नहीं ज़हान तो फ़िर बागबान किसके लिएमैं ज़िंदगी की लिखूं दास्तान किसके लिए
मैं पूछता रहा हर एक बंद खिड़की से
खड़ा हुआ है ये खाली मकान किसके लिए
गरीब लोग इसे ओढ़ते-बिछाते हैं
तू ये न पूछ कि है आसमान किसके लिए
हरेक शख्स मेरा दोस्त है यहाँ लोगों
मैं सोचता हूँ कि खोलूँ दूकान किसके लिए
ये राज़ जा के बताऊंगा मैं परिंदों को
बन रहा है वो तीरों-कमान किसके लिए
ऐ चश्मदीद गवाह बस यही बता मुझको
बदल रहा है तू अपना बयान किसके लिए ===============================
ज्ञानप्रकाश विवेक की ग़ज़ल देशबंधु से साभार प्रस्तुत





