डरने वाले कब दुःख कीकाली रातों से जूझ सके हैं
सुखी वही हो पाए मर्म
दुखों का जो भी बूझ सके हैं
इतना भी नाकाफ़ी है कि
डर मन को बरबस न सताए
डर से भी अच्छा कुछ है हम
ख़ुद से क्या यह पूछ सके हैं ?
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अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारों
मेरा मस्तक अपनी चरण धूलि तल में झुका दे
मंज़िल-ए-ग़म से गुज़रना तो है आसां इक़बाल