Friday, August 1, 2008

वह सावन ही क्या...!


वह सावन ही क्या

बहती जिसमें रस धार नहीं

वह पावन ही क्या

जिसके मन में जग-प्यार नहीं

समझी ही नहीं पीड़ा

जिसने व्याकुल मन की

वह जीवन ही क्या

जिसका कोई आधार नहीं

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8 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया!!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

वह जीवन ही क्या जिसका कोई आधार नहीं=================बहुत सही

नीरज गोस्वामी said...

जैन साहेब
हमेशा की तरह सच्ची बात को बहुत खूबसूरती से कहने का आपका ये फन लाजवाब रहा...
नीरज

अजित वडनेरकर said...

बहुत अच्छी बात।
आधार बिना जीवन ही क्या ?

बाल किशन said...

बहुत उम्दा... बेहतरीन.
जवाब नहीं आपका.

मीत said...

सही है भाई. इतनी छोटी-सी, कितनी बड़ी बात. ये आप का ही अंदाज़ है.

शोभा said...

समझी ही नहीं पीड़ा

जिसने व्याकुल मन की

वह जीवन ही क्या

जिसका कोई आधार नहीं
सरल भाषा में आप बहुत कुछ कह गए। बधाई स्वीकारें।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अंतस्तल से आभार.
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डा.चन्द्रकुमार जैन