मेरे कैलेंडर की
चिड़िया का
एक पंख
रोजाना टूट जाता है
और मैं
उसे सहेज कर
डायरी में छुपा लेता हूँ
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सुरेश ऋतुपर्ण
चिड़िया का
एक पंख
रोजाना टूट जाता है
और मैं
उसे सहेज कर
डायरी में छुपा लेता हूँ
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सुरेश ऋतुपर्ण
नहीं है उसको मेरे रंजो ग़म का अंदाज़ा
नहीं ज़हान तो फ़िर बागबान किसके लिए