आशा में हीइस जीवन की
अभिलाषा का बीज छुपा है
दिव्य शिखर छू लिया
कि जो भी
विनत भाव से सहज झुका है।
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बेहयाई बेवफाई बेईमानी हर तरफ़धीरे धीरे मर रहा आँखों का पानी हर तरफ़
फ़िर भी कुछ दिखता नहीं जबकी उजाला ख़ूब है
रौशनी सी तीरगी की तर्जुमानी हर तरफ़
मुल्क तो दिखता नहीं है मुल्क में यारों कहीं
दिख रही लेकिन है उसकी राजधानी हर तरफ़
किसको-किसको रोइएगा और क्या-क्या ढोइए
एक जैसी लानतें और लनतरानी हर तरफ़
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नूर मोहम्मद 'नूर'
कि जिस दिन आपकी ख़ुद से सही पहचान हो जाएउसी दिन सारी दुनिया में अलग ही शान हो जाए
ये सुख-दुःख, लाभ-हानि, कुछ नहीं बस फेर है मन का
सबब इन सब का क्या है जिस घड़ी ये ज्ञान हो जाए
फ़रक छोटे बड़े का भी बहुत तकलीफ देता है
सहज समभाव बन जाए विलग अभिमान हो जाए
जो हम सब एक हों अपना-पराया कौन रह जाए
नहीं कुछ भी कहीं अन्तर अगर संज्ञान हो जाए
जो दुनिया चल रही है तो चलाने वाला भी होगा
अगर जग के नियंता का जरा भी भान हो जाए
कोई भी कामयाबी छुप नहीं पाती छुपाने से
बिना बोले ही सत् की बात कानों कान हो जाए।
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डॉ.बी.पी.दुबे की ग़ज़ल साभार प्रस्तुत.
ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते
क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैंने कियाउम्र भर किस-किस के हिस्से का सफर मैंने किया
तू तो नफ़रत भी न कर पायेगा उस शिद्दत के साथ
जिस बला का प्यार तुझसे बेख़बर मैंने किया
कैसे बच्चों को बताऊँ रास्तों के पेचोख़म
ज़िंदगी भर तो किताबों का सफ़र मैंने किया
शोहरतों की नज़र कर दी शेर की मासूमियत
इस दीये की रोशनी को दर-ब-दर मैंने किया
चंद ज़ज़्बाती से रिश्तों को बचाने को वसीम
कैसा-कैसा जब्र अपने आप पर मैंने किया ===============================
वसीम बरेलवी साहब की ग़ज़ल साभार.
अन्तिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ