घास को देखोबार-बार उग आते हैं
नाखून बार-बार बढ़ जाते हैं
वैसे ही बाल भी
कितनी जिद है इनमें
उम्र से ज्यादा जीने की
इच्छा
बने रहने की....!
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भास्कर चौधरी की रचना साभार.
बिखरते टूटते लम्हों को अपना हमसफ़र जाना
बड़ी-बड़ी बातों से
बस एक काम यही बार-बार करता था