Friday, August 28, 2009

आशा और अभिलाषा.

आशा में ही
इस जीवन की
अभिलाषा का बीज छुपा है
दिव्य शिखर छू लिया
कि जो भी
विनत भाव से सहज झुका है।
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Tuesday, August 25, 2009

बेवफाई हर तरफ़....!

बेहयाई बेवफाई बेईमानी हर तरफ़

धीरे धीरे मर रहा आँखों का पानी हर तरफ़

फ़िर भी कुछ दिखता नहीं जबकी उजाला ख़ूब है

रौशनी सी तीरगी की तर्जुमानी हर तरफ़

मुल्क तो दिखता नहीं है मुल्क में यारों कहीं

दिख रही लेकिन है उसकी राजधानी हर तरफ़

किसको-किसको रोइएगा और क्या-क्या ढोइए

एक जैसी लानतें और लनतरानी हर तरफ़

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नूर मोहम्मद 'नूर'

Friday, August 21, 2009

ख़ुद से सही पहचान हो जाए....!

कि जिस दिन आपकी ख़ुद से सही पहचान हो जाए

उसी दिन सारी दुनिया में अलग ही शान हो जाए

ये सुख-दुःख, लाभ-हानि, कुछ नहीं बस फेर है मन का

सबब इन सब का क्या है जिस घड़ी ये ज्ञान हो जाए

फ़रक छोटे बड़े का भी बहुत तकलीफ देता है

सहज समभाव बन जाए विलग अभिमान हो जाए

जो हम सब एक हों अपना-पराया कौन रह जाए

नहीं कुछ भी कहीं अन्तर अगर संज्ञान हो जाए

जो दुनिया चल रही है तो चलाने वाला भी होगा

अगर जग के नियंता का जरा भी भान हो जाए

कोई भी कामयाबी छुप नहीं पाती छुपाने से

बिना बोले ही सत् की बात कानों कान हो जाए।

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डॉ.बी.पी.दुबे की ग़ज़ल साभार प्रस्तुत.

Monday, August 3, 2009

मीत अच्छा है.....!

दीप अच्छा है अगर जलता रहे
मीत अच्छा है अगर मिलता रहे
रास्ता तब तक दुखी होगा नहीं
एक राही हो मगर चलता रहे
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Friday, July 31, 2009

दिल को संभलने नहीं देते...!

ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते
सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते

किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल
तुम हो हमें करवट भी बदलने नहीं देते

परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले
क्यों हमको जलाते हो कि जलने नहीं देते

हैरान हूँ किस तरह करुँ अर्ज़-ए-तमन्ना
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते

दिल वो है कि फरियाद से लबरेज़ है हर वक़्त
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते
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अकबर इलाहाबादी की ग़ज़ल.

Tuesday, July 28, 2009

किताबों का सफ़र मैंने किया....!

क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया

उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफर मैंने किया

तू तो नफ़रत भी न कर पायेगा उस शिद्दत के साथ

जिस बला का प्यार तुझसे बेख़बर मैंने किया

कैसे बच्चों को बताऊँ रास्तों के पेचोख़म

ज़िंदगी भर तो किताबों का सफ़र मैंने किया

शोहरतों की नज़र कर दी शेर की मासूमियत

इस दीये की रोशनी को दर-ब-दर मैंने किया

चंद ज़ज़्बाती से रिश्तों को बचाने को वसीम

कैसा-कैसा जब्र अपने आप पर मैंने किया ===============================

वसीम बरेलवी साहब की ग़ज़ल साभार.

Monday, July 27, 2009

एक वृक्ष भी बचा रहे...!

अन्तिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ
एक वृक्ष जाएगा
अपनी गौरैयों-गिलहरियों से बिछुड़कर
साथ जाएगा एक वृक्ष
अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझसे पहले

'कितनी लकड़ी लगेगी ?'
श्मशान की टालवाला पूछेगा
गरीब से गरीब भी सात मन तो लेता ही है

लिखता हूँ अन्तिम इच्छाओं में
कि बिजली के दाह घर में हो मेरा संस्कार
ताकि मेरे बाद
एक बेटे और एक बेटी के साथ
एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में।
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कवि श्री नरेश सक्सेना की कविता साभार