बस एक काम यही बार-बार करता थाभंवर के बीच से दरिया को पार करता था
उसी की पीठ पर उभरे निशान ज़ख्मों के
जो हर लड़ाई में पीछे से वार करता था
अजीब शख्स था ख़ुद अलविदा कहा, लेकिन
हरेक शाम मेरा इंतज़ार करता था
हवा ने छीन लिया अब जो धूप का जादू
नहीं तो पेड़ भी पत्तों से प्यार करता था
सुना है वक़्त ने उसको बना दिया पत्थर
जो रोज़ वक़्त को भी संगसार करता था
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माधव कौशिक की ग़ज़ल साभार प्रस्तुत.


जीने लगो तो करना

