Friday, April 1, 2011

नया मुक्तक.


हर रात के पीछे प्रभात ढूंढता हूँ मैं,

गर्द के भी नीचे जवाहरात ढूंढता हूँ मैं।

ढूंढने की आदत से इस तरह मजबूर हूँ,

बेबात में भी अक़्सर कोई बात ढूंढता हूँ मैं

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3 comments:

Madhur said...

आपकी ढूंढने की इसी आदत ने, कभी आपके अन्दर से तो कभी बाहर से, बेहतरीन रचनाएं हमें पढ़ने दीं | धन्यवाद ,आदत बनाए रखिये...

kailash chandra sharma said...

सतत तलास की आदत ही नहीं , उत्कृष्टता की पहचान का कौशल भी आपमें है , भाईजी

swapneshchauhan said...

bahut barhiya....