Wednesday, September 22, 2010

प्रेरक मुक्तक.

मानस के राजहंस डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र जी
हिंदी की वह विरल विभूति हैं जिनकी वाणी
ग्राम्य-कुटीर से लेकर राष्ट्रपति भवन तक गूंजी
उन्हें सन 1939 में, हिंदी में लिखित
शोध प्रबंध 'तुलसी दर्शन' पर
डी.लिट की उपाधि से अलंकृत किया गया था।
बहरहाल....पढ़िए आचार्य प्रवर के चंद प्रेरक मुक्तक...

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एक
माना कि विषमताएँ दुनिया को घेरे हैं
उस घेरे को भी घेर धैर्य से बढ़े चलो
उल्लास भरा है तो मंज़िल तय ही होगी
मंज़िल को भी सोपान बनाकर बढ़े चलो

दो
निश्चय समझो जो कभी तुम्हारा बाधक था
वह देख तुम्हारा तेज स्वयं साधक होगा
तुम अपने आदर्शों के आराधक हो लो
पथ स्वयं तुम्हारे पथ का आराधक होगा

तीन
किसको न बुढ़ापा आता है इस जीवन में
पर वह क्या, जिसकी यौवन में झुक जाये कमर ?
जो होना है वह होगा, तब होगा लेकिन
पहले ही ध्वस्त हुए क्यों अनहोने भय पर ?


चार
अकबर महान हो यदि अपने ऐश्वर्यों में
शंकराचार्य ने यदि दिमाग आला पाया
तो मैं भी तो हूँ शहंशाह अपने दिल का
मैं क्यों मानूँ मैं छोटा ही बनकर आया ?

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Saturday, September 18, 2010

मेरी लड़की

मेरी लड़की
बरसात का चित्र निकाल रही है

चित्रों में रंग भरते हुए वो मुझसे पूछती है
बाबा, बारिश को कौन सा रंग दूं ?
मैं क्या बताऊँ
उसे बारिश का कौन सा रंग बताऊँ ?
अंकुर पैदा होने वाली मिट्टी की खातिर
बारिश का रंग हरा होता है बताऊँ,

कि एक छतरी में चलने वाले उन दोनों के लिए
बारिश का रंग गुलाबी होता है, ऐसा बताऊँ ?

खेतों में नाचने वाले धान के दानों की खातिर
बारिश का रंग सफेद होता है, ऐसा बताऊँ,

कि उड़ चुके छप्पर वाली झोपड़ी के चूल्हे की खातिर
बारिश का रंग काला होता है, ऐसा बताऊँ,

कि युद्ध में शहीद हो चुकी विधवा की खातिर
बारिश का रंग लाल होता है, ऐसा बताऊँ ?

आप ही बताइए मैं क्या बताऊँ
उसे बारिश का कौन सा रंग बताऊँ ?
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श्री प्रशांत असनारे की मूल मराठी कविता
अनुवाद किया है - श्री राजेश गनोदवाले ने।
नवभारत, रविवार 19 सितम्बर 2010 से साभार प्रस्तुत।
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Sunday, September 12, 2010

बात मत कर.....!

मुर्दा घरों में कहकहों की बात मत कर
मूक बज्मों में ग़ज़ल की बात मत कर
अरसे के बाद जिनके लिए निकलता है सूरज
उन सियाह तकदीरों की सुबह को रात मत कर
जो शहर में बमुश्किल दिखाई दिया करते हैं
ऐसे लोगों से सरे राह मुलाक़ात मत कर
जिन्होंने एक भी वादा निभा कर न दिखाया हो
उन छतों पर आग्रहों की बरसात मत कर
ये समझ तू कातिलों की महफ़िल में है
ऐसी जगह बंदीगृहों की बात मत कर
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सुदर्शन शंगारी की ग़ज़ल साभार प्रस्तुत

Wednesday, September 8, 2010

अगर कहीं बादल ने अपनी....!

अगर कहीं बादल ने अपनी जल वर्षा की कीमत माँगी
हरी चुनरिया इस धरती की श्याम चुनरिया हो जायेगी

हो सकता है प्यास-प्यास ने पूरी प्यास दिखाई न हो
शुष्क नदी ने कथा व्यथा की भर-भर आँख सुनाई न हो

हो सकता है सागर ने भी कम पानी के मेघ रचे हों
लौटे बादल की छागल में पानी के कण शेष बचे हों
ऐसे में दोषी ठहराना बादल भर को सही नहीं है
बादल ने भी जल-वर्षा की कीमत मुख से कही नहीं है

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अशोक शर्मा की कविता 'देशबंधु' से साभार प्रस्तुत
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Thursday, September 2, 2010

वे सुन नहीं सकते....!

वे सुन नहीं सकते
हालांकि वे सुनना चाहते हैं
पेड़ों और हवाओं के गीत
दरियाओं का संगीत
आबी परिंदों की आवाजें
शहंशाह आलम की कविताएँ
कोशिश करें तो
वे भी सुन सकते हैं
सुनने की सारी चीजे हैं
इसलिए वे शहर बहरे नहीं हैं
हमीं ने उन्हें
बहरा किया हुआ है अनंत काल से !
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शहंशाह आलम की रचना।
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Wednesday, August 4, 2010

मुक्तक....

माटी को रौंदो इतना अपने पाँवों से,
कि कला- करों से माटी की मूरत गढ़ जाए।
कई सीढियां चढ़ीं अभी अनगिन बाक़ी हैं,
जिन पर चढ़ कर ये जीवन ऊपर चढ़ जाए।।
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Wednesday, June 23, 2010

इच्छा उम्र से ज्यादा जीने की...!

घास को देखो
बार-बार उग आते हैं
नाखून बार-बार बढ़ जाते हैं
वैसे ही बाल भी
कितनी जिद है इनमें
उम्र से ज्यादा जीने की
इच्छा
बने रहने की....!
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भास्कर चौधरी की रचना साभार.