Friday, January 13, 2017

इंसान को नींद से जगा देता है दुख का पहाड़ !

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

अभी के दौर में आर्थिक शब्दावली कुछ ज्यादा ही चलन में है, लिहाजा जीवन मूल्यों को भी आयात-निर्यात की नजर से देखा जाने लगा है। लेकिन भारत ने अपने मूल्य न तो अभी तक किसी पर थोपे हैं, न ही उनका निर्यात किया है। इनमें से जो भी दुनिया को अपने काम का लगता है, उसे वह ग्रहण करती है, ठीक वैसे ही, जैसे अन्य समाजों से हम ग्रहण करते हैं। जिस दौर में दुनिया अहिंसा को एक भारतीय मूल्य के रूप में अनुकरणीय मानती थी, भारत की धरती पर उस दौर में संसार का सबसे बड़ा साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन अहिंसा के सिद्धांत पर ही संचालित हो रहा था।

राम मनोहर लोहिया ने उस समय आइंस्टाइन से अपनी बातचीत के दौरान अहिंसा को एटॉमिक पॉवर से भी ज्यादा शक्तिशाली और संभावनामय बताया था और उनकी इस प्रस्थापना पर आइंस्टाइन ने हामी भी भरी थी। बाद में अहिंसा का ऐसा ही प्रयोग साउथ अफ्रीका में रंगभेदी व्यवस्था से मुक्ति के लिए दोहराया गया, लिहाजा यह मानना गलत होगा कि अहिंसा पर भारत का कॉपीराइट है। हां, इस महान मूल्य का रिश्ता अगर हमें दोबारा भारत से जोड़ना है तो किसी को हिम्मत करके एक बार फिर अहिंसा के बड़े राजनीतिक प्रयोग के रास्ते पर बढ़ना होगा।

दलाई लामा ने ठीक ही कहा है कि अहिंसा का निर्यात हम बहुत कर चुके, अब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत हमारे ही देश में है। बुद्ध के समय से हम अहिंसा का निर्यात करते आ रहे हैं। अशोक और गांधी के बाद नेहरू का पंचशील भी यही था। लेकिन हमारे यहां से बुद्ध और गांधी, दोनों ही विदा हो गए तो उनकी मान्यताएं कहां रहनी थीं। दरअसल बात यह है कि गांधी के जाने के बाद देश और राजनीति ने जो रास्ता पकड़ा, वह अहिंसा का नहीं रहा। स्वार्थ इतना बढ़ गया कि दूसरों की सुख-सुविधा के बारे में सोचने की इच्छा ही नहीं रही।

जब यही नहीं है तो अहिंसा का मूल, यानी दूसरों को दुख देना या दूसरों के अधिकार छीनना ही हिंसा है, यह कौन समझेगा। दूसरों के अधिकार छीनना हमें ही दुख पहुंचाएगा, जब तक हम यह नहीं समझेंगे तब तक न्याय नहीं कर सकते। गांधी ने हिंद स्वराज में ग्राम स्वतंत्रता की बात की थी, और कहा था कि बगैर उसके समानता नहीं आ सकती। लेकिन हुआ क्या? नेहरू ने गांधी को लिखा कि अंधियारे गांव देश को क्या प्रकाश देंगे? तब से हमारे देश में नेहरू की नीतियां चल रही हैं, गांधी की नहीं।

यही गलत हुआ। आज दुनिया के अनेक देशों में स्वायत्तता निचली इकाइयों तक पहुंची हुई है, लेकिन हमारे देश में इसका उलटा है। जब तक हम इस बारे में मूल रूप से सोचना शुरू नहीं करेंगे, तब तक देश में हिंसा होती रहेगी। हमें दूसरों के दुख के बारे में सोचना होगा। दलाई लामा यह कह सकते हैं क्योंकि वे वैसा ही जीवन जी रहे हैं। हमारे पास आयात करने के लिए तो बहुत कुछ है, लेकिन निर्यात करने के लिए अहिंसा के अलावा कुछ नहीं। लेकिन जो निर्यात करते हैं, उसे अपने लिए भी तो उपयोगी मानें। 

राजकुमार सिद्धार्थ अपने महल से निकले थे खुशी की तलाश में और रास्ते में उन्होंने बूढ़े, बीमार और मुर्दे को देखा। ये दुख के ही रूप हैं। गम कुछ इसी तरह से राजकुमार सिद्धार्थ की राह में खड़े थे। फिर क्या था? उन्होंने महल और रथ को छोड़कर दुख दूर करने का उपाय ढूंढने निकल पड़े। महात्मा बुद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसी के दुख को देखकर दुखी होने से अच्छा है, उसके दुख को दूर करने के लिए उसे तैयार करना।

दुख मन में होता है और कष्ट शरीर में। महात्मा बुद्ध का यह यूनिवर्सल विजन है कि सारे संसार में सबका दुख सदा-सदा के लिए कैसे दूर हो? निराला की कविता की एक लाइन है- 'दुख ही जीवन की कथा रही।' यह सच है कि दुख ही जीवन की कथा और परेशानी है। मगर इस परेशानी का अंत कैसे होगा? यही शिक्षा महात्मा बुद्ध ने दी है। राजकुमार सिद्धार्थ रथ पर सवार होकर महल से निकले, रास्ते में बूढ़े को देखा और झटका लगा कि वह भी बूढ़े होंगे। फिर उन्होंने बीमार को देखा, फिर उन्हें झटका लगा, उन्हें लगा कि वह भी बीमार पड़ेंगे। फिर उन्होंने मुर्दे को देखा और वे उन्हें जोर से झटका लगा कि वह भी मरेंगे। उन्होंने दुख को देखा और दुख के झटके से उनकी आंखें खुल गईं। दुख ने उनको जगा दिया।

इंसान चलते-फिरते, बोलते, काम करते हुए भी एक गहरी नींद में डूबा रहता है। दुख का पहाड़ इंसान को नींद से जगा देता है। दुख जगाता है। यही दुख का प्रभाव है। यही उसकी प्रासंगिकता भी है। हर दुख और पीड़ा एक संदेश देती है। जीवन जीने का संदेश। हर दुख एक चिट्ठी है। हर पीड़ा एक संदेश है। मगर हमारी आंखों पर अज्ञान का पर्दा पड़ा हुआ है, इसलिए उस संदेश को हम पढ़ नहीं पाते हैं। हम न खुद को जानते हैं और न भविष्य को। हम दुख को भोगते हैं। खुद का कोसते हैं। दूसरों को दोष देते हैं। यहां तक कि भगवान को भी दोष देते हैं। 

हिंदी फिल्मों के मंदिर में भगवान को दोष देते हुए कई सीन आपने देखे होंगे और ऐसे सीन आगे भी दिखाए जाएंगे। मगर दुख से संदेश ग्रहण करने का चलन हमारे यहां है ही नहीं। दुख से संदेश तो कोई बुद्धिमान ही लेता है। महात्मा बुद्ध का एक मूल सवाल है। जीवन का सत्य क्या है? यह प्रश्न हमारी पीड़ा से जुड़ा है। भविष्य को हम जानते नहीं है। अतीत पर या तो हम गर्व करते हैं या उसे याद करके पछताते हैं। भविष्य की चिंता में डूबे रहते हैं। दोनों दुखदायी है।

महात्मा बुद्ध ने वर्तमान का सदुपयोग करने की शिक्षा दी है। बुद्ध ने अतीत के खंडहरों और भविष्य के हवा महल से निकाल कर मनुष्य को वर्तमान में खड़ा रहने की शिक्षा दी है। बौद्ध दर्शन की रेल दया और बुद्धि की पटरी पर दौड़ती है। दया माने सबके लिए कल्याण की भावना। बिहार के बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। उनके ज्ञान की रोशनी पूरी दुनिया में फैली। चीन की कहावत है- बांस के जंगल में बैठो और निश्चिंत होकर चाय पीओ। जैसे कि चीन के प्राचीन साधु-संत किया करते थे। यानी कि जीवन की परेशानियों के बीच शांत होकर बैठना। यह ताओवाद है।

पल भर ही सही अगरअतीत के खंडहर और भविष्य के हवा महल से मुक्त जा सके तो महावीर और बुद्ध की सीख का सार कुछ तो हमारे हिस्से आएगा। आएगा, जरूर आएगा। 
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प्राध्यापक,हिन्दी विभाग,शासकीय 
दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगांव  नींद से जगा देता 
इंसान को नींद से जगा देता है दुख का पहाड़ !

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

अभी के दौर में आर्थिक शब्दावली कुछ ज्यादा ही चलन में है, लिहाजा जीवन मूल्यों को भी आयात-निर्यात की नजर से देखा जाने लगा है। लेकिन भारत ने अपने मूल्य न तो अभी तक किसी पर थोपे हैं, न ही उनका निर्यात किया है। इनमें से जो भी दुनिया को अपने काम का लगता है, उसे वह ग्रहण करती है, ठीक वैसे ही, जैसे अन्य समाजों से हम ग्रहण करते हैं। जिस दौर में दुनिया अहिंसा को एक भारतीय मूल्य के रूप में अनुकरणीय मानती थी, भारत की धरती पर उस दौर में संसार का सबसे बड़ा साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन अहिंसा के सिद्धांत पर ही संचालित हो रहा था।

राम मनोहर लोहिया ने उस समय आइंस्टाइन से अपनी बातचीत के दौरान अहिंसा को एटॉमिक पॉवर से भी ज्यादा शक्तिशाली और संभावनामय बताया था और उनकी इस प्रस्थापना पर आइंस्टाइन ने हामी भी भरी थी। बाद में अहिंसा का ऐसा ही प्रयोग साउथ अफ्रीका में रंगभेदी व्यवस्था से मुक्ति के लिए दोहराया गया, लिहाजा यह मानना गलत होगा कि अहिंसा पर भारत का कॉपीराइट है। हां, इस महान मूल्य का रिश्ता अगर हमें दोबारा भारत से जोड़ना है तो किसी को हिम्मत करके एक बार फिर अहिंसा के बड़े राजनीतिक प्रयोग के रास्ते पर बढ़ना होगा।

दलाई लामा ने ठीक ही कहा है कि अहिंसा का निर्यात हम बहुत कर चुके, अब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत हमारे ही देश में है। बुद्ध के समय से हम अहिंसा का निर्यात करते आ रहे हैं। अशोक और गांधी के बाद नेहरू का पंचशील भी यही था। लेकिन हमारे यहां से बुद्ध और गांधी, दोनों ही विदा हो गए तो उनकी मान्यताएं कहां रहनी थीं। दरअसल बात यह है कि गांधी के जाने के बाद देश और राजनीति ने जो रास्ता पकड़ा, वह अहिंसा का नहीं रहा। स्वार्थ इतना बढ़ गया कि दूसरों की सुख-सुविधा के बारे में सोचने की इच्छा ही नहीं रही।

जब यही नहीं है तो अहिंसा का मूल, यानी दूसरों को दुख देना या दूसरों के अधिकार छीनना ही हिंसा है, यह कौन समझेगा। दूसरों के अधिकार छीनना हमें ही दुख पहुंचाएगा, जब तक हम यह नहीं समझेंगे तब तक न्याय नहीं कर सकते। गांधी ने हिंद स्वराज में ग्राम स्वतंत्रता की बात की थी, और कहा था कि बगैर उसके समानता नहीं आ सकती। लेकिन हुआ क्या? नेहरू ने गांधी को लिखा कि अंधियारे गांव देश को क्या प्रकाश देंगे? तब से हमारे देश में नेहरू की नीतियां चल रही हैं, गांधी की नहीं।

यही गलत हुआ। आज दुनिया के अनेक देशों में स्वायत्तता निचली इकाइयों तक पहुंची हुई है, लेकिन हमारे देश में इसका उलटा है। जब तक हम इस बारे में मूल रूप से सोचना शुरू नहीं करेंगे, तब तक देश में हिंसा होती रहेगी। हमें दूसरों के दुख के बारे में सोचना होगा। दलाई लामा यह कह सकते हैं क्योंकि वे वैसा ही जीवन जी रहे हैं। हमारे पास आयात करने के लिए तो बहुत कुछ है, लेकिन निर्यात करने के लिए अहिंसा के अलावा कुछ नहीं। लेकिन जो निर्यात करते हैं, उसे अपने लिए भी तो उपयोगी मानें। 

राजकुमार सिद्धार्थ अपने महल से निकले थे खुशी की तलाश में और रास्ते में उन्होंने बूढ़े, बीमार और मुर्दे को देखा। ये दुख के ही रूप हैं। गम कुछ इसी तरह से राजकुमार सिद्धार्थ की राह में खड़े थे। फिर क्या था? उन्होंने महल और रथ को छोड़कर दुख दूर करने का उपाय ढूंढने निकल पड़े। महात्मा बुद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसी के दुख को देखकर दुखी होने से अच्छा है, उसके दुख को दूर करने के लिए उसे तैयार करना।

दुख मन में होता है और कष्ट शरीर में। महात्मा बुद्ध का यह यूनिवर्सल विजन है कि सारे संसार में सबका दुख सदा-सदा के लिए कैसे दूर हो? निराला की कविता की एक लाइन है- 'दुख ही जीवन की कथा रही।' यह सच है कि दुख ही जीवन की कथा और परेशानी है। मगर इस परेशानी का अंत कैसे होगा? यही शिक्षा महात्मा बुद्ध ने दी है। राजकुमार सिद्धार्थ रथ पर सवार होकर महल से निकले, रास्ते में बूढ़े को देखा और झटका लगा कि वह भी बूढ़े होंगे। फिर उन्होंने बीमार को देखा, फिर उन्हें झटका लगा, उन्हें लगा कि वह भी बीमार पड़ेंगे। फिर उन्होंने मुर्दे को देखा और वे उन्हें जोर से झटका लगा कि वह भी मरेंगे। उन्होंने दुख को देखा और दुख के झटके से उनकी आंखें खुल गईं। दुख ने उनको जगा दिया।

इंसान चलते-फिरते, बोलते, काम करते हुए भी एक गहरी नींद में डूबा रहता है। दुख का पहाड़ इंसान को नींद से जगा देता है। दुख जगाता है। यही दुख का प्रभाव है। यही उसकी प्रासंगिकता भी है। हर दुख और पीड़ा एक संदेश देती है। जीवन जीने का संदेश। हर दुख एक चिट्ठी है। हर पीड़ा एक संदेश है। मगर हमारी आंखों पर अज्ञान का पर्दा पड़ा हुआ है, इसलिए उस संदेश को हम पढ़ नहीं पाते हैं। हम न खुद को जानते हैं और न भविष्य को। हम दुख को भोगते हैं। खुद का कोसते हैं। दूसरों को दोष देते हैं। यहां तक कि भगवान को भी दोष देते हैं। 

हिंदी फिल्मों के मंदिर में भगवान को दोष देते हुए कई सीन आपने देखे होंगे और ऐसे सीन आगे भी दिखाए जाएंगे। मगर दुख से संदेश ग्रहण करने का चलन हमारे यहां है ही नहीं। दुख से संदेश तो कोई बुद्धिमान ही लेता है। महात्मा बुद्ध का एक मूल सवाल है। जीवन का सत्य क्या है? यह प्रश्न हमारी पीड़ा से जुड़ा है। भविष्य को हम जानते नहीं है। अतीत पर या तो हम गर्व करते हैं या उसे याद करके पछताते हैं। भविष्य की चिंता में डूबे रहते हैं। दोनों दुखदायी है।

महात्मा बुद्ध ने वर्तमान का सदुपयोग करने की शिक्षा दी है। बुद्ध ने अतीत के खंडहरों और भविष्य के हवा महल से निकाल कर मनुष्य को वर्तमान में खड़ा रहने की शिक्षा दी है। बौद्ध दर्शन की रेल दया और बुद्धि की पटरी पर दौड़ती है। दया माने सबके लिए कल्याण की भावना। बिहार के बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। उनके ज्ञान की रोशनी पूरी दुनिया में फैली। चीन की कहावत है- बांस के जंगल में बैठो और निश्चिंत होकर चाय पीओ। जैसे कि चीन के प्राचीन साधु-संत किया करते थे। यानी कि जीवन की परेशानियों के बीच शांत होकर बैठना। यह ताओवाद है।

पल भर ही सही अगरअतीत के खंडहर और भविष्य के हवा महल से मुक्त जा सके तो महावीर और बुद्ध की सीख का सार कुछ तो हमारे हिस्से आएगा। आएगा, जरूर आएगा। 
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प्राध्यापक,हिन्दी विभाग,शासकीय 
दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगांव  नींद से जगा देता 

Saturday, October 3, 2015

हिंदी पत्रकारिता की भाषा का दुर्दम्य संकटकाल 
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन
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हिंदी है युग-युग की भाषा, 
हिंदी है युग-युग का पानी। 
सदियों में जो बन पाती है, 
हिंदी ऐसी अमर कहानी। 
हिंदी वह दर्पण है जिसमें,  
हर दर्शन ने मुँह देखा है। 
प्रकाश जिसको वंदन करता, 
हिंदी वह उज्ज्वल रेखा है।

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक का उत्तरार्ध साक्षी है कि हम कम्प्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल, मीडिया, सोशल मीडिया के साथ-साथ अब डिजिटल इंडिया की नई पुकार के मध्य, भाषा और संस्कृति के नए परिवेश के निर्माण की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। किन्तु, इस संक्रमणकाल में 2020 का हमारा दृष्टिपथ, विकास की अनंत अपेक्षाओं के मध्य अपनी भाषा से जुड़ी अजेय आशा के संरक्षण के समक्ष चुनौती बनकर खड़ा है। हिंदी के सामान्य प्रयोग से लेकर विविध क्षेत्रों में उसकी अभिव्यक्ति के प्रामाणिक व पाम्परिक मूल्य क्षरित होते जा रहे हैं।

 यह अकस्मात नहीं है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में भी हिंदी को अपने वैशिष्ट के अनन्तर अपने अस्तित्व की रक्षा की चिंता घेरे हुए है। जिस ज्योति को देश के स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीय नवजागरण के रूप में राजनीतिक मंच पर लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी और अन्य अनेक जनसेवकों व सरस्वती के साधकों ने जलायी और भाषा-साहित्य के मंच पर भारतेंदु, प्रेमचंद और मैथिलीशरण गुप्त आदि ने संभाली, उस ज्योति को अखंड रखना हम सब का नैतिक दायित्व ही नहीं राष्ट्रीय कर्तव्य भी है।

पत्रकारिता की भाषा का भी मनोवज्ञान है। व्यवहार में भी उससे कुछ अपेक्षाएँ सदैव रही हैं। सर्वमान्य तथ्य है कि पत्रकारिता की भाषा को सीधा, सरल और सहज होना चाहिए।उसे अपने मूल उद्देश्य से भटकना नहीं चाहिए। लेकिन, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कतिपय अपवादों को छोड़ दें तो आज हिंदी पत्रकारिता की भाषा दुर्दम्य संकटकाल का सामना कर रही है। खबरों की यात्रा, भाषा से पूरी तरह बेखबर चल रही है। हिंदी की शुद्धता की प्रतिज्ञा का तो प्रश्न ही नहीं रह गया है। अगर यह कहें कि उसकी अशुद्धता को लेकर प्रतिस्पर्धा-सी चल पड़ी है तो अतिशतयोक्ति न होगी। 

हिंदी पत्रकारिता भी भाषा आज अंग्रेजियत से जुदा नहीं है। अखबारों में तो आजकल हिंदी के शीर्षकों के बीच भी अंग्रेजी के शब्द, अंग्रेजी वर्णमाला के अनुरूप ही जड़ देने ही होड़-सी मची हुई है। ऐसा करना आम बात है। भविष्य में कहीं यह न हो कि भाद्गाा की शुद्धता शब्द पर बात करना भी एक अशुद्ध कर्म मान लिया जाए। श्री राजकिशोर का यह मंतव्य झकझोर देने वाला है कि टीवी चैनलों में उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है जो शुद्ध हिंदी के प्रति सरोकार रखते हैं। प्रथमतः तो ऐसे व्यक्तियों को लिया ही नहीं जाता। ले लेने के बाद उनसे माँग की जाती है कि वे ऐसी हिंदी लिखें और बोलें जो ऑडिएंस की समझ में आए। इस हिंदी का शुद्ध या टकसाली होना जरूरी नहीं है। चूँकि अच्छी हिंदी की माँग नहीं है और समाचार या मनोरंजन संस्थानों में उसकी कद्र भी नहीं है, इसलिए हिंदी सीखने की कोई प्रेरणा भी नहीं है। हिंदी एक ऐसी अभागी भाषा है जिसे न जानते हुए भी हिंदी की पत्रकारिता की जा सकती है।

हिंदी पत्रकारिता का इतिहास गवाह है कि पत्रकारिता की भित्ति तैयार करने वाली पीढ़ी का भाषा-स्वाभिमान कितना प्रखर था। उनमें पुष्ट विवेक था कि हिंदी की शुद्धता और उत्थान का प्रश्न हिंदी भाषी समाज के उत्थान का प्रश्न है। यही कारण है कि समाचार पत्रों की भाषा के प्रति के मूर्धन्य संपादक व पत्रकार सदा सजग रहे।

मुझे लगता है कि हिंदी पत्रकारिता में आज शुध्दता तो विरल है किन्तु अशुद्धता को वायरल करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी जा रही है। हम यह भूल गए हैं कि पत्रकारिता और भाषा का रिश्ता मौलिक और गहरा है। 
क्षमायाचना सहित, समाचार पत्रों में हिंदी की दुर्दशा के चंद उदाहरण देखिए - 

बच्चों में झूठ बोलने की हैबिट को दूर करें (शीर्षक)
प्रजेंट टाइम में अधिकांश पेरेंट्‌स अपने चिल्ड्रन्स के झूठ बोलने की हैबिट से परेशान हैं। साइकेट्रिस्ट ने इस हैबिट को दूर करने के कुछ टिप्स बताए, जो पेरेंट्‌स के लिए मददगार साबित हो सकते हैं। 
1. बच्चों से ऐसे क्वैश्चन नहीं करना चाहिए, जिनके आंसर में झूठ बोलना पड़े। बच्चे को कलर का पैकेट दिलवाने के बाद... वह वॉल को चारों ओर... रंग-बिरंगी कर देता है। उस टाइम... उसे कहें कि आज और कलर्स यूज करने की इजाजत नहीं है।
2. ...फैमिली आगे बढ़कर... नहीं करना चाहिए।
3. ...बच्चे फ्रैंड्‌स के सामने अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने और इमेज सुधारने... उनके रिलेशन में सभी ऑफिसर रैंक पर हैं। उनके कपड़े बहुत चीफ हैं। इसके लिए बच्चे को अकेले में कॉन्फिडेंस से समझाएं। उसे कहें कि उसकी ऑरिजनलिटी को दिखावे से ज्यादा पसंद किया जाएगा।
4. पेरेंट्‌स की ओर से बच्चों के बिहेव पर टफ और सखत नियंत्रण या बहुत ही फ्री एन्वायरमेंट बच्चे को झूठ बोलने को मोटिव करता है। इनके बीच का माहौल उपयुक्त रहेगा।
5. ...झूठा होने का लेबल नहीं लगाएं।
6. बच्चे से फ्रैंडली रिश्ता बनाएं।
7. फ्री स्ट्रेस के माहौल... बच्चों में टफ और मुश्किल बात को कहने के सोशल कौशल का अभाव....

अब जरा सोचें तो सही है पत्र-जगत की हिंदी आखिर कहाँ जा रही है ? 

हिंदी में इस समय इस पर भी जोर दिया जा रहा है कि आम बोलचाल की भाषा को ही पत्रकारिता की भाषा के रूप में इस्तेमाल किया जाए। साथ ही, बहुत सारे संस्करणों के साथ हिंदी समाचार-पत्रों का दायरा जितना विस्तृत होता जा रहा है, उस पर क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों का प्रभाव हावी हो रहा है। ये क्षेत्रीय भाषाएं भी अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं से बहुत से शब्द लगातार ले रही हैं। फिर समाचार सामग्री को तुरंत परोसने के उतावलेपन में भाषा पर विशेष ध्यान देने की प्राथमिकता बहुत पीछे चली गई है। ऐसे में, हिंदी के अपने शब्द भंडार से सही शब्द ढूंढ़ने की फुरसत किसके पास है। भाषा के गलत प्रयोगों की भरमार कभी, कहीं भी देखी जा सकती है। वर्तनी की एकरूपता की तो अब चर्चा तक नहीं होती। 'जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य' अर्थात्‌ पत्रकारिता अब सारे अनुशासनों को भूल चुका है। 

कहना न होगा कि हिन्दी पत्रकारिता की यह दशा चिंताजनक व चिंतनीय भी है। इस प्रसंग में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की यह धारणा पुष्ट होती है कि हिंदी को विकृत करना एक लाक्षणिक प्रयोग है।  इसका यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि हिंदी में अनुचित शब्दों का अनुचित ढंग से प्रयोग करके कोई उस भाषा को बिगाड़ता है। वस्तुतः बिगाड़ता यदि है तो उस जन समूह को जिसकी भाषा हिंदी है। आज के हालात पर क्या कहें ? पत्रकारिता की मूल मर्यादा और भाषा अनुशासन की तो बात करना भी जैसे अपराध की तरह है। 

हिंदी की अस्मिता के आजीवन सम्पोषक रहे स्व.वियोगी हरि के इन शब्दों के साथ इस आलेख का समाहार करना उपयुक्त प्रतीत होता है - जब हिंदी उपेक्षित और अपमानित थी, तब उसको इसलिए शक्ति मिलती थी कि वह विद्रोह की भाषा थी और अनवरत संघर्ष उसे मांजता था। अब उसे हमें मांजना है, नहीं तो वह मैली होगी। तूफान में नाव को तैरते रखना ही सबसे बड़ा कर्तव्य होता है, लेकिन जब तूफान नहीं होता तब केवल तैरने से ही नाव कहीं नहीं पहुँच जाती, उसे खेना होता है, और ठीक दिशा में खेना होता है, जिसके लिए नक्शों की आवश्यकता होती है, और दिग्दर्शकों की, और कर्णधारों, और समर्थ मल्लाहों की....।
 
हिंदी पत्रकारों की नई पीढ़ी को पत्रकारिता की भाषागत नाव को सही दिशा में खेने के विवेक के प्रश्न पर गंभीरता से विचार करना होगा। अंत में बस इतना ही - 

जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख, 
और इसके बाद भी हम से बड़ा तू दिख।
                                      - भवानीप्रसाद मिश्र 

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हिन्दी विभाग, 
शासकीय दिग्विजय स्वशासी 
स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजनांदगाँव।
MO.9301054300

Wednesday, August 26, 2015

संथारा : आत्मनिष्ठा का अनुपम अनुष्ठान
डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

यह अकस्मात नहीं है कि जैन सन्तों एवं आचार्यों द्वारा जैन धर्म के नियमानुसार ली जाने वाली संथारा व संलेखना समाधि पर राजस्थान हाईकोर्ट के द्वारा लगाई गई रोक के विरोध में जैन समाज 24 अगस्त को देश भर में धरना प्रदर्शन व रैली निकालने के साथ कारोबार बंद रखा। रैली के बाद पूरे देश में विरोध स्वरूप ज्ञापन भी जिला प्रशासन को सौंपा गया। 

दरअसल श्रमण संस्कृति की अति प्राचीन और अहम धारा जैन धर्म की परम्परा में संलेखना और संथारा को सदैव बहुत उच्च साहसिक त्याग का प्रतीक माना गया है। सर्वविदित है कि शांति प्रिय जैन समाज, अहिंसक मूल्यों की प्रतिष्ठा और उनके अनुपालन के नाम से ही प्रसिद्द है। इसलिए, विरोध और आंदोलन इसके बुनियादी तेवर से बहुत दूर की बात है। किन्तु, संथारे पर बंदिश ने कहीं-न-कहीं से जैन धर्म की दिव्य परम्परा पर सवालिया निशान पैदा कर पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। लिहाज़ा, इस निर्णय के विरोध में स्वर उठना स्वाभाविक है। फिर भी, क़ाबिलेगौर है कि जैन धर्म के मूल्यों और न्यायालय की मर्यादा को भी ध्यान में रखते हुए समाज ने मौन रैली सहित शांतिपूर्ण प्रदर्शन का मार्ग अपनाने का फैसला किया। 

समरणीय है कि जैन समाज में यह पुरानी प्रथा है कि जब किसी तपस्वी व्यक्ति को लगता है कि वह मृत्यु के द्वार पर खड़ा है तो वह स्वयं अन्न-जल त्याग देता है। जैन शास्त्रों में इस तरह की मृत्यु को संथारा कहा जाता है। इसे जीवन की अंतिम साधना के रूप में स्थान प्रदान किया है। अंतिम समय की आहट सुन कर सब कुछ त्यागकर मृत्यु को भी सहर्ष गले लगाने के लिए तैयार हो जाना वास्तव में बड़ी हिम्मत का काम है। जैन परम्परा में इसे वीरों का कृत्य माना जाता है। यहां वर्धमान से महावीर बनाने की यात्रा भी त्याग, उत्सर्ग और अपार सहनशीलता का ही दूसरा नाम है। यह समझना भूल है कि संथारा लेने वाले व्यक्ति का अन्न जल जानबूझकर या जबरदस्ती बंद करा दिया जाता है। संथारा में व्यक्ति खुद भोजन का त्याग धीरे-धीरे करता जाता है। अन्न जब अपाच्य हो जाय तब स्वतः सर्वत्याग की स्थिति बन जाती है।  

जैन धर्म-शास्त्रों के विद्वानों का मानना है कि आज के दौर की तरह वेंटिलेटर पर दुनिया से दूर रहकर और मुंह मोड़कर मौत का इंतजार करने से बेहतर है संथारा प्रथा। यहाँ धैर्य पूर्वक अंतिम समय तक जीवन को पूरे आदर और समझदारी के साथ जीने की कला का नाम है संथारा। यह आत्महत्या नहीं, आत्म समाधि की मिसाल है और समाधि को जैन धर्म ही नहीं, भारतीय संस्कृति में कितनी गहन मान्यता दी गई है, शायद लिखने की ज़रुरत नहीं है। सोचना चाहिए कि किसी भी तरह की बड़ी या छोटी से छोटी हिंसा को भी कभी, कोई अनुमति नहीं देने वाला जैन धर्म आत्महंता नियति को कैसे स्वीकार कर सकता है ? यहाँ तो त्याग ही जीवन और जीवन साधना का शिखर भी है। संथारा आत्मनिष्ठा का अनुपम अनुष्ठान है। वास्तव में यह क्षणभंगुरता के विरुद्ध शास्वत चेतना का शंखनाद है। 

जैन समाज ने संथारा पर राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा जारी फैसले के विरोध में खड़े होकर अगर न्याय के मंदिर से अपने ही फैसले की पुनः समीक्षा करने की आवाज़ बुलंद की है तो कहना न होगा कि वह इस मामले में तो लाज़िमी है। आखिर, प्रकृति का न्याय भी यही कहता है धर्म ही तो धरती को धारण किये हुए है। उम्मीद की जानी चाहिए कि परमात्म साधना के साधन यानी संथारा को उसकी यथोचित गरिमा और महिमा के नज़रिये से देखा और समझा जाएगा ताकि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में साधना और उपासना की स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक अधिकार की भी रक्षा हो सके। 
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Monday, August 17, 2015

आत्मविश्वास जगाने के मैक्गिनिस के बारह नियम 
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एक - अपनी सीमाओं के बजाय अपनी क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करें। 

दो - अपने बारे में सच्चाई जानने का संकल्प करें।  

तीन - अपनी पहचान और काम में फर्क करें। 

चार - कोई ऐसा काम खोजें, जिसे करना आपको पसंद हो और उसे अच्छी तरह करें, फिर उसे बार-बार करें। 

पांच - आत्म-आलोचना की जगह पर नियमित, सकारात्मक आत्म-चर्चा करें। 

छह  - असफलता के डर की जगह पर अपने बारे में ऎसी स्पष्ट काल्पनिक तस्वीर देखें, जिसमें आप खुशी-खुशी          काम कर रहे हों और सफलता पा रहे हों। 

सात - थोड़े अजीब बनने का साहस करें। 

आठ - अपने माता-पिता की साथ सर्वश्रेष्ठ संभव शान्ति स्थापित करें। 

नौ - शरीर और आत्मा के एकीकरण का फैसला करें। 

दस - अनावश्यक अपराधबोध से मुक्त जीवन जीने का फैसला करें। 

ग्यारह - ऐसे लोगों से संपर्क बढ़ाएं, जो आत्मविश्वास बढ़ाने में आपकी मदद करें। 

बारह - अस्वीकृति को इस बात की अनुमति न दें कि वह आपको लोगों के साथ पहल करने से रोकें। 

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Wednesday, October 15, 2014

मानवता के 'कैलाश' और बाल अधिकारों के 'सत्यार्थी' का संघर्ष  

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

शांति का नोबेल पुरस्कार हासिल करने वाले कैलाश सत्यार्थी मध्य प्रदेश के विदिशा में बचपन के दिनों में लाइब्रेरी से किताबें लाते थे और लैंप पोस्ट के नीचे बैठकर पढ़ते थे। उनका बचपन जन्म स्थान विदिशा की तंग गलियों में बीता। उन्होंने प्राइमरी से लेकर इंजीनियरिंग तक की शिक्षा यहीं से हासिल की। उनके पिता हेड कांस्टेबल थे। नोबल पुरस्कार की घोषणा होने के बाद अमूमन शांत रहने वाली किले अंदर स्थित उसी तंग गली में चहल-कदमी बढ़ गई। लोगों की खुशी का वहां पारावार नहीं, इसी घर पर भीख मांगने आने वाले बच्चों को कैलाश खाना खिलाते थे। उन्हें लिखने-पढ़ने के लिए कॉपी किताबें दिया करते थे। स्नेह,सहयोग,करुणा और संघर्ष जैसे गुण तो जैसे उनके परिवार का परिचय ही बन गए थे। 

स्वामी विवेकानंद ने कहा है - संभव की सीमा जानने का केवल एक तरीका है, असंभव से भी आगे निकल जाना। इसीलिए यह भी सच है कि जीवन की सबसे बड़ी खुशी उस काम को करने में है जिसे लोग समझते हैं कि आप नहीं कर सकते। कैलाश सत्यार्थी ने जब बच्चो के हक़ के लिए काम करना और लड़ना शुरू किया तो ज़ाहिर है हर नई पहल की तरह उनकी कोशिशो को भी शक की निगाहों से देखा गया। वे जूझते रहे और लोग उनके साथ आते गए।  दूसरी तरफ लोग ऐसे भी मिले जो उनके कार्यों को सरकार विरोधी करार देने से भी बाज़ नहीं आये।  फिर क्या,उन पर हमले हुए. उनके साथ दुर्व्यवहार भी होता रहा। लेकिन, तमाम सवालों के ज़वाब एकबारगी देने के बदले जो राह चुनी थी उस पर चलते जाने के अडिग संकल्प के साथ कैलाश जी ने दमन के विरुद्ध धीरज का  दामन थाम और जैसे दुनिया वालों से कह दिया कि -

अभी न पूछो हमसे मंज़िल कहाँ है 
अभी तो हमने चलने का इरादा किया है 
न हारे हैं, न हारेंगे कभी हम 
खुद से ही हमने ये वादा किया है।  

दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी तरह की दासता की जंजीरों में जकड़े हुए बचपन को आज़ाद करने के लिए दुनिया की सभी आवाज़ों, दिमागों और आत्माओं को लयबद्ध करने की अंतहीन और असरदार गुहार लगाते आ रहे कैलाश सत्यार्थी वास्तव में बच्चों की दुनिया के निराले और बिरले सत्य-शोधक हैं।   सर्वविदित है कि बाल अधिकारों के लिए काम करने और उनकी शिक्षा के दिशा में किए गए प्रयासों के लिए मलाला यूसुफजई के साथ संयुक्त रूप से 2014 का नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाले कैलाश सत्यार्थी 1990 से ही बच्चों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

बच्चों के हक़ के संघर्ष की जीत 
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गौरतलब है कि इस सम्मान पर कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि वह नोबेल शांति अवॉर्ड मिलने से बहुत खुश हैं। यह पुरस्कार बच्चों के अधिकारों के लिए हमारे संघर्ष की जीत है। सत्यार्थी ने कहा कि वह नोबेल समिति के शुक्रगुजार हैं कि उसने आज के आधुनिक युग में भी दुर्दशा के शिकार लाखों बच्चों की दर्द को पहचाना है। सत्यार्थी ने कहा कि वह मलाला यूसुफजई को व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं। वह मलाला को अपने साथ काम करने के लिए आमंत्रित करेंगे। वहीं,कैलाश सत्यार्थी की पत्नी सुमेधा सत्यार्थी ने कहा कि इस सम्मान के बाद मैं यही कहूंगी कि बाल मजदूरी मानवता पर कलंक है। उम्मीद है पूरी दुनिया इस कलंक को मिटाने के लिए कदम बढ़ाएगी। सुमेधा ने कहा कि यह हमारा दुर्भाग्य है कि अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिलने के बाद ही देश में गंभीरता से लिया जाता है। हम भी उम्मीद करते हैं कि इस सम्मान के बाद सरकार बाल दासता से मुक्ति के लिए सार्थक कदम उठाएगी। 

क़ाबिलेगौर है कि मदर टेरेसा (1979) के बाद कैलाश सत्यार्थी सिर्फ दूसरे भारतीय हैं जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया है। वैसे वह नोबल पुरस्कार पाने वाले सातवें भारतीय हैं। उनके सार्थक प्रयत्नों के प्रभाव का प्रत्यक्ष गवाह बाल मित्र ग्राम वह मॉडल गांव है जो बाल शोषण से पूरी तरह मुक्त है और यहां बाल अधिकार को तरजीह दी जाती है. 2001 में इस मॉडल को अपनाने के बाद से देश के 11 राज्यों के 356 गांवों को अब तक चाइल्ड फ्रेंडली विलेज घोषित किया जा चुका है। 

बचपन की वह यादगार घटना 
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मानवीय सरोकारों के सुधी चिंतक हिमांशु शेखर बड़े प्रेरक अंदाज़ में बताते हैं कि मध्यप्रदेश के विदिशा में एक मध्यमवर्गीय परिवार का पांच वर्षीय एक बच्चा पहली बार स्कूल जाता है। उस विद्यालय के बाहर वह लड़का अपने एक हमउम्र को जूता पालिश करते देखता है। वह गौर करता है कि जूता पालिश करने वाला बच्चा स्कूल जाने वाले बच्चों के जूतों को निहार रहा है। पहली बार स्कूल जा रहे बच्चे को यह बात अखर जाती है कि सारे बच्चे स्कूल जा रहे हैं लेकिन वह क्यों नहीं जा रहा है। वह इसकी शिकायत अपने शिक्षक से करता है और उचित जवाब नहीं मिलने पर स्कूल के हेडमास्टर से भी इसकी नालिश कर देता है। वहां उसे जवाब मिलता है कि इस जग में ऐसा होता है। अगले दिन वह लड़का जूता पालिश करने वाले बच्चे के पिता के पास जाकर पूछ बैठता है कि वे अपने बच्चे को स्कूल क्यों नहीं भेज रहे हैं? वह अभागा पिता इस नन्हें बालक को देखता रह जाता है और जो जवाब देता है, वह किसी भी सभ्य समाज को पानी-पानी कर देने के लिए काफी है। वह कहता है, ‘बाबू जी, स्कूल में न तो मैं पढ़ने गया और न ही मेरे पूर्वज गए इसलिए यह भी नहीं जा रहा है। हम तो मजूरी और दूसरों की सेवा करने के लिए ही पैदा हुए हैं।’ इस जवाब से हैरान-परेशान वह मासूम चाहते हुए भी उस अभागे बच्चे के लिए कुछ नहीं कर पाता है, लेकिन वह घटना उसके मन के किसी कोने में पड़ी रहती है। वही बच्चा जब जवान होता है तो एक वक्त ऐसा आता है कि वह लेक्चररशिप छोड़कर मासूमों को उनकी मासूमियत लौटाने की मुहिम में लग जाता है। वही मुहिम कुछ ही वर्षों में ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ का रूप धारण कर लेती है और वह बच्चा देश के हजारों बच्चों की जीवन रेखा बन जाता है। 

बाल श्रम,दान और कल्याण 
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कैलाश ने बाल श्रम को मानवाधिकार के मुद्दे के साथ ही दान और कल्याण के साथ जोड़ा। उन्होंने तर्क दिया कि यह गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, जनसंख्या वृद्धि और अन्य सामाजिक समस्याओं को बढ़ावा देती है। कैलाश की बात को बाद में कई अध्ययनों ने भी सही साबित किया। न्होंने बाल श्रम के खिलाफ अपने आंदोलन को 'सबके लिए शिक्षा' से भी जोड़ा और इसके लिए यूनेस्को द्वारा चलाए गए कार्यक्रम से भी जुड़े। ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर एजुकेशन के बोर्ड में भी शामिल रहे। उन्हें बाल श्रम के खिलाफ और बच्चों की शिक्षा के लिए देश और विदेश में बनाए गए कानूनों, संधियों और संविधान संशोधन कराने में अहम भूमिका निभाने का श्रेय दिया जाता है। 

कैलाश के नेतृत्व में 108 देशों के चौदह हजार संगठनों के सहयोग से बाल मजदूरी विरोधी विश्व यात्रा आयोजित हुई। इसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। इसके प्र्रभाव के बारे में सत्यार्थी कहते हैं -आंदोलन का लाभ यह हुआ कि सार्क के सदस्य देशों ने जल्द ही बाल मजदूरी पर एक कार्यदल बनाने की घोषणा की है। दरअसल उन पर गर्व करने से भी ज्यादा जरूरी है कि उनके जैसी हिम्मत और जीवट के साथ ऐसे महान कार्यों को आगे बढ़ाया जाए। हम सोचें कि हम नहीं तो फिर कौन और अभी नहीं तो फिर कब ?

आज़ाद हुए 80  हजार बच्चे 
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लेकिन यह इतना आसान भी नहीं रहा। सत्यार्थी को अपमान झेलने पड़े, उन पर हमले हुए और राष्ट्रहित के विरोध में काम करने का आरोप लगा। उनके संगठन ने अब तक 80 हजार बच्चों को आजाद कराया है। बाल मजदूरी की पूर्ण समाप्ति के लिए बचपन बचाओ आंदोलन ने बाल मित्र ग्राम की परिकल्पना की है। इसके तहत किसी ऐसे गांव का चयन किया जाता है जहां बाल मजदूरी का चलन हो। गांव से धीरे-धीरे बाल मजदूरी समाप्त की जाती है और बच्चों का स्कूल में नाम लिखवाया जाता है। लेकिन भारत के बच्चों के जीवन में उजाला लाने का सपना पूरा होने के करीब भी नहीं पहुंच रहा।

आज भी बच्चे काम पर जाते हैं। फुटपाथ पर सो जाते हैं। देश में हर आठ मिनट में एक बच्चा गुम होता है और उनमें से आधे फिर कभी नहीं मिलते। वे तरह-तरह  के शोषण के शिकार होते हैं। घरों-दुकानों में, होटलों मे काम करते हैं, सड़कों पर भीख मांगते हैं। पटाखा बनाने के जानलेवा काम में उनकी मौजूदगी जल्द ही दिवाली की कानफाड़ू चहल-पहल के रूप में दिखाई देने लगी है। ज़रा सोचिये तो सही,यह सिर्फ कैलाश सत्यार्थी की नहीं, सरकार और समाज की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों के दुख से नजर न फेरें और उनकी बेरंग जिंदगी में थोड़ी रोशनी लाने की कोशिश करें। उन्हें पानी या दूध की थाल में चाँद का प्रतिबिम्ब दिखाने से बेहतर है कि हम उन्हें नन्हे हाथो से आसमान के चाँद को छूने के काबिल बनाएँ। बच्चों का आज बचेगा तभी तो देश का कल रहेगा। 
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हिन्दी विभाग, 
शासकीय दिग्विजय पीजी कालेज,
राजनांदगांव, मो.9301054300 

Tuesday, October 14, 2014

बच्चों के दिलों ने जब खिलकर कहा - 'मुमकिन है'
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मुख्यमंत्री बाल ह्रदय सुरक्षा में 
छत्तीसगढ़ी संवेदना की धड़कनें 
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

बच्चों के दिलों की धड़कनों को सुनने के लिए लगता है कि सचमुच बच्चों जैसा कोमल दिल चाहिए। एक मासूम-सी चाहत जहाँ अनजाने में ही आने वाले कल को कुछ कर दिखाने का वचन दे रही हो उस चाहत को किसी भी सूरत में आहत नही न होने देना वास्तव में एक बड़ी जिम्मेदारी और समझदारी से भरा काम है। शायद यही वज़ह है कि हरेक दिल में छुपा कोई बच्चा बार-बार बेचैन हो कर पुकार उठता है कि मुझे अगर सुनना है तो सयानेपन से नहीं, मुझ जैसी मासूमियत से ही बात बन सकती है। लिहाज़ा, दिल के मामले में भी बच्चों की तकलीफों को दिल से जानने और समझने की सख्त दरकार हमेशा रही है।और  इस लिहाज़ से अगर देखें तो कहना न होगा कि हृदय रोग से पीड़ित बच्चों के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा संचालित मुख्यमंत्री बाल हृदय सुरक्षा योजना वास्तव में वरदान सिद्ध हुई है। संस्कृति, सम्पदा और संवेदना की कर्मभूमि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह जी की बच्चों में अभिन्न रूचि और ह्रदय रोग से पीड़ित बच्चों की पुकार से उनके गहन सरोकार ने इस महत योजना को मानवता के नाम एक महान सन्देश की शक्ल में ढाल दिया है। 

असर की चंद मिसालें 
- कारवाँ बनता गया 
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दूर क्या जाना,यहीं, अभी कुछ मिसालें पहले देख लीजिये - दुर्ग जिले के ग्राम जेवरा सिरसा निवासी डोमन लाल साहू के अनुसार उनकी ढाई वर्षीय बेटी हेतल जन्म से ही हृदय रोग से पीड़ित थी। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण अपनी बेटी का इलाज कराना संभव नहीं हो पा रहा था। उनका परिवार आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। बेटी के जन्म पश्चात् ही उसके हृदय में छेद होने की जानकारी मिलने पर उनका परिवार बहुत दुखी था। बेटी का इलाज कराने में असमर्थ होने के कारण पूरा परिवार बच्ची की जिंदगी की सलामती के लिए सिर्फ दुआ ही कर सकता था। 

इस दौरान श्री साहू को पता चला कि छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मुख्यमंत्री बाल हृदय योजना संचालित की गई है। योजना में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के एक साल से 15 वर्ष तक उम्र के हृदय रोगी बच्चों का निःशुल्क इलाज और निःशुल्क ऑपरेशन किया जाता है। फिर क्या, भिलाई नगर स्थित अपोलो बीआरएस अस्पताल में उन्होंने अपनी बेटी का स्वास्थ्य परीक्षण कराया। वहां उसका ऑपरेशन हो गया है। ऑपरेशन पूरी तरह कामयाब है। बच्ची के स्वास्थ्य में लगातार सुधार हो रहा है।अपनी बेटी का निःशुल्क इलाज होने से श्री साहू का परिवार काफी खुश है। स्वाभाविक है कि श्री साहू ने इसके लिए मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह जी और अस्पताल प्रबंधन के प्रति आभार व्यक्त किया। 

राज्य शासन से इस योजना के लिए अधिकृत अपोलो बी.एस.आर.अस्पताल भिलाई नगर में मुख्यमंत्री बाल हृदय सुरक्षा योजना के तहत बच्चों की ह्रदय शल्य चिकित्सा का सिलसिला जारी है। अपोलो बीएसआर भिलाई नगर में गुण्डरदेही की खोमिन को बहुत गंभीर स्थिति में लाया गया था, लेकिन इस योजना के तहत उसका सफल आपरेशन किया गया।  जटिल शल्य क्रिया कर उसके दिल का वाल्व बदला गया। 14 दिन अस्पताल में रहकर खोमिन हँसते-मुस्कुराते अपने घर चली गई। राजनांदगांव के एक छोटे से गाँव केसला की दस साल की बालिका रौशनी को भी इस योजना से ज़िंदगी की नई रौशनी मिल चुकी है।अपोलो बीआरएस अस्पताल में ही इलाज करा चुके तेजस्वी पिता श्री खोमलाल साहू निवासी कातलबाही (डोंगरगढ़/राजनांदगांव), पूजा ठाकुर पिता श्री देवसिंग (तरौद/बालोद), अरूण प्रधान पिता श्री परशुराम प्रधान (करतमा/सुरजपुर) ने भी मुख्यमंत्री बाल हृदय योजना की प्रशंसा करते हुए मुख्यमंत्री के प्रति आभार प्रकट किया है। यह योजना प्रदेश में विभिन्न मान्यता प्राप्त और अनुबंधित अस्पतालों में 28 जुलाई 2008 से चल रही है। 

बच्चों को मिली नई ज़िंदगी 
- डॉ.ए.पी.सावंत 
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अपोलो बीआरएस अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ और मेडिकल डायरेक्टर डॉ. ए.पी.सावंत ने बताया कि राज्य सरकार ने उनके अस्पताल को इस योजना में शामिल किया है। मुख्यमंत्री बाल हृदय योजना शासन की बहुत ही महत्वकांक्षी योजना है। जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित बच्चों का निःशुल्क इलाज होने पर छत्तीसगढ़ में ऐसे हजारों बच्चों को नई जिंदगी मिली है। उन्होंने इस आलेख के लेखक से को बताया कि अपोलो बीआरएस अस्पताल में बच्चों का निःशुल्क ऑपरेशन योजना अंतर्गत मुख्यमंत्री बाल हृदय सुरक्षा योजना की शुरूआत की गई थी। प्रदेश के पन्द्रह वर्ष आयु तक के हृदय रोग से पीड़ित बच्चों को सात प्रकार के हृदय रोगों का सरकारी व्यय पर इलाज के साथ उनकी शल्य क्रिया मान्यता प्राप्त चिकित्सालयों मे कराई जाती है। एक वर्ष से कम उम्र के ऐसे पीड़ित  बच्चे जिन्हें तत्काल उपचार आवश्यक है को शासन द्वारा गठित तकनीकी समिति से अनुमोदन प्राप्त किया जाकर प्रदेश एवं देश के मान्यता प्राप्त संस्थानों में चिकित्सकों की अनुशंसा उपरांत उपचार हेतु भेजा जाता है। अपोलो बीएसआर भिलाई के सीएमडी डॉ.एम.के.खंडूजा के मागदर्शन में ह्रदय रोग विशेषज्ञ डॉ.दिलीप रत्नानी, कार्डियक सर्जन डॉ.निमिष राय और अन्य विधाओं के चिकित्सकों और कर्मठ स्टाफ सहयोग से मुख्यमंत्री बाल ह्रदय सुरक्षा योजना जैसी मानवीय गतिविधि को सफलता पूर्वक संपादित किया जाता है। सर्जरी के समय तमाम मुफ्त सुविधाओं की अलावा तीन फॉलोअप का क्रम भी बाकायदा चलता है। 

निराशा में नव-प्राण का संचार 
- डॉ. दिलीप रत्नानी 
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लेखक से चर्चा करते हुए ह्रदय रोग विशेषज्ञ डॉ.दिलीप रत्नानी ने कहा कि बच्चे ही देश के भविष्य हैं जिनकी सेहत और सुरक्षा पर देश की आन-बान-शान निर्भर है। इसलिए बच्चों के दिल की कठिनाइयों को दिल से सुनना और उसे दूर करने की मुहिम चलाना बेशक बड़ी बात है। मुख्यमंत्री बाल ह्रदय ह्रदय सुरक्षा योजना ने प्रदेश के उन तमाम बच्चों  और उनके अभिभावकों में नई आशा और नए विश्वास का सृजन किया है जो साधन और सामर्थ्य की कमी या दीगर कारणों से प्रदेश के बाहर बड़े अस्पतालों में इलाज करवाने जा नहीं पाते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों के ह्रदय रोग को लेकर हताश और निराश हुए लोगों में इस योजना ने नव-प्राण फूके हैं। इसे ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहन मिलना चाहिए। 

महतारी की संतानों को सहारा 
आबाद रहे छत्तीसगढ़ हमारा 
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वही,डॉ.सावंत भी जोर देकर कहते हैं कि मान्य और अधिकृत अस्पतालों की तमाम सुविधाओं और तल्लीन सेवाओं को प्रदेश सरकार की इस अति महत्वपूर्ण योजना को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए अधिक और सतत आर्थिक सम्बल की जरूरत है। उन्होंने योजना को लेकर सीएम डॉ.रमन सिंह की सोच दाद देते हुए कहा बाल ह्रदय सुरक्षा योजना छत्तीसगढ़ महतारी की संतानों की जिंदगी में नई ज्योत, नई किरण का पर्याय बन गई है। परिजनों की तो क्या कहें, सीएम भी जब इन बच्चों को सर्जरी के बाद हँसते-खेलते-मुस्कुराते देखते हैं तो प्रसन्न हो जाते हैं। 

इस योजना के तहत ऑपरेशनों के लिए राज्य शासन द्वारा अपोलो बी एस आर भिलाई, एस्कॉर्ट हार्ट सेन्टर रायपुर, रामकृष्ण केयर रायपुर और अपोलो अस्पताल बिलासपुर को अधिकृत किया गया है।  समय गवाह है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जी  ने अपने जनदर्शन कार्यक्रम में बच्चों के हृदय से संबंधित बीमारियों के इलाज के लिए सहायता मांगने वालों की संख्या को देखते हुए मुख्यमंत्री बाल हृदय सुरक्षा योजना की शुरूआत 2008 में की थी। यह योजना अब हृदय रोग से पीड़ित बच्चों के लिए वरदान और संवेदनशील छत्तीसगढ़ की पहचान बन गई है। आइये हम भी तय करें कि बच्चों की मासूम मुस्कान को परवान चढाने और उनकी उड़ान को गगन की हर ऊंचाई तक ले जाने के ऐसे हर महान अनुष्ठान में हर संभव भागीदारी करेंगे। 
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