Friday, July 24, 2009

डरने से क्या हल निकलेगा ?

डरने वाले कब दुःख की
काली रातों से जूझ सके हैं

सुखी वही हो पाए मर्म

दुखों का जो भी बूझ सके हैं

इतना भी नाकाफ़ी है कि

डर मन को बरबस न सताए

डर से भी अच्छा कुछ है हम

ख़ुद से क्या यह पूछ सके हैं ?

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Thursday, July 23, 2009

एक क़तरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे...!

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्जी के मुताबिक नज़र आयें कैसे

घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएँ कैसे

कहकहा आँख का बरताव बदल देता है
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा
एक क़तरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे
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वसीम बरेलवी साहब की ग़ज़ल साभार.

Tuesday, July 21, 2009

वो बेखयाल मुसाफ़िर...!

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारों
के मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारों

वो बेखयाल मुसाफ़िर मैं रास्ता यारों
कहाँ था बस में मेरे उसको रोकना यारों

मेरे कलम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी
के अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारों

तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था
मैं उसके घर का पता किसको पूछता यारों
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वसीम बरेलवी की ग़ज़ल साभार.

Sunday, July 19, 2009

इतिहास बदल सकता है....!

आदमी चाहे तो विश्वास बदल सकता है,
ये घटा और ये आकाश बदल सकता है !
आदमी ही यहाँ इतिहास लिखा करता है,
आदमी चाहे तो इतिहास बदल सकता है !
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Thursday, July 16, 2009

चरण धूलि तल में.

मेरा मस्तक अपनी चरण धूलि तल में झुका दे
प्रभू ! मेरे समस्त अहंकार को
आँखों के पानी में डुबा दे !
अपने झूठे महत्त्व की रक्षा करते हुए
मैं केवल अपनी लघुता दिखाता हूँ
अपने ही को घेरे मैं
घूमता-घूमता प्रतिपल मरता हूँ
प्रभू मेरे समस्त अहंकार को
आँखों के पानी में डुबा दे !
मात्र अपने निजी कार्यों से ही
मैं अपने को प्रचारित न करुँ !
तू अपनी इच्छा मेरे जीवन के
माध्यम से पूरी कर !
मैं तुझसे चरम शांति की भीख माँगता हूँ
प्राणों में तेरी परम कांति हो !
मुझे ओट देता मेरे
ह्रदय कमल में तू खड़ा रह !
प्रभू मेरा समस्त अहंकार मेरे
आँखों के पानी में डुबा दे !
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गुरुदेव की 'गीतांजलि' से सश्रद्ध.

Tuesday, July 14, 2009

तुम नहीं आए...!

नदी के हाथ निर्झर की मिली पाती समंदर को
सतह भी आ गई गहराइयों तक तुम नहीं आए
किसी को देखते ही आपका आभास होता है
निगाहें आ गईं परछाइयों तक तुम नहीं आए
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बलबीर सिंह 'रंग'

Monday, July 13, 2009

शेर...लाज़वाब !

मंज़िल-ए-ग़म से गुज़रना तो है आसां इक़बाल
इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुज़र जाने का
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इक़बाल
लबों पे उसके कोई बददुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे खपा नहीं होती
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मुनव्वर राणा
सपना झरना नींद का,जागी आँखें प्यास
खाना,खोना,खोजना साँसों का इतिहास
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निदा फ़ाजली