अँधेरा चाहे जितना घना हो
पहाढ़ चाहे जितना तना हो
एक लगन यदि लग जाये
एक कदम यदि उठ जाये
कम हो जाता है अँधेरे का असर
झुक जाती है पहाढ़ की भी नज़र
अँधेरा तो रौशनी की रहनुमाई है
पहाढ़ तो प्रेम की परछाई है
आदमी के लिए अच्छा है
वह आलोक के लिए जले
कहीं पहुँचने के लिए चले
सच तो यह है कि
धाराओं के विपरीत
जो आदमी जितनी शक्ति से
खड़ा होता है
उस आदमी का व्यक्तित्व
दिन उतना ही बड़ा होता है .
Thursday, October 25, 2007
कविता.
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