मेरे जीवन के
माध्यम से पूरी कर !
मैं तुझसे चरम शांति की भीख माँगता हूँ
प्राणों में तेरी परम कांति हो !
मुझे ओट देता मेरे
ह्रदय कमल में तू खड़ा रह !
प्रभू मेरा समस्त अहंकार मेरे
आँखों के पानी में डुबा दे !
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गुरुदेव की 'गीतांजलि' से सश्रद्ध.

Tuesday, July 14, 2009

तुम नहीं आए...!

नदी के हाथ निर्झर की मिली पाती समंदर को
सतह भी आ गई गहराइयों तक तुम नहीं आए
किसी को देखते ही आपका आभास होता है
निगाहें आ गईं परछाइयों तक तुम नहीं आए
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बलबीर सिंह 'रंग'

Monday, July 13, 2009

शेर...लाज़वाब !

मंज़िल-ए-ग़म से गुज़रना तो है आसां इक़बाल
इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुज़र जाने का
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इक़बाल
लबों पे उसके कोई बददुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे खपा नहीं होती
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मुनव्वर राणा
सपना झरना नींद का,जागी आँखें प्यास
खाना,खोना,खोजना साँसों का इतिहास
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निदा फ़ाजली

Friday, June 12, 2009

किसे मालूम था पहले...!

समुन्दर इतना उबलेगा
किसे मालूम था पहले
किसी का दम यूँ निकलेगा
किसे मालूम था पहले
कभी पत्थर पिघलता था
किसी की आह से घायल
मगर इंसां न पिघलेगा
किसे मालूम था पहले
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श्री आर.पी.'घायल' की रचना साभार.

Wednesday, June 10, 2009

किताब रोना सम्भव बनाती है...!

रोया हूँ मैं भी किताब पढ़कर
पर अब याद नहीं कौन-सी
शायद वह कोई वृत्तान्त था
पात्र जिसके अनेक बनते थे
चारों तरफ़ से
मंडराते हुए आते थे
पढ़ता जाता और
रोता जाता था मैं
क्षण भर में सहसा पहचाना
यह पढ़ता कुछ और हूँ
रोता कुछ और हूँ !
लेकिन मैंने जो पढ़ा था
उसे नहीं रोया था
पढ़ने ने तो मुझमें
रोने का बल दिया
मैंने दुःख पाया था बाहर
किताब के जीवन से
पढ़ता जाता और रोता जाता था मैं
जो पढ़ता हूँ उस पर मैं नहीं रोता हूँ
बाहर किताब के जीवन से
पाता हूँ रोने का कारण मैं
पर किताब रोना सम्भव बनाती है।
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श्री रघुवीर सहाय की कविता कृतज्ञता पूर्वक.

Friday, June 5, 2009

घास मिट्टी की उजास है...!

आप पहाड़ पर हैं

तो आ जाएँ नीचे

आप ज़मीन पर हैं

तो आइये ऊँचाई पर

पहाड़ की सुगंध

क्या साथ आई है आपके ?

या आप उठा लाए हैं पहाड़ !

ज़मीन की घास पर न रखें पहाड़

उसे रहने दें यूँ ही

घास मिट्टी की उजास है

और पहाड़ नदियों का पिता।

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अनीता वर्मा की कविता साभार.