Saturday, September 15, 2018

चिंतन 
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चिंतन का दैनिक जीवन और जीवन के विकास में बड़ा महत्त्व है। मन की गति पर नियंत्रण ही चिंतन की सही दिशा का आधार है। मन के तीन गुण होते हैं-सतोगुण, तमोगुण और रजोगुण। मन में जिस वक्त जिस गुण की प्रधानता होती है, हमारे व्यक्तित्व पर उस समय उसी तत्व की अमिट छाप परिलक्षित होती है। मन में जैैसा चिन्तन चल रहा होता है, हमारी क्रियाएं वैसी ही होती हैं। ये क्रियाएं ही हमारी आदतों का निर्माण करती हैं और आदतों के समूह से मनुष्य का स्वभाव बनता है। यह स्वभाव ही हमारे व्यक्तित्व का दर्पण है। व्यक्तित्व ही हमारे जीवन की पहचान है। 

इसी तरह शरीर को कोई नश्वर कह  ही कहे, पर नश्वर शरीर में अनश्वर का बसेरा है। शरीर को कोई चाहे माटी ही समझे, पर माटी के शरीर में ही अमृत का वास है। हम यह न भूलें कि भले ही शरीर किसी के लिए सिर्फ माटी हो, हमारे लिए तो वह मंगल कलश के समान है। बूँद का सीप तक पहुँच जाना ही उसका सौभाग्य है, उसी तरह शरीर और मन का रूपांतरण भी मनुष्य का सौभाग्य बन जाता है। हम प्रतिदिन कुछ पल विचार करें तो माटी के पुतले को भी जीवंत सिद्ध कर  सकते हैं। हम अपनी वास्तविक शक्ति को पहचानें। शरीर के धरातल पर उगते सूरज की किरणों का अनुभव करें। इस सत्य पर भरोसा रखें कि जैसा आप सोचेंगे, वैसी गति होगी। जैसी गति, वैसी प्रगति। जैसा संकल्प, वैसा कर्म और जैसा कर्म, वैसा परिणाम मिलेगा। 

दूसरी तरफ हम धयान दें कि हमारा मन अनन्त शक्ति का भण्डार है। मन एक सीढ़ी की तरह है जो हमें सफलता के शिखर पर पहुंचा सकता है और पतन के गर्त में भी पहुंचा सकती है। मन की शक्तियों को लक्ष्य पर लगाया जाए तो सफलता अवश्य मिलती है। इसलिए आवश्यकता मन को एकाग्र करने की है। 
मन की तन्मयता कल्याण का अचूक अस्त्र है। 

महात्मा गौतम बुद्घ ने अपने मन की सारी शक्तियों को करूणा पर केन्द्रित कर दिया, जबकि भगवान महावीर स्वामी ने अपने मन की सारी शक्तियों को अहिंसा पर केन्द्रित कर दिया। दोनों महात्माओं ने करूणा और अहिंसा को विस्तार दिया तथा इनका ही प्रचार-प्रसार किया और मोक्ष को प्राप्त हो गये। यह सब मन की एकाग्रत का फल है। ध्यान रहे, मन की एकाग्रता में भी पवित्रता का होना नितान्त आवश्यक है क्योंकि एकाग्र तो बगुला भी होता है किंतु उसके मन में पवित्रता नहीं होती है वह मछली को निगलने की ताक में रहता है। एकाग्रता और पवित्रता का उदाहरण देखना है तो पपीहे की देखिये, जो स्वाति नक्षत्र की बूंद के लिए ध्यानस्थ रहता है।

परन्तु मन है कि भटकने से बाज़ नहीं आता है। उसे धन चाहिए, यश चाहिए, तृप्ति चाहिए। तीनों मिल जाएँ तो भी और अधिक चाहिए। लेकिन याद रहे कि घातक न धन है, न यश, न ही काम। घातक है इनका अँधा प्रवाह, अंधी चाह और अंधा उपभोग। इन पर अंकुश लग सकता है अगर मन पर नियंत्रण हो जाए। पानी पर तैरते हुए दीप कितने प्यारे लगते हैं। भीतर के समंदर में भी न जाने कितने शुभ विचारों के नन्हें-नन्हें दीप तैर रहे हैं। जरूरत है कि हम कभी अपने भीतर भी उतर कर देखें। 

अपने दिल में डूबकर पा ले सुराज ज़िंदगी 
तू अगर मेरा नहीं बनता, न बन अपना तो बन। 

अपने मन में डूबकर जब हम देखते हैं तो पाते हैं हम वही हैं जो हमने स्वयं को बनाया है। हमें वही मिला है जो हमने कमाया है। विश्व विख्यात वौज्ञानिक आइंस्टाइन ने समय सापेक्षता का सिद्धांत दिया । उन्होंने कहा दोलन को आप जिस स्थान से छोड़ोगे दोलन लौटकर उसी स्थान पर आता है। यही दशा मानवीय व्यवहार की है अर्थात हम जैसा व्यवहार संसार के साथ करेंगे लौटकर वही व्यवहार हमारे पास आता है। यूरोप के प्रसिद्द दार्शनिक हीगल ने भी 'क्रिया से प्रतिक्रिया' का का दर्शन समझाया था। अभिप्राय यह है कि 'जैसा बोयेंगे ,वैसा ही काटेंगे । 

हम कभी न भूलें कि मानवीय व्यवहार का आधार वाणी है और वाणी का आधार मन है। मन में उठने वाली तरंगों को शब्दों का रूप वाणी ही देती है। वाणी का मूर्त रूप ही हमारा व्यवहार बनता है। भाव यह है कि जैसा मन होगा, वैसी वाणी होगी, और जैसी वाणी होगी, व्यवहार वैसा ही परिलक्षित होगा। हम विचार और मन के तिलिस्म और संबंधों को समझने का प्रयास करें। शांत मन रखकर हम हर समस्या का समाधान प्राप्त कर सकते हैं। 

हम अपने मन को इस योग्य बना लें कि वह खुद ऐलान कर दे कि निराश मत हो, जीवन में बाधाएं तो आएंगी ही। जैसे सागर के जल से लहरों को अलग नहीं किया जा सकता है, ठीक इसी प्रकार जीवन से समस्याओं को दूर नहीं किया जा सकता है। इनसे तो जूझना ही पड़ता है। पानी की तरह रास्ता ढूंढऩा पड़ता है, और यह निश्चित है कि हर समस्या का समाधान है बशर्ते कि मनुष्य हिम्मत और विवेक से काम ले। 

जीवन में छोटी अथवा बड़ी बाधा हमारे हमारी हिम्मत की परीक्षा लेने आती है। सोने को भी अग्नि में परीक्षा देनी होती है, तभी वह कुंदन बनता है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य महान तभी बनता है, जब वह बाधाओं की भट्टियों में तपता है। संसार के सभी महापुरूष अवश्य तपे हैं तभी उनका जीवन निखरा है। फूल को पत्ते कितना भी छिपा लें, उसकी खुशबू को कोई छिपा नहीं सकता। जो इरादे का धनी होता है, उसे मंजिल-ए-मकसूद से कोई रोक नहीं सकता।

जीवन का मूल्य मृत्यु से नहीं चुकता। जीवन का मूल्य जीवन से ही पूरा होता है। हम जीवन के प्रति जितने आशावान होंगे, जीवन हममें उतना ही विश्वास भरेगा। 
जीवन पेड़ से टूटे हुए पत्ते की तरह नहीं कि पवन जहां ले जाए उड़ता चले,  वह कागज की नाव भी नहीं है कि लहरें अपने साथ बहने के लिए मज़बूर कर दें।  जीवन मन की लगाम कसकर, शरीर, विचार और भाव की योग साधना का अपूर्व अवसर है। इस अवसर को कभी खोना नहीं है।  

हम जीवन पर अपनी पकड़ रहते ही तय कर लें कि हमारे लिए योग्य क्या है और अयोग्य क्या है ? हम अनुचित का चिंतन बंद कर दें। अनावश्यक को पीछे छोड़ दें। उन्हें साफ़ शब्दों में पूरी शक्ति से कह दें कि हमें उनकी कोई ज़रुरत नहीं है। फिर पूरा ध्यान अपने काम में लगाएं और काम के दौरान सिर्फ काम करें, उस पर चिंतन करके काम में बाधा पैदा न करें। परिणाम की चिंता भी छोड़ दें। अपने प्रयास पर पूरा भरोसा रखें। 

हम हमेशा याद रखें कि  जहां चाह, वहां राह। पानी को बाधा रोकती है, किंतु एक दिन वह भी आता है कि पानी बाधा के सिर के ऊपर से बहता है, बाधा का नामोनिशान मिटा देता है। फिर हम हिम्मत क्यों निराशा में मन को डुबोएँ ? 
आखिर क्यों मायूस होकर चुचाप बैठ जाएँ ? नहीं, आज और अभी उठने, चलने और आगे बढ़ने का संकल्प करें। उपनिषद के इन शब्दों को याद रखें - उतिष्ठं जाग्रत: चरैवेति-चरैवेति।

चिंतन 
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भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत गरिमामय सूत्र है - सत्यम, शिवम्, सुंदरम।  विचारों की शुद्धता के लिए इस सूत्र को अपनाना चाहिए। पैसा, प्रतिष्ठा और काम ये हमारे विचारों के स्वार्थ केंद्र हैं। सत्य, शिव और सैंदर्य, ये परमार्थ के केंद्र हैं। एक में स्वहित तो दूसे में सर्वहित समाहित है। यदि हम सत्य का चिंतन निरंतर करेंगे तो सत्य जीवन में अवतरित होने लगेगा। अगर हम शिव अर्थात कल्याण का चिंतन करेंगे तो स्वयं शिवत्व के अधिकारी बन जाएंगे। इसी तरह यदि हम सैंदर्य की उपासना करेंगे तो हमंरी चेतना भी सुन्दर होने लगेगी। बात साफ़ है कि जिसके विषय में हम सोचते हैं, उसके हम स्वामी बनते जाते हैं। 

विचारों का प्रभाव शरीर पर पड़ता है। शरीर का प्रभाव व्यवहार पर पड़ता है। हम स्मरण रखें कि सत्य सृष्टि का महानतम तत्त्व है। सत्य अमृत है, शास्वत है।  सत्य स्वयं प्रकाश है। जो अपने चिंतन और आचरण में सत्य को आत्मसात कर लेता है, सत्य उसके जीवन रथ का सारथी बन जाता है। जिससे भीतर की रौशनी प्रकट हो जाए वह शिव है। वही कल्याणप्रद है। और जिसमें कल्याण हो सबका वही सत्य है।  इसलिए कहा गया है सत्य ही शिव और शिव ही सुन्दर है। शिवत्व का सम्बन्ध हमारे जीवन से है, मन से है। शिवम् को जीवन में उतारने के लिए हम वहीं काम करें जिसमें मंगल हो, कल्याण हो, मानवता का हित हो, भलाई हो। तीसरी बात  है -  सुंदरम।  हम याद रखें कि सौंदर्य का सम्बन्ध सूरत भर से नहीं, ह्रदय से है। सौंदर्य जीवन की परिपूर्णता और उदारता का दूसरा नाम है। वह अंतरतम की सुंदरता ही है जो मनुष्य और शेष संसार के बीच समझ, सहकार, सहयोग और समन्वय का सम्बन्ध जोड़ती है। सुन्दर विचार और भाव के साथ नज़रिया भी सुन्दर हो तो सत्यम, शिवम् की साधना सफल हो जाएगी। 

हम गहराई में उतर कर देखें तो विचारों की सुंदरता व्यक्ति को सर्वांग सुन्दर बना देती है, क्योंकि तब भीतर का सौंदर्य प्रकट होता है। मिसाल के तौर पर महात्मा गांधी को ही ले लीजिए। वृद्धावस्था में भी उनमें न जाने ऐसा क्या आकर्षण था कि असंख्य लोग बरबस उनकी तरफ खिंचे चले आते थे। पता है वह क्या था ? उनकी बड़ी सोच, महान दृष्टि और उनका सुन्दर अंतस्तल। हमारे विचार हमें महान बनाते हैं। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने विचारों पर भी नज़र रहें कि वे भटक न जाएँ। कितना अच्छा हो कि हम सही सोचें, सुन्दर सोचें। सही जानें, सुन्दर जानें। सही देखें, सुन्दर देखें। सही बोलेन, सुन्दर बोलेन और सही कैन, सुन्दर करें। सही विचार तो आईने के समान होते हैं। 

मनुष्य के हर विचार का एक निश्चित मूल्य तथा प्रभाव होता है। व्यापारिक सफलता, असफलता, संपर्क में आने वाले दूसरे लोगों से मिलने वाले सुख-दुःख का आधार विचार ही माने गये हैं।  जिस मनुष्य की विचार-धारा जिस प्रकार की होती, जीवन-तरंग में मिले वैसे विचार उसके साथ मिल कर उसके मानस में जगह  बना लेते हैं। यही कारन है कि मनुष्य का समस्त जीवन उसके विचारों के साँचे में ही ढलता है। सारा जीवन आन्तरिक विचारों के अनुसार ही प्रकट होता है।  प्रकृति का यह निश्चित नियम है कि मनुष्य जैसा भीतर होता है, वैसा ही बाहर। 

विचार-सूत्र से ही सम्पूर्ण जीवन का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। विचार जितने स्पष्ट, उज्ज्वल और दिव्य होंगे, अन्तर भी उतना ही उज्ज्वल और आलोकित होग। जिस कलाकार अथवा साहित्यकार की भावनाएँ जितनी ही प्रखर और उच्चकोटि की होंगी उनकी रचना भी उतनी ही उच्च और उत्तम कोटि की होगी। यही बात एक सामने मनुष्य के जीवन पर भी लागू होती है। 
 
चिकित्सक अब धीरे-धीरे चिकित्सा में विचारों और मनोदशाओं का समावेश करने लगे हैं।  लोग अब यह बात मानने के लिए तैयार हो गये हैं कि मनुष्य के अधिकांश रोगों का कारण उसके विचारों तथा मनोदशाओं में निहित रहता है। यदि उनको बदल दिया जाये तो वे रोग बिना औषधियों के ही ठीक हो सकते हैं। वैज्ञानिक इसकी खोज, प्रयोग तथा परीक्षण में लगे हुए हैं।

बहुत बार देखने में आता है कि डाक्टर रोगी के घर जाता है, और उसे खूब अच्छी तरह देख-भाल कर चला जाता है। कोई दवा नहीं देता। तब भी रोगी अपने को दिन भर भला-चंगा अनुभव करता रहता है। इसका मनोवैज्ञानिक कारण यही होता है कि वह बुद्धिमान डाक्टर अपने साथ रोगी के लिए अनुकूल वातावरण लाता है और अपनी गतिविधि से ऐसा विश्वास छोड़ जाता है कि रोगी की दशा ठीक है, दवा देने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। इससे रोगी तथा रोगी के अभिभावकों का यह विचार दृढ़ हो जाता है कि रोग ठीक हो रहा है। विचारों का अनुकूल प्रभाव जीवन-तत्व को प्रोत्साहित करता और बीमार की तकलीफ कम हो जाती है।

विचारों के अनुसार ही मनुष्य का जीवन बनता-बिगड़ता रहता है। बहुत बार देखा जाता है कि अनेक लोग बहुत समय तक लोकप्रिय रहने के बाद बहिष्कृत हो जाया करते हैं, बहुत से दुकानदार पहले तो उन्नति करते रहते हैं, फिर बाद में उनका पतन हो जाता है। इसका मुख्य कारण यही होता है कि जिस समय जिस व्यक्ति की विचार-धारा शुद्ध, स्वच्छ तथा जनोपयोगी बनी रहती है और उसके कार्यों की प्रेरणा स्त्रोत बनी रहती है, वह लोकप्रिय बना रहता है। किन्तु जब उसकी विचार-धारा स्वार्थ, कपट अथवा छल के भावों से दूषित हो जाती है तो उसका पतन हो जाता है। अच्छा माल देकर और उचित मूल्य लेकर जो व्यवसायी अपनी नीति ईमानदारी और सहयोग की रखते हैं, वे शीघ्र ही जनता का विश्वास जीत लेते हैं, और उन्नति करते जाते हैं। पर ज्योंही उसकी विचार-धारा में गैर-ईमानदारी, शोषण और अनुचित लाभ के दोषों का समावेश हुआ नहीं कि उनका व्यापार ठप्प होने लगता है। 

जिस प्रकार उपयोगी, स्वस्थ और सात्विक विचार जीवन की सुखी व संतुष्ट बना देते हैं। उसी प्रकार क्रोध, काम और ईर्ष्या-द्वेष के विषय से भरे विचार जीवन को जीता जागता नरक बना देते हैं। स्वर्ग-नरक का निवास अन्यत्र कहीं नहीं मनुष्य की विचार-धारा में रहता है। देवताओं जैसे शुभ उपकारी विचार वाला मन की स्वर्गीय स्थिति और आसुरी विचारों वाला व्यक्ति नरक जैसी स्थिति में निवास करता है। दुःख अथवा सुख की अधिकांश परिस्थितियाँ मनुष्य की अपनी विचार-धारा पर बहुत कुछ निर्भर रहती हैं। इसलिये मनुष्य को अपनी विचार-धारा के प्रति सदा सावधान रह कर उन्हें श्रेष्ठ दिशाओं में ही प्रेरित करते रहना चाहिये।

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Thursday, September 13, 2018

आधी सदी 'अँधेरे में' ; सवाल-दर-सवाल, ज़वाब-दर-ज़वाब

आधी सदी 'अँधेरे में' ; सवाल-दर-सवाल, ज़वाब-दर-ज़वाबएक लोकतांत्रिक समाज का नागरिक होने के नाते हम नागरिक चेतना, सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों और लेखकीय दायित्व के भव्य सवालों के समक्ष खुद को पाते हैं। इसमें नागरिक कहां खड़ा है? लेखन क्या है? नागरिक चेतना और लेखन के आपसी सम्बंध क्या हैं? हमारे अपने समाज में लोकतन्त्र, लेखन और समाज के क्या रिश्ते हैं? उन्हें कैसा होना चाहिए? वैश्वीकरण के दौर में साहित्य की क्या भूमिका हो सकती है ? ऐसे सवालों से दो चार होते हुए जब हम हिन्दी की प्रगतिवादी कविता और नई कविता के मज़बूत सेतु के रूप में प्रतिष्ठित मुक्तिबोध पर एकाग्र होते हैं तब सवाल-दर-सवाल और ज़वाब-दर-ज़वाब रचनाकर्म के कई अहम पहलू खुद-ब-खुद खुलने लगते हैं, मानों एक कदम रखने पर सौ राहें फूटने लगती हैं।
गजानन माधव मुक्तिबोध’ तार सप्तक के पहले कवि थे। मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनीतिक चेतना से समृद्ध उनकी कविता पहली बार तार सप्तक के माध्यम से सामने आई। पुरानी और प्रगतिशील  कविता के बीच एक सेतु के रुप में चर्चित मुक्तिबोध कहानीकार भी थे और समीक्षक भी। नागपुर में रहकर ही उन्होंने महत्वपूर्ण काव्य रचनाओं का सृजन किया…'कोशिश कर कुछ ऐसा कहने की  जिससे क्षितिज हो सके और अधिक विस्तृत  जिससे हृदय हो सके और अधिक आलोकित', पीमेन पांचे को की यह काव्य पक्तियां गजानन माधव मुक्तिबोध के रचानाकर्म पर सटीक बैठती हैं।
हिन्दी कविता के महानतम सर्जकों में से एक गजानन माधव मुक्तिबोध के निधन के पचास साल इसी सितंबर में पूरे हो गए हैं। सितंबर उन्नीस सौ पैंसठ के नया ज्ञानोदय में कवि श्रीकांत वर्मा का एक लेख छपा था जिसमें उन्होंने कहा था ‘अप्रिय’ सत्य की रक्षा का काव्य रचने वाले कवि मुक्तिबोध को अपने जीवन में कोई लोकप्रियता नहीं मिली और आगे भी, कभी भी, शायद नहीं मिलेगी। कालांतर में श्रीकांत वर्मा की आशंका गलत साबित हुई और मुक्तिबोध निराला के बाद हिन्दी के सबसे बड़े कवि के तौर पर न केवल स्थापित हुए बल्कि आलोचकों ने उनकी कविताओं की नई-नई व्याख्याएं कर उनको हिंदी कविता की दुनिया में शीर्ष पर बैठा दिया। मुक्तिबोध की बहुचर्चित कविता 'अँधेरे में' ने भी अपनी अर्धशती पूरी कर ली है। कहना न होगा कि अँधेरे की शब्दावली में अपने आस-पास पसरे अँधेरे के अनगिन सवालों की शिनाख्त करने वाले मुक्तिबोध की बेकली को बकलम मुक्तिबोध ही समझने का इस से बेहतर अवसर संभव नहीं है। लिहाज़ा, समय आ गया है कि इस बात की ईमानदार पड़ताल की जाए कि मुक्तिबोध की रचनाओं में संघर्ष दिखाई देता है वह उनका अपना संघर्ष मात्र है या फिर पूरे मध्य वर्ग का, समूची मानवता का और हमारे मौजूदा समय का भी संघर्ष है।
प्रसिद्ध कवि आशोक वाजपेयी ठीक कहते हैं कि बड़ा लेखक वह है जिसमें हम हर बार नये अर्थ को ढूढते हैं। जो कुछ मुक्तिबोध के जमाने में अंधेरे में था, आज वही उजाले में है। वो सच आज सबके सामने है जिसको मुक्तिबोध अपने समय में महसूस करके लिख चुके थे। बात साफ़ है कि मुक्तिबोध के रचना कर्म की परिधि और उसके केंद्र दोनों में हमारे आज के दौर के सवालों की समझ और उनके ज़वाब हासिल किए जा सकते हैं। मुक्तिबोध को लक्षित-मूल्यांकित करने का क्रम अभी जारी है। छायावादी काव्यधारा में ‘निराला’ और नयी कविता में मुक्तिबोध का व्यक्तित्व अपवाद की सीमा तक विशिष्ट था, इसमें दो मत नहीं है।
स्मरण रहे कि ‘अंधंरे में’ मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता है। "यह कविता परम अभिव्यक्ति की खोज में जिस तरह की फैंटेसी बुनती है लेकिन अपने मूल में यह कविता ऐसे अंधेरे की पड़ताल करती है जो देश की आजादी के बाद की व्यवस्था का अंधेरा है, इस लोकतंत्र का अंधेरा है। ‘अंधेरे में’ पूंजी की दुनिया व रक्तपाई वर्ग द्वारा पैदा की गई क्रूर, अमानवीय व शोषण की हाहाकारी स्थितियों से साक्षात्कार करती है। यह हिन्दी कविता में ‘मील का पत्थर’ है जिसमें ‘अंधेरा’ मिथ नहीं, ऐसा यथार्थ है जिससे जूझते हुए हिन्दी कविता आगे बढ़ी है। 'अँधेरे में' के कवि की कोशिश लेखन की इस आरंभतः वर्णित 'मौत की सज़ा' को अंततः 'परम अभिव्यक्ति अनिवार्य / आत्म सम्भवा' के रूप में पहिचानता है। यहां पहुंचकर रचनात्मकता की तलाश निष्पन्न होती है, और फिर शुरू हो जाती है -
इसीलिए मैं हर गली में
और हर सड़क पर
झाँक-झाँक कर देखता हूँ हर एक चेहरा।
और यों परम अभिव्यक्ति अपने कर्ता से बड़ी हो जाती है, " मैं उसका शिष्य, वह मेरी गुरू है " 1
मुक्तिबोध की कविता जिस अंधेरे से रू ब रू है, वह इन पचास सालों में सच्चाई बनकर उभरा है। उसका विस्तार ही नहीं हुआ, वह सघन भी हुआ है। यह अकस्मात् नहीं है कि कविता के सातवें खंड में रिहाई के बाद कवि ने मठ व गढ़ को तोड़ने की बात की है। वह इसलिए कि उन्होंने इन मठों व गढ़ों को बनते और इनके अन्दर पनपते खतरनाक भविष्य को देखा। कैसे हैं ये मठ व गढ़ ? आज ये पूंजी, धर्म, वर्ण, जाति के मठ व गढ में रूपांतरित हो गये है। राजनीति सेवा नहीं, मेवा पाने का माध्यम बन गई है। बड़ी बड़ी बातें की जा रही हैं। प्रगति व विकास के दावे किये जा रहे हैं। कोई गौरवान्वित हो सकता है कि हमारी संसद अरबपतियों से रौशन है। पर हमने ईमानदारी, नैतिकता, आदर्श, भाईचारा सहित जो जीवन मूल्य निर्मित किये थे, उसमें कहां तक प्रगति की है ? अब तो इस पर बात करना भी पिछड़ापन है।
"हमारे पुराने महाकाव्य  लोक-परम्परा से चल कर अपने बाह्य रूप में विकसित होते थे ; 'अँधेरे में' , इस दृष्टि से, लोक-संदर्भों से जुड़कर अपने अर्थ में विकसनशील कविता है। 'राम की शक्ति पूजा' ( निराला ), 'प्रलय की छाया' ( प्रसाद ), 'असाध्य वीणा ' ( अज्ञेय) के साथ, यदि परम्परागत शब्दावली का प्रयोग किया जाय, तो वह महाकविता है। सम्पूर्ण जातीय विडंबनाओं का परीक्षण वह बड़े गहरे स्तर पर करती है। स्वप्न, फ़ंतासी और अतियथार्थवादी अनुभवों में घुला-मिला चलने वाला उनका कथानक -- रक्तालोक स्नात पुरुष का साक्षात्कार, कवि को दी गई मौत की सज़ा, रात का विचित्र जुलूस, मार्शल लॉ जैसा वातावरण, तिलक मूर्ति से टपकता खून, विचित्र वेश में गांधी से भेंट, भविष्य शिशु कोई कवि को सौंपा जाना और गांधी द्वारा जान शक्ति का आख्यान, कवि को पकड़कर दी गई यंत्रणा, फिर रिहाई, अभिव्यक्ति खतरों का एहसास और फिर उस परम अभिव्यक्ति की तलाश -- सांस्कृतिक पुनर्जागरण, राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन और परवर्ती जीवन का एक विराट संश्लिष्ट चित्र है, जो कविता में पहली बार, इस रूप में अंकित होता है। टिकक,गांधी और स्वयं कवि जैसे इन तीनों चरणों को मूर्तिमान करते हैं। यथार्थ का तीखा और नंगा चित्र अंकित करते कवि कहीं स्वाभाविक रूप से डरता है, पर उस भय का अतिक्रमण कर जाता है -
हाय, हाय ! मैंने उन्हें देख लिया नंगा,
इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी।
इस विचित्र और भयावह शोभा-यात्रा का वर्णन कवि बड़े तात्विक रूप में करता है - " गहन मृतात्माएँ इसी नगर की / हर रात जुलूस में चलतीं / परंतु, एक दिन में / बैठतीं हैं मिल कर करती हुईं षड्यंत्र / विभिन्न दफ्तरों - कार्यालयों, केन्द्रों में, घरों में। " इस पकड़ से कोई नहीं बचता ; जैसा कहा गया, यहाँ सम्पूर्ण जातीय राष्ट्रीय जीवन का विश्लेषण है।  और निष्कर्ष ?
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया,
ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम।"  2
कहना न होगा कि ऐसे अनेक सवाल हैं जिनके रू ब रू हमारा मौजूदा वक्त भी है। आज भी यथार्थ की नज़र तो दूर,उसकी समझ भी जैसे गुनाह है, हमारे रहनुमाओं की निगाहों में। आज भी वह षड्यंत्र जारी है, इससे भला कौन इंकार कर सकता है ? ज़्यादा लेने और बहुत-बहुत कम देने की क्या कहें, सिर्फ लेने और कुछ भी न देने की मिसालें आम बातें हैं,जिनका सही चेहरा दिखाने में मुक्तिबोध का रचना-संसार, विशेषतः उन की कविता 'अँधेरे में' पूरी तरह समर्थ है।
इस सन्दर्भ में वह सचमुच आत्म-सम्भवा है।
"अँधेरे में कविता की अर्थवत्ता उसके स्वप्न चित्रमय वातावरण में है जो अपनी नाटकीय संरचना के द्वारा सीधे-सादे वाक्यों को भी काव्यात्मक गूँज से अनुरंजित कर देता है। चेखव की प्रसिद्द कहानी ' वाद नं. 6 ' को पढ़ने के बाद, कहते हैं, लेनिन ने क्रान्ति से पहले कहा था की ' सारा रूस वार्ड नं.6 है। ' अँधेरे में कविता को पढ़कर भी कोई यह महसूस किए बिना नहीं रह सकता कि यह आज का भारत है। स्वप्न चित्र जैसी एक अयथार्थ कला के द्वारा काव्यात्मक पुनः सृष्टि करके मुक्तिबोध ने एक विरोधाभास का ही चमत्कार पैदा नहीं किया, बल्कि आधुनिक हिन्दी कविता में एक कालजयी कृति की रचना की है।" 3
भूमण्डलीकरण के तीन स्वरूप हैं-उदारीकरण, निजीकरण और मुक्त बाजार। जो लोग इस मुक्त व्यवस्था में सम्मिलित होंगे वे अपने-अपने देशों में आयात-निर्यात कानून को उदार बनायें, अपने देश के संसाधन का निजीकरण करें, स्थापना व्यय कम करें, तमाम तरह की सब्सिडी खत्म करें और अपने देश के संसाधनों का निजीकरण करें और अपने देश का हर बाजार दुनिया के कारपोरेट घरानों के लिये खोल दें। यह सब वैश्वीकरण की ऐसी कड़वी सच्चाई है जो सम्पूर्ण संसार को खासकर तीसरी दुनिया के देशों को पूरी तरह से जकड़ती जा रही है। इससे बचने का रास्ता किसी के पास नहीं है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की इन लाइनों को देखें-
‘घर के बाहर निकलो तो बचो,
 घर में रहो तो बचो,
क्योंकि जो कुछ बचा हुआ है,
उसे नष्ट करने की कोशिश जारी है।’
दरअसल,‘अंधेरे में’ कविता में मुक्तिबोध कहते हैं ‘पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता’। गांधी जी पूंजीपतियों को देश का ट्रस्टी मानते थे। उनका दर्शन ‘हृदय परिवर्तन’ पर आधारित था। उनकी समझ थी कि समाज के प्रभुत्वशाली वर्गों तथा वर्चस्ववादी जातियों व शक्तियों के हृदय परिवर्तन से समाज में समता आयेगी। गांधी जी के इन विचारों के विपरीत मुक्तिबोध का चिंतन था। वे इस ‘उजली दुनिया’ के पीछे फैले काले संसार को, इसकी हृदयहीनता व मनुष्य विरोधी चरित्र को बखूबी समझते थे जिसकी प्रवृति छलना व लूटना है। पूंजीवाद की यह अमानवीयता आज के समय में कही ज्यादा आक्रामक होकर हमारे सामने आई है। आज जिस ‘महान लोकतंत्र’ की दुहाई दी जा रही है, वह मूलतः लूट और झूठ की बुनियाद पर टिका है। यह अपनी लूट को छिपाने तथा उसे बदस्तूर जारी रखने के लिए झूठ की रचना करता है। कौन नहीं जानता कि आज कॉरपोरेट हित सर्वोपरि है लेकिन इसे अर्थशास्त्रीय शब्दावली की भूल भुलैया में ले जाकर 'समावेशी' कहा जा रहा है। इस पूंजी से हमारे देश की प्राकृतिक संपदा, खनिज, जंगल, जल व जमीन की लूट जारी है। लेकिन इसे ‘विकास’ की संज्ञा दी जा रही है।
इसी तरह "दुनिया की हर भाषा की जिंदगी में एक बार कोई निहायत ही निष्करुण वक्त दबे पाँव आता है और 'उसको बोलने वालों' के हलक में हाथ डालकर उनकी जुबान पर रचे-बसे शब्दों को दबोचता है और धीरे-धीरे उनके कोमल गर्भ में साँस ले रहे अर्थों का गला घोंट देता है। एक तरफ वह 'पवित्र को ध्वंस' में धकेलता है तो दूसरी तरफ वह 'अतीत में आग' लगाता हुआ, चौतरफा भय और निराशा फैला देता है। ऐसे ही वक्त के खिलाफ अंततः मंगल पांडे की बंदूक से गोली निकलती है और 1857 का गदर (?) मच जाता है। ...आज हम फिर 1857 के ही निकट पहुँच गए हैं। वे तब ये कहते हुए आए थे : 'हम, तुम असभ्यों को सभ्य बनाने के लिए तुम्हारे देश में घुस रहे हैं।' मगर इस बार वे कह रहे हैं : 'हम, तुम कंगलों को संपन्न बनाने के लिए तुम्हारे यहाँ आ रहे हैं।' ...सुनो, हम जिस 'पूँजी का प्रवाह' शुरू कर रहे हैं, वह तुम्हारे यहाँ समृद्धि लाएगी। ...लेकिन, हकीकत में यह देश को समृद्ध नहीं बल्कि, एक किस्म के 'सांस्कृतिक-अनाथालय' में बदलने की युक्ति है। वे धीरे-धीरे आपसे आपकी बोलियाँ और भाषा छीन रहे हैं।"4
मुक्तिबोध ने भी लिखा है -
इतने प्राण, इतने हाथ, इतनी बुद्धि
इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि
इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति
यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति
इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद –
जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध
इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंध
तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध
तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध
(कविता 'पूंजीवादी समाज के प्रति' का अंश)
समाज और साहित्य का सम्बन्ध बहुत कुछ वही है जो धरती से फूल का है। फूल धरती  होता है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसके दाल, पात, पंखुड़ी, वर्ण, गंध आदि मिट्टी हैं ; कि उससे मिट्टी की-सी सोंधी गंध आती ही और रंग भी मटमैला होता है। धरती का रूप-रस फूल में नया गंध, गंध उत्पन्न करता है।  इसी तरह समझना होगा कि साहित्य में भी समाज ज्यों का त्यों नहीं झलकता, बल्कि, रूपांतरित रूप में अंतरनिहित रहता है। गौरतलब है कि " श्रेष्ठ साहित्य मन का लड्डू नहीं है कि जब चाहा बना लिया। श्रेष्ठ तो श्रेष्ठ, साहित्य मात्र किसी की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं है।  जब जैसा जी हुआ वैसा साहित्य कोई नहीं रच सकता।  वह एक निश्चित परिस्थिति में और एक निश्चित परिस्थिति से पैदा होता है और यह परिस्थिति उसकी स्वेच्छा को मर्यादित करती है -- यहाँ तक कि उसके विद्रोह को भी। परिस्थिति के विरुद्ध लेखक का विद्रोह भी उस परिस्थिति के द्वारा निर्धारित होता है। यह लेखक की ऐतिहासिक सीमा है। मन के लड्डू खाने की अपेक्षा अपनी ऐतिहासिक सीमा को समझने और समझकर बदलने की कोशिश करने में कहीं अधिक स्वाद है।"5  इस कथन के परिप्रेक्ष्य में यदि देखें तो मुक्तिबोध ने एक ओर फैंटेसी के ज़रिये समाज के भीतरी चेहरे को पहचानने की दृष्टि दी, दूसरी तरफ अपनी ऐतिहासिक सीमाओं की पड़ताल कर,स्वेच्छा का नहीं, सच्चाई का साहित्य रचा और इस प्रयत्न में आश्चर्य नहीं कि उनके सामने यह प्रश्न मुंह बाए खड़ा रहा -
और, मैं सोच रहा कि
जीवन में आज के
लेखक की कठिनाई यह नहीं है कि
कमी है विषयों की
वरन यह कि आधिक्य उनका ही
उसको सताता है,
और, वह ठीक चुनाव नहीं कर पाता है।
                  ( 'मुझे कदम-कदम पर' )
बहरहाल, मुक्तिबोध की अंतहीन तलाश, विषयों के आधिक्य के मध्य भी जीवंत बनी रही.
मुक्तिबोध ने पूरे पूंजीवादी सुपरस्ट्रक्चर को इस अंश में चित्रित किया है -
विचित्र प्रोसेशन

बैंड के लोगों के चेहरे
मिलते हैं मेरे देखे हुओं से
लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार
इसी नगर के !!
बड़े- बड़े नाम अरे, कैसे शामिल हो गए  में !!
उनके पीछे चल रहा
संगीन नोकों का चमकता जंगल,

कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल, मार्शल
कई और सेनापति, सेनाध्यक्ष
चेहरे वे मेरे जाने बूझे से लगते
उनके चित्र समाचार पत्रों में छपे थे,
उनके लेख देखे थे,
यहाँ तक कि कविताएँ पढ़ी थीं
भई वाह !
उनमें कई प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण
मंत्री भी, उद्योगपति और विद्वान
यहाँ तक कि शहर का हत्यारा
डोमाजी उस्ताद।
( मुक्तिबोध रचनावली-2, पृ.328-30 )
"सत्ता हमेशा ही अपने को प्रामाणिक साबित करने के लिए मध्यवर्गीय, सुविधालोलुप बुद्धिजीवी का सहारा लेती है। ये विद्वान जो रात के जुलूस में शामिल हैं, जुलूस में शामिल दूसरे लोगों की रक्षा और उनके कृत्यों को वैधता प्रदान करना ही इनका काम है। सत्ता ने इसीलिए इनको सुविधाओं से पाट दिया है। इसीलिए ये सब लोग हत्यारी चुप्पी साधे हुए हैं। मीर तकी मीर ने शायर या कवि के मूल कर्तव्य को रेखांकित करते हुए कहा था - 'शायर हो मत चुपके रहो, इस चुप में जानें जाती हैं।' इस चुप्पी के वर्गीय आयामों को उभारते हुए मुक्तिबोध ने एकबारगी मीर की कविता के चुप्पे शायर की स्वातंत्र्योत्तर पहचान की। जानें तो सामान्य जन की ही जाएंगी। ज़र खरीद बौद्धिकों द्वारा गढ़े जाते संवाद इस हत्या को बौद्धिक आधार मुहैया कराने वाले ठहरे -
सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्
चिंतक, शिल्पकार और नर्तक चुप हैं
रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग
नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे,
प्रश्न-सी उथली सी पहचान
भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गए
समाचार-पत्रों के पतियों के मुख स्थूल
गढ़े जाते संवाद,
गढ़ी जाती समीक्षा,
गढ़ी जाती टिप्पणी जन-मन-उर शूल
बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास। 7
मुक्तिबोध ने अपनी मार्क्सवादी अंतर्दृष्टि से भारतीय समाज व्यवस्था के चरित्र को फैंटेसी के माध्यम से सही-सही अंकित किया था। इसी तरह भारतीय पूंजीवादी-सामंती शोषण व्यवस्था को उन्होंने अपनी कविता 'एक स्वप्न कथा' के बिम्ब से चित्रित किया है, वहां उसके साम्राज्यवाद सहयोग को भी कलात्मक तरीके से उजागर किया -
हो न हो
इस काले सागर का
सुदूर-स्थित पश्चिम किनारे से
ज़रूर कुछ नाता है
इसीलिए, हमारे पास सुख नहीं आता है।
                   
इस तरह,खोज और उपलब्धि के बीच की दुविधा या 'सस्पेंस' ही 'अँधेरे में' कविता को अद्भुत नाटकीयता प्रदान करती है। कथन शैली की दृष्टि से अँधेरे में एक स्वप्न कथा है, किन्तु वह सामान्य स्वप्न कथा नहीं, बल्कि, दुःस्वप्न का कथालोक है, जिसमें हर चीज़ प्रायः अन्यथा रूप में दृष्टिगत होती है। आत्मसंघर्ष से उत्पन्न तनाव, जटिलता,विसंगति, विडम्बना के बावजूद नामवर सिंह का यह कथन ध्यातव्य है - " मेरे ध्यान में मुक्तिबोध का कविता संबंधी वह वक्तव्य भी है कि ' आज तो पोस्टर ही कविता है ' और फिर यह कथन भी कि 'नहीं होती, कहीं खत्म कविता नहीं होती', मुक्तिबोध, दरअसल कल होने वाली घटनाओं की कविता ही नहीं लिख रहे थे बल्कि उस कविता के भावी काव्य-सिद्धांत के सूत्र भी फेंक रहे थे।"6  इस तरह मुक्तिबोध की कविता में आज साहित्य सिद्धांतों की भावी आहट पहले ही सुनी जा चुकी थी। इसलिए,स्वाभाविक है कि उनकी कविता अँधेरे में. आज के साहित्यिक सवालों के ज़वाबों मद्देनज़र भी एक आईने के समान है।
साहित्य का अपने शाश्वत मूल्यों के कारण भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं को लांघ जाना एक सामान्य बात है, इस पर भी हर बड़ा रचनाकार कुल मिला कर समाज विशेष की ही देन होता है और उसी समाज विशेष की भाषा, संस्कृति, परंपराओं और इतिहास के दायरे में उसकी रचनात्मकता अभिव्यक्ति पाती है। इसलिए ज़ाहिर है कि जिस साहित्य का अपने समाज से जितना आदान-प्रदान (इंटरेक्शन) हो रहा होगा वह साहित्य उतना ही जीवंत, संवेदनशील और प्रभावशाली होगा। और, कहना न होगा कि मुक्तिबोध में यह इंटरेक्शन शिखर पर पहुंचकर जीवन के समतल और तलहटी को भी इंस्पेक्ट करने में समर्थ है।  उनका साहित्य उसी संवाद का शाश्वत दस्तावेज़ है। वास्तव में मुक्तिबोध सफलता के दोयम दर्ज़े के तौर तरीकों से पूरी तरह दूर रहे। कभी कोई कपटजाल नहीं रचा। चालाकी और छल-छद्म से जिंदगी की ऊंची मंज़िलों तक पहुँचने का कोई ख़्वाब तक भी नहीं देखा। तभी तो वह दो टूक लहज़े में कह गए -
असफलता का धूल कचरा ओढ़े हूँ
इसलिए कि सफलता
छल-छद्म के चक्करदार जीनों पर मिलती है
किन्तु मैं जीवन की -
सीधी-सादी पटरी-पटरी दौड़ा हूँ
जीवन की।
(1960-61,राजनांदगांव, मुक्तिबोध रचनावली )
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सन्दर्भ -
1. रामस्वरूप चतुर्वेदी, नयी कविताएँ ; एक साक्ष्य, पृष्ठ 91
    लोकभारती प्रकाशन 1998
2  वहीं, पृष्ठ 91-92
3  नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, पृष्ठ 150-51
4.प्रभु जोशी, हिन्दी मीडिया, 6 जनवरी 2015
5.नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना, पृष्ठ 44
6 .नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, पृष्ठ 250-51
7.मुक्तिबोध, अँधेरे में, मुक्तिबोध रचनावली-2, पृष्ठ 25
   (अवधेश त्रिपाठी के आलेख से)
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लेखक छत्तीसगढ़ राज्य शिखर सम्मान से अलंकृत हैं।
संपर्क - दुर्गा चौक, दिग्विजय पथ,
राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़ )
पिन कोड - 491441
मो. 09301054300
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HINDI MEDIA MUMBAI

Sunday, August 19, 2018

आज़ादी के ये संकल्प कि बात बन जाए !

डॉ. चन्द्रकुमार जैन 



क्यों न हम इस आजाद भारत को 
और बेहतर बनाने के लिए 
छोटी छोटी बातों को 
अपने जीवन में अमल लाएं 
और इस भारत भूमि को 
स्वर्ग से भी सुंदर बनायें 
 

चलिए इस आजादी के पर्व पर हम सभी प्रण लेते हैं कि हम सभी वो सभी कार्य करेंगे जिससे हमारा देश भारत पूरे विश्व में ज्यादा महान बने और हम भारतीयों की तरफ से इस आजादी के पर्व के जरिये पूरे विश्व को नया जीवन जीने का एक नया संदेश मिले।बड़ी-बड़ी बातों और बड़े-बड़े वादों के बदले हम छोटी-छोटी कोशिशें अपने स्तर पर कर सकें तो फ़िज़ा बदलते देर न लगेगी। 

कुछ सुझाव और सन्देश यहाँ साझा कर लें कि हम वास्तव में आज़ाद होने का परिचय दे सकें और आज़ादी के सही हकदार बन सकें -


हम स्वच्छता बनाये रखेंगे 
स्वच्छ रहेंगे। 
स्वच्छ भारत बनाएँगे। 


कूड़ा करकट इधर-उधर नही फेंकेंगे।  
निश्चित तय स्थान पर ही कचरा फेंकेंगे। 
स्वच्छता मित्रों का सम्मान करेंगे, उन्हें सहयोग देंगे। 


धरती की हरियाली बचाये रखेंगे। 
अपने आस-पास पेड़-पौधे लगाएंगे। 
और लोगों को भी जगायेंगे। 
धरती माता का कर्ज़ चुकाएंगे। 


देश की धड़कन रेलवे को 
यात्रियों की अधिक सुविधा के काबिल 
और उनके ज्यादा भरोसे के साथ 
उनके दिलों की धड़कन भी बनाएंगे। 


टालमटोल की आदत अगर हो तो छोड़ कर दिखाएंगे। 


किसी को बेवजह परेशान नहीं करेंगे । न ही बेवजह परेशान होंगे। 

 
किसी गरीब या ज़रूरतमंद का अनादर नहीं करेंगे  । 
और ना ही उसके हाल पर कभी हँसेगे। 


कठिन काम भी सरल रहकर करने की आदत विकसित करेंगे। 
और जो सरल हैं उनकी राह कठिन बनाने की कुचेष्टा नहीं करेंगे। 


सकरात्मक सोच के साथ ऊर्जावान माहौल बनाएँगे। 


किसी की आंख के आंसू का कारण नहीं बनेंगे । 
किसी की खुशी से मायूस नहीं होंगे। 

किसी के पाँव का कांटा भले ही न निकाल सकें,
किसी की राह की बाधा कतई नहीं बनेंगे। 


काम कितना कठिन ही क्यों न हो कभी हार नहीं मानेंगे। 
कोशिश ही हमारा लक्ष्य होगा। 

बूढ़े माता-पिता, बुजुर्गों का सम्मान करेंगे। 


अक्सर हम खुद को हर हाल में सही साबित करने के लिए 
गलत को भी सही करना चाहते हैं। 
हम इस बार स्वतंत्रता दिवस पर संकल्प करें 
कि ऐसा करने से बचेंगे। 


हम विश्व गुरू भारत की दुनिया का सिरमौर बनाने की 
हर कोशिश में अपने स्तर पर सहभागी बनेंगे। 

हार को जीत में और गीत में बदलने की कला सीखेंगे। 

हमारी खुशी और हमरे इत्मीनान के लिए बड़े और कड़े जोखिम उठाने वाले और 
देश की सीमा की रक्षा करने वाले सैनिकों और जांबाजों पर गर्व करेंगे। 

राष्ट्र प्रथम की उच्च भावना के साथ सच्चे भारतीय होने का परिचय देंगे। 
और विश्व मंगल की कामना के साथ विश्व के भी नागरिक होने का प्रमाण देंगे। 
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MO.9301054300

Sunday, August 5, 2018

आबाद रहेगा बाबू जी के 
अक्षर-संसार का 'सबेरा'

डॉ. चन्द्रकुमार जैन 

पत्रकारिता एक कला है। वह जनता को सत्यम, शिवम् ,सुंदरम की ओर प्रेरित करती है। पत्रकारिता समाज का प्रतिबिम्ब ही नहीं, जैसा कि साहित्य को माना गया है, बल्कि वह समाज की प्रतिकृति है। इस कसौटी पर यदि देखें तो स्मृतिशेष बाबू जी ( श्री शरद कोठरी जी ) पत्रकारिता के अक्षय-वैभव के प्रतिमान और पत्र-जगत की विशिष्ट पहचान भी थे। बाबू जी ने पत्रकारिता और साहित्य के अंतरजगत की पीठिका पर लेखनी के तेज और प्रताप का संसार रचा। वे साहित्य अनुरागी चिंतक, सम्पादक और पत्रकार थे। 

अंग्रेजी के भी निष्णात विद्वान होने के बावजूद बाबू जी ने आजीवन हिंदी भाषा को अपनी लेखनी के दम पर अधिक रुचिकर और समाजोपयोगी बनाने का सारस्वत अनुष्ठान किया। पत्रकारीय सामर्थ्य से समृद्ध अक्षर संसार का 'सबेरा' पाठकों और  शब्द साधकों को सौंपकर वे इस जीवन के पार चले गए। किन्तु, मेरा अडिग विश्वास है कि उनका यशः शरीर, आज प्रायः पूरी तरह से व्यावसायिक रंग में ढलने को आतुर शब्द-संसार में भी पत्रकारिता की मानवीय प्रवृत्ति को बचाये रखने की प्रेरणा देता रहेगा। 

लगभग चार दशक से सबेरा संकेत परिवार से किसी न किसी रूप में जुड़े होने के नाते मैं पूरी विनम्रता के साथ कहना चाहता हूँ कि बाबू जी को अपनी कलम की ताकत पर जितना भरोसा था, उसके प्रभाव को लेकर भी वे उतने ही आश्वस्त रहते थे। उनके यहाँ जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव, संकल्प और सपनों को अभिव्यक्त करने के लिए, लेखन सर्वश्रेष्ठ माध्यम था। पर बकौल बाबू जी,वह लेखन ऐसा हो जो पाठक को कुछ नया सोचने, नए कोण से चीज़ों और मुद्दों को समझने की दिशा बताए। तभी उसकी सार्थकता होगी। वे कहते थे कलम का काम पाठक को आतंकित करना नहीं, आश्वस्त करना है। 

अपने दिग्विजय महाविद्यालय में विभागीय आयोजनों, जन-जीवन के शताधिक विविध प्रसंगों और मुक्तिबोध स्मारक की स्थापना के काल-खंड में कई ऐसे मौकों का मैं गवाह हूँ जब उन्होंने बार-बार कहा कि साहित्य के हर विद्यार्थी को प्रतिदिन डायरी लिखना चाहिए। कलमकारों के सीधे संपर्क में रहना चाहिए। नोट्स लेने की आदत डालना चाहिए। अपने भीतर बहुरंगी मानव समाज को गहराई से समझने की विवशता पैदा करनी चाहिए। और फिर वे स्पष्ट करते कि इन गुणों के बगैर अच्छा लेखक या पत्रकार बनना संभव नहीं है। संचार-विचार के आज के तेज रफ़्तार दौर में भी मैं सोचता हूँ कि ये विचार कितने उपयोगी हैं  ! नए कलमकारों को इस पर ध्यान देना चाहिए। 

बाबू की अपनी लेखनी से जनमानस में छाए रहे और पत्रकारिता के तो 'लीजेंड' ही बन गए। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आज भी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई वरिष्ठ पत्रकार बाबू जी को अपना गुरु मानते हैं। अंत में बंगला के एक गीत की दो पंक्तियाँ - 

लक्ष प्राणेक दुःख यदि वक्षे तोर बाजे।
मूर्त करे तोल रे नारे, सकल काज माझे।।

अर्थात यदि लाखों प्राणों की पीड़ा तेरे ह्रदय में प्रतिध्वनित होती है तो इस का मूर्त प्रमाण अपने कार्यों से दे। ... और बाबू जी, अपने अंदाज़ में ऐसा प्रमाण दे गए हैं। उनका अक्षर व्यक्तित्व प्रेरणा का अक्षय स्रोत बना रहेगा। 
सत्य की खोज है मुक्तिबोध की डायरी

डॉ. चन्द्रकुमार जैन 

दुनिया भर में मशहूर गजानन माधव मुक्तिबोध कवि मात्र नहीं, मुखर समीक्षक, मर्मभेदी कहानीकार और बीसवीं सदी के प्रखर बौद्धिक व्यक्तित्व थे, जिनके मानसिक संगठन और अंतहीन उधेड़बुन को समझना अब भी शेष है। सब जानते हैं कि मुक्तिबोध की डायरी का अपना अलग अंदाज़ और वार्तालाप की शैली में अपने विचारों की परतें अनावृत्त करने का उनका अपना मिज़ाज़ था। उसी डायरी पर रस्तोगी जी के नज़रिए पर एक नज़र -

गजानन माधव मुक्तिबोध को न साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और न ही ज्ञानपीठ पुरस्कार। जो मुक्तिबोध उत्तर शती के हिन्दी संसार में चर्चा के केंद्र में हैं, यह एक कटु सत्य है कि जीते जी उनका एक भी कविता-संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ था। यह तो 1980 में उनका संपूर्ण साहित्य ‘मुक्तिबोध रचनावली’ के रूप में छह खंडों में प्रकाशित हुआ है। मुक्तिबोध जितने बड़े कवि हैं, उतने ही बड़े आलोचक, कथाकार और उपन्यासकार भी हैं। उनका समग्र कृतित्व हमारे समय की अनुपम धरोहर इसलिए है क्योंकि उसमें हमारे समय का जीवंत इतिहास दर्ज है।

मुक्तिबोध की आलोचना की कोई परम्परा नहीं है। उन्हें उस समय हिन्दी आलोचना के जो मॉडल सुलभ थे, वे उस राह के अनुगामी नहीं बने। इसलिए उन्होंने अपनी आलोचना के लिए बिल्कुल एक नया मुहावरा गढ़ा। खासतौर से ‘एक साहित्यिक की डायरी’ (साहित्यालोचना) की तो दूसरी मिसाल अभी तक भी हिन्दी आलोचना में उपलब्ध नहीं है। इसकी वजह यह है जिसकी ओर श्री अदीब ने इशारा किया है, ‘मुक्तिबोध की डायरी उस सत्य की खोज है जिसके आलोक में वे अपने अनुभव को सार्वभौमिक अर्थ देते हैं।’ (एक साहित्यिक की डायरी, फ्लैप पर छपी टिप्पणी)।

‘एक साहित्यिक की डायरी’ के प्रकाशन का भी एक दिलचस्प इतिहास है। इसके पहले संस्करण की पांडुलिपि मार्च, 1964 में मुक्तिबोध ने भोपाल में श्रीकांत वर्मा को सौंपी थी और वह जिस रूप में चाहते थे, उसी रूप में वह छपी भी।ये सारी डायरियां जबलपुर में प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘वसुधा’ में, ’57, ’58 और ’60 में प्रकाशित हुई थीं। इस कृति के स्थापत्य और इतिहास के बारे में श्रीकांत वर्मा से ही जानें। वास्तविकता यह है कि ‘एक साहित्यिक की डायरी’ केवल उस स्तंभ का नाम था जिसके अंतर्गत समय-समय पर मुक्तिबोध को अनेक प्रश्नों पर विचार करने की छूट न केवल सम्पादक की ओर से, बल्कि स्वयं अपनी ओर से भी होती थी।’ (फ्लैप पर छपी टिप्पणी)। वास्तव में यह सभी निबंध ‘काव्य’ या ‘साहित्य’ के सत्यान्वेषण के रूप में सामने आये हैं। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में संगृहीत निबंधों की मार्फत मुक्तिबोध ने आधुनिक सृजन समीक्षा को नये प्रतिमान दिये हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस संग्रह के सभी निबंध साहित्यालोचना की कलात्मक प्रौढ़ता के निकट हैं।

गजानन माधव मुक्तिबाेध की कालजयी कृति ‘एक साहित्यिक की डायरी में’ 13 निबंध संगृहीत हैं जो इस प्रकार से हैं—‘तीसरा क्षण’, ‘एक लंबी कविता का अंत’, ‘डबरे पर सूरज का बिम्ब’, ‘हाशिये पर कुछ नोट्स’, ‘सड़क को लेकर एक बातचीत’, ‘एक मित्र की पत्नी का प्रश्न-चिन्ह, नये की जन्म-कुण्डली : एक’, ‘नये की जन्म-कुण्डली : दो’, ‘वीरकर’, ‘विशिष्ट और अद्वितीय’, ‘कुटुयान और काव्य सत्य’, ‘कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी : एक’, व ‘कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी : दो’। साहित्यालोचना पर केंद्रित इन निबंधों में वे चीजों को वैसे ही मार्क्सवादी तरीके से पड़तालते हैं, जैसे मुक्तिबोध अपनी कविता में चीजों को देखते हैं। इन निबंधों की अनेक अर्थछवियां हैं, अनन्त व्यंजनागत अर्थ हैं, लेकिन वे सभी उनके जीवन के अनुभवों की धूप में से छन कर सामने आए हैं। मुक्तिबोध के अनुसार कला के तीन क्षण हैं। उनसे ही जानें वे तीन क्षण कौन से हैं—‘कला का पहला क्षण है जीवन का तीव्र उत्कट अनुभव। दूसरा क्षण है इस अनुभव का अपने कसकते-दुखते हुए मूलों से पृथक हो जाना और एक ऐसी फैंटेसी का रूप धारण कर लेना मानो वह फैंटेसी अपनी आंखों के सामने ही खड़ी हो। तीसरा और अंतिम क्षण है इस फैंटेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरंभ और उस प्रक्रिया की परिपूर्णावस्था तक की गतिमानता। …फैंटेसी अनुभव की कन्या है और उस कन्या का अपना स्वतंत्र विकास-मान व्यक्तित्व है। वह अनुभव से प्रसूत है इसलिए वह उससे स्वतंत्र है।’ (तीसरा क्षण, पृ. 20-21)।

मुक्तिबोध ने सातवें दशक के शुरुआती वर्ष में साहित्यकार की ईमानदारी पर जो सवाल उठाया था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है, ‘आज के साहित्यकार का आयुष्य क्रम क्या है? विद्यार्जन, डिग्री और इसी बीच साहित्यिक प्रयास, विवाह, घर, सोफासेट, एरिस्ट्रोक्रैटिक लिविंग, गहनों से व्यक्तिगत संपर्क, श्रेष्ठ प्रकाशकों द्वारा अपनी पुस्तकों का प्रकाशन, सरकारी पुरस्कार… और चालीसवें वर्ष के आसपास अमेरिका या रूस जाने की तैयारी, किसी व्यक्ति या संस्था की सहायता से अपनी कृतियों का अंग्रेजी या रूसी में अनुवाद, किसी बड़े भारी सेठ के यहां या सरकार के यहां ऊंचे किस्म की नौकरी। अब मुझे बताइए यह वर्ग क्या तो यथार्थवाद प्रस्तुत करेगा और क्या आदर्शवाद।’ (पृ. 34, एक लंबी कविता का अंत)। यहीं मुक्तिबोध छोटी कविता में मन न रमने का कारण भी बताते हैं देखें, ‘यथार्थ के तत्व परस्पर गुम्फित होते हैं, साथ ही पूरा यथार्थ गतिशील होता है। अभिव्यक्ति का विषय बनकर जो यथार्थ प्रस्तुत होता है वह भी ऐसा ही गतिशील है और उसके तत्व भी परस्पर गुम्फित हैं। यही कारण है कि मैं छोटी कविताएं लिख नहीं पाता और जो छोटी होती हैं वे वस्तुत: छोटी न होकर अधूरी होती है।’ (पृष्ठ 30)। साहित्यालोचना का असल कार्य क्या है यह भी जानें, ‘आलोचना करते वक्त हम गलतियों के लिए कम से कम पच्चीस-तीस प्रतिशत हाशिया छोड़ दें तो बहुतेरे के हृदय-दाह समाप्त हो जायें और हार्दिक तथा वैचारिक आदान-प्रदान अधिक सुगम या सहज हों।’ (हाशिए पर कुछ नोट्स, पृ. 50)।

मुक्तिबोध ने कलाकार की ईमानदारी का प्रश्न बार-बार उठाया है। उनसे ही जानें कि काव्य रचना का सच्चा नेपथ्य है क्या, भले ही काव्य-रचना हाथ में कलम लेकर टेबल पर की जाती रही हो, किन्तु रचना की सच्ची मनो भूमिका काव्य रचना के क्षणों के बाहर निरंतर तैयार होती रहती है। (कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी : दो, पृ. 118)।
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चार में अहिंसा,विचार में अनेकांत और जीवन में अपरिग्रह की महिमा  
 डॉ.चन्द्रकुमार जैन 


सत्य के सदन में अहिंसा के अवतरण का नाम है तीर्थकर महावीर स्वामी। अचौर्य के आचरण और अपरिग्रह के अनुकरण का नाम है महावीर स्वामी। अनेकान्तवाद के आकाश में उत्सर्ग की उड़ान का नाम है महावीर स्वामी। अवैर की अभिव्यक्ति और क्षमा की शक्ति का नाम है महावीर स्वामी। सहिष्णुता की सात्विकता और संयम के सामर्थ्य का नाम है महावीर स्वामी। सद्भाव से सरोकार और समता के सूत्रधार का नाम है महावीर स्वामी।

जैनधर्म के इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ऋषभदेव के पौत्र मारीचि से लेकर अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर के भव तक की जीवन यात्रा किसी आत्मा के संसार परिभ्रमण की तथा उससे मुक्ति की अनोखी कथा है। अन्तिम भव में वैशाली गणतन्त्र के कुण्डग्राम में राजा सिद्धार्थ और महारानी त्रिशला के घर में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन बालक वर्धमान के रूप में उस पवित्र आत्मा ने जन्म लिया। जैसा कि सभी तीर्थंकरों के जीवन में होता है उनके भी गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक, देवों व मानवों के द्वारा अति उत्साह व भक्ति से मनाये गये। 

सभी जानते हैं कि 30 वर्ष की आयु में वर्धमान महावीर ने राजपाट त्याग कर श्रमण साधना का मार्ग अपना लिया। 12 वर्ष तक मौन तपस्या के बाद 42 वर्ष की आयु में उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई और इस प्रकार वे अपने सम्पूर्ण विकारों से मुक्त हो कर कर अर्हन्त परमात्मा बन गये। उनके उपदेशों का क्रम उसके बाद अनवरत 30 वर्ष तक चलता रहा और कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन की प्रात: बेला में उन्होंने संसार चक्र से मुक्ति प्राप्त की और सिद्ध हो गये। 

भगवान महावीर का यह जीवन और उनकी शिक्षाएं अत्यन्त प्रेरणादायक और सर्व कल्याण कारी हैं, सर्वोदयी हैं। उनके अनुपालन से न केवल जीवों का मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है वरन् सामान्य लोक जीवन भी सुन्दर हो जाता है। उनके उपदेशों में अहिंसा,अनेकान्त और अपरिग्रह की विशेष चर्चा की जाती है। परन्तु उनके उपदेशों का जो सबसे सघन पक्ष है वह है प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति व सामर्थ्य की घोषणा। प्रत्येक आत्मा की स्वतंत्रता की उद्घोषणा और इस विश्वास की स्थापना कि मनुष्य जन्म से नहीं, कर्म से महान बनता है। 

आचार में अहिंसा, विचारों में अनेकांत, वाणी में स्याद्वाद और जीवन में अपरिग्रह महावीर के मूल सन्देश हैं। सामान्यतः कहा जाता है हिंसा का न होना अहिंसा है। परन्तु जैन दर्शन में अहिंसा रूप बहुत विस्तृत है। निश्चय से आत्मा में राग-द्वेष की उत्पत्ति न होना ही अहिंसा है। और व्यवहार से मन-वचन-काय से अनुमोदना किसी भी रूप में किसी भी जीव को पीड़ा या दुख न पहुँचाना अहिंसा है। वहाँ केवल पंचेन्द्रिय जीवों की हिंसा की बात नहीं कही वरन् सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की रक्षा का भी उपदेश दिया। 

सुबह से शाम तक होने वाली क्रियाओं में हिंसा, अभक्ष्य भक्षण में हिंसा, अनछने जल के उपयोग में हिंसा - यदि आज हम इन हिंसाओं से बचे हैं तो वो अहिंसा का सिद्धांत ही है जिसने जीव मात्र के प्रति दया का भाव सिखाया। भगवान महावीर ने न केवल आचार में अहिंसा की बात कही बल्कि भावों में भी अहिंसा का प्रतिपादन किया। आचार में और भावों में अहिंसा का प्रवर्तन होने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

प्रत्येक वस्तु अनेक धर्मात्मक है। एक ही वस्तु में परस्पर विरोधी दो धर्मों या शक्तियों का प्रकाशित होना अनेकांत है। अर्थात् जो वस्तु एक है वही अनेक भी है, जो नित्य है वही अनित्य भी है, जो सत् है वही असत् भी है।अनेकांत के बिना वस्तु की सिद्धि नहीं हो सकती। जब हम वस्तु के एक धर्म को स्वीकार करते है, तो विवाद खड़ा होता है। कैसे ? यदि हम वस्तु को हमेशा सत् रूप से मानेगें तो उसका कभी विनाश नहीं होगा, और असत् रूप में मानेगें तो उसका कभी जन्म नहीं होगा। जैसे दीपक बुझने के बाद भी नष्ट नहीं होता बल्कि अंधकार रूप पर्याय को धारण करते हुये अपना अस्तित्व रखता है। यदि नष्ट हो जाता तो पुनः प्रकाश कैसे होता ? ऐसे ही परस्पर विरुद्ध दोनों धर्मों का कथन करना ही अनेकांत है। यदि हमारे विचारों में अनेकांत होगा तो वस्तु का सत्य स्वरूप समझने में आसानी होगी।

अनेकांतमयी वस्तु को कथन करने की पद्धति का नाम स्याद्वाद है। किसी भी एक शब्द या वाक्य के द्वारा वस्तु का समग्र कथन करना संभव नहीं है, प्रयोजन की मुख्यता से अन्य धर्मों को गौण करते हुये एक धर्म का कथन करना स्याद्वाद है। वस्तु के अन्य धर्मों का निषेध न हो जाये इसलिये अनेकांत वादी स्यात् यानि कथंचित् शब्द का प्रयोग करते हैं। जैसे वस्तु कथंचित् सत् और कथंचित् असत्, कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य है। जैसे द्रव्य रूप से वस्तु नित्य है और पर्याय रूप से अनित्य । वाणी में स्याद्वाद होने से कभी कोई विवाद खड़ा नहीं होगा। 

ये मेरा है, ऐसा भाव परिग्रह है, और ऐसा भाव न होना ही अपरिग्रह है। परिग्रह 24 प्रकार के हैं। चौदह अंतरंग और दस बहिरंग परिग्रह बताये गए हैं। जैन दर्शन में अंतरंग परिग्रह के त्याग को ही श्रेष्ठ माना गया है। अंतरंग परिग्रह के त्याग बिना बाह्य परिग्रह के त्याग का कोई मूल्य नहीं है।
जीवन में अपरिग्रह का होना बहुत जरूरी है। क्यों कि व्यक्ति की इच्छायें असीम व अनंत है, उन पर नियंत्रण रखने के लिये और शांति पूर्वक जीवन जीने के लिये अपरिग्रह का होना अति अावश्यक है।

जिस प्रकार खान से निकले हुये कोयले से आवृत्त हीरे में बाहर से काला दिखने पर भी आन्तरिक सौंदर्य एवं चमक पूरी की पूरी विद्यमान होती है। जरूरत केवल बाहृय कालिमा को हटाने की है। सर्वांगसुन्दर हीरा अपने दैदीप्यमान रूप में स्वत: ही प्रगट हो जाता है। खान से निकली पत्थर की शिला में प्रतिमा छिपी होती है जिसे पारखी व कुशल कारीगर पहचान लेता है और बाहरी आवरण -अतिरिक्त पत्थर हटा देने पर वह सर्वांगसुन्दर प्रतिमा प्रगट हो जाती है जो प्रतिष्ठित होने पर जगत पूज्य बन जाती है। भगवान महावीर कहते हैं कि इसी प्रकार हीरे के पत्थर में हीरा तथा पत्थर की शिला में देव प्रतिमा स्वाभाविक रूप से ही विद्यमान है, उसी प्रकार इस आत्मा में भी परमात्मा विद्यमान रहते हैं। विकारों को हटाकर परमात्म स्वरूप का दर्शन किया जा सकता है। 

हमारी अभी के दौर में आर्थिक शब्दावली कुछ ज्यादा ही चलन में है, लिहाजा जीवन मूल्यों को भी आयात-निर्यात की नजर से देखा जाने लगा है। लेकिन भारत ने अपने मूल्य न तो अभी तक किसी पर थोपे हैं, न ही उनका निर्यात किया है। इनमें से जो भी दुनिया को अपने काम का लगता है, उसे वह ग्रहण करती है, ठीक वैसे ही, जैसे अन्य समाजों से हम ग्रहण करते हैं। जिस दौर में दुनिया अहिंसा को एक भारतीय मूल्य के रूप में अनुकरणीय मानती थी, भारत की धरती पर उस दौर में संसार का सबसे बड़ा साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन अहिंसा के सिद्धांत पर ही संचालित हो रहा था।

दूसरों को दुख देना या दूसरों के अधिकार छीनना ही हिंसा है, यह कौन समझेगा। दूसरों के अधिकार छीनना हमें ही दुख पहुंचाएगा, जब तक हम यह नहीं समझेंगे तब तक न्याय नहीं कर सकते। महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में ग्राम स्वतंत्रता की बात की थी और कहा था कि बगैर उसके समानता नहीं आ सकती। आज दुनिया के अनेक देशों में स्वायत्तता निचली इकाइयों तक पहुंची हुई है, लेकिन हमारे देश में जब तक हम इस बारे में मूल रूप से सोचना शुरू नहीं करेंगे, तब तक देश में हिंसा होती रहेगी। हमें दूसरों के दुख के बारे में सोचना होगा। श्री दलाई लामा ने ठीक ही कहा है कि हमारे पास आयात करने के लिए तो बहुत कुछ है, लेकिन निर्यात करने के लिए अहिंसा के अलावा कुछ नहीं। लेकिन सबसे बड़ी शर्त यह हो कि जो निर्यात करते हैं, उसे अपने लिए भी तो उपयोगी मानें। महावीर की अहिंसा को जीवन की मूलधारा से जोड़ें। सर्वपल्ली डॉ.राधाकृष्णन ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि यदि संसार को तबाही से बचाना है और कल्याण के मार्ग पर चलाना है तो भगवान महावीर के अहिंसा के महान सन्देश और उनके बताये हुए रास्ते को ग्रहण किये बिना और कोई रास्ता नहीं है।

मानवीय सभ्यता और संस्कृति का उच्चतम बिंदु है अहिंसा। हिंसा जीवन यात्रा के साथ जुड़ी हुई है पर वह जीवन के विकास का अंग नहीं है। मनुष्य चिंतनशील प्राणी है, इसलिए वह हर क्षेत्र में विकास की यात्रा करता है। सामाजिक स्तर पर भी अहिंसा एक विचार है। अध्यात्म के स्तर पर वह सर्वोच्च विकास है। समाज की आचार-संहिता अहिंसा के बिना पल्लवित नहीं हो सकती। अध्यात्म की आचार-संहिता उसके बिना बन नहीं सकती। अध्यात्म का पहला बिंदु अहिंसा है और चरम बिंदु भी अहिंसा है। वर्तमान युग में हिंसा बढ़ रही है। अपरिमित आण्विक अस्त्रों से भय का वातावरण निर्मित हो रहा है। हिंसक प्रशिक्षण के कारण आतंकवाद, उग्रवाद और नक्सलवाद के साये में अशांति पनप रही है। इस स्थिति में महावीर की अहिंसा, अभय, अनेकांत के विषय में चिंतन करना, सही और स्थायी समाधान खोजना समय की सबसे बड़ी मांग है। 

आज हाईटेक युग में व्यक्ति लोभ, हिंसा, परिग्रह, तनाव, विषमता, भ्रष्टाचार, दहेज, कन्या भू्रण हत्या आदि शारीरिक पीड़ाओं और सामाजिक समस्याओं से ग्रस्त और त्रस्त है। इन तमाम समस्याओं के समाधान में भगवान महावीर के अनेकान्त दर्शन की महती भूमिका है। जहाँ अनेक अंत अर्थात् धर्म, विशेष, गुण और पर्याय पाये जाते हैं, उसे अनेकांत कहते हैं। 

जन साधारण को जीव हिंसा से बचाने के लिए महावीर ने अहिंसा का उपदेश दिया और वैचारिक मतभेदों, उलझानों, झगड़ों आदि से बचने के लिए, शांति की स्थापना के लिए अनेकान्तवाद का सिद्धान्त दिया। अनेकांत भारत की अहिंसा का चरम उत्कर्ष है। इसे संसार जितना अधिक अपनाएगा , विश्व शान्ति उतनी ही जल्दी संभव है। वस्तु के यथार्थ स्वरूप को जानने की सही दृष्टि ही अनेकान्त है। चिंतन की अहिंसामयी प्रक्रिया का नाम अनेकांत है और चिंतन की अभिव्यक्ति की शैली या कथन स्याद्वाद है। अनेकांत एक वस्तु में परस्पर विरोधी और अविरोधी धर्मों का विधाता है। अनेकान्तवाद हमारी बुद्धि को वस्तु के समस्त आयामों की ओर समग्र रूप से खींचता है।

अनेकांत दृष्टि का अर्थ है - प्रत्येक वस्तु में सामान्य रूप से, विशेष रूप से, प्रिय और अप्रिय की दृष्टि से, नित्यत्व की अपेक्षा से, अनित्य की अपेक्षा से सद्रूप से और असद्रूप से अनंत धर्म होते हैं। समाज में विभिन्नता एवं साम्प्रदायिकता का विवाद भी अनेकांत से मिटाया जा सकता है। जब एकांगी दृष्टिकोण विवाद और आग्रह से मुक्त होंगे तभी भिन्नता में समन्वय के सूत्र परिलक्षित हो सकेगें। महावीर का अनेकांत हमें अनेकता में एकता के विधान का सम्मान करने की सीख देता है। 

यदि गहराई में जा कर देखें तो भगवान् महावीर का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त अनेकान्तवाद और स्यादवाद है। महावीर ने कहा है कि सभी मत और सिद्धान्त पूर्ण सत्य या पूर्ण असत्य नहीं हैं। सापेक्ष दृष्टि से विचार करने पर सभी दृष्टिकोण सत्य ही प्रतीत होते हैं। इसलिए, अपने-अपने मत या सिद्धान्त पर अड़े रहने से संघर्ष बढ़ता है। आज जो वर्ग-संघर्ष, अशान्ति और शस्त्रों का अन्धानुकरण बढ़ रहा है, उसे रोकने में अनेकान्त की दृष्टि, सहअस्तित्व की भावना महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। 

समाज में एक ही प्रकार की जीवन प्रणाली, एक ही प्रकार के आचार-विचार की साधना न तो व्यवहार्य है और न संभव ही। वैचारिक सहिष्णुता के लिए अनेकान्तवाद के अवलम्बन की आवश्यकता है। सच्चा अनेकांतवादी किसी भी समाज या व्यक्ति के द्वेष नहीं करता। मानव की यह विचित्र मनोवृति हैं कि वह समझता है कि जो वह कहता है वही सत्य है और जो वह जानता है वही ज्ञान है क्योंकि इसके भीतर अहंकार छिपा हुआ है। अनेकान्तवाद से यही संकेत किया जाता है कि आचार के लिए और विचार के लिए सद्विचार, सहिष्णुता एवं सत्प्रवृति का सहयोग आवश्यक है। पर-पक्ष को सुनो उसकी बातों में भी सत्य समाया हुआ है। अनेकान्तवाद सिर्फ विचार नहीं है आचार-व्यवहार भी है जो अहिंसा, अपरिग्रह के रूप में विकसित हुआ है। इस प्रकार अनेकान्तवाद जीवन की जटिल समस्याओं के समाधान का मूल मंत्र है। यह सह अस्तित्व, वसुधैव कुटुम्बकम, जीओ और जीने दो की भावना का विकास करता है जिससे मानवीय गुणों की वृद्धि होती है. जीवन का सम्पूर्ण विकास इसी से संभव है। 

अगर गौर करें तो अनेकता और एकता का सामंजस्य किये बिना लोकतंत्र की प्रतिमा प्रतिष्ठित नहीं हो सकती। इस सामंजस्य की प्रणाली का दार्शनिक आधार है अनेकांत। अनेकांत की चार प्रमुख दृष्टियाँ हैं - द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव। किसी भी वास्तु का मूल्यांकन द्रव्य सापेक्ष, क्षेत्र सापेक्ष, काल सापेक्ष और भाव सापेक्ष होना चाहिए। निरपेक्ष मूल्यांकन उलझनें पैदा करता है। आर्थिक विकास के लिए शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शान्ति, भावनात्मक संतुलन पर्यावरण संरक्षण गौण हो जाएँ तो इसे अर्थनीति की विडम्बना ही कहा जाएगा। इसका समाधान भी महावीर के अनेकांत में निहित है। 

भगवान महावीर का संदेश प्राणी मात्र के कल्‍याण के लिए है। उन्‍होंने मनुय-मनुष्‍य के बीच भेदभाव की सभी दीवारों को ध्‍वस्‍त किया। उन्होंने कहा इस विश्‍व में न कोई प्राणी बड़ा है और न कोई छोटा। उन्होंने गुण-कर्म के आधार पर मनुष्‍य के महत्‍व का प्रतिपादन किया। ऊँच-नीच, उन्‍नत-अवनत, छोटे-बड़े सभी अपने कर्मों से बनते हैं। सभी समान हैं। न कोई छोटा, न कोई बड़ा। भगवान की दृष्‍टि समभावी थी - सर्वत्र समता-भाव। वे सम्‍पूर्ण विश्‍व को समभाव से देखने वाले साधक थे, समता का आचरण करने वाले साधक थे। उनका प्रतिमान था - जो व्‍यक्‍ति अपने संस्‍कारों का निर्माण करता है, वही साधना का अधिकारी है।

महावीर की साधना विश्व शान्ति की प्रयोगभूमि है। महावीर ने कहा था - 'अप्पणा सच्च मेसेज्जां मेत्ति भूएसु कप्पए', स्वयं सत्य को खोजें एवं सबके साथ मैत्री करें। महावीर ने कहा था, जीओ और जीने दो। इस प्रकार महावीर के संदेशों की आज भी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी उस समय थी। आवश्कता सिर्फ उन्हें गहराई से समझकर अपनाने की है। उनकी वाणी ने प्राणी मात्र के जीवन में मंगल प्रभात का उदय किया। अब यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि उस वाणी के तेज और आलोक को हम सर्वव्यापी, सर्वहितकारी, सर्वमंगलकारी बनाएं। 

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