Saturday, September 8, 2012

अच्छा बोलना एक शक्ति और कला भी है


डॉ. चन्द्रकुमार जैन
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मो. 9301054300

इक्कीसवीं सदी का यह नया दौर ही कहा जा सकता है की संस्थानों में प्रबंधकों के चयन में संचार कौशल को सर्वाधिक महत्त्व दिया जा रहा है. पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी से इस सिलसिले में कराये गए एक सर्वे में कहा है कि मौखिक और लिखित संचार और संवाद के साथ किसी संस्थान में समूह के बीच रहकर काम करने तथा संस्था के हितों को प्रगतिगामी बनाने पर ही उसकी सफलता निर्भर करती है. लेकिन, यह अफ़सोस और आश्चर्य की बात भी है कि बोलने की कला और अभिव्यक्ति के तौर तरीकों पर इतना जोर दिए जाने के बावजूद बहुतेरे लोग हैं जिनके लिए यह काम पहाड़ जैसा है.

झिझक, संकोच. भय, आशंका, आत्महीनता न जाने कितनी चीजें बोलने वालों की राह में अवरोधक बनकर खड़ी हो जाती हैं. कभी वे चाह कर भी बोल नहीं पाते हैं, कभी उनके भीतर अपनी बात कहने की तत्परता ही नहीं दिखती, पर सच तो यह है कि बोलना अक्सर उनके लिए एक दूभर कार्य हो होता है. लिहाज़ा होता यह है कि ठीक समय पर, सही ढंग से अपनी बात न कह पाने के कारण वे प्रगति की दौड़ में पीछे रह जाते हैं. कई बार सिर्फ अपनी योग्यता की सटीक प्रस्तुति के अभाव में उन्हें पदोन्नति या अपनी मेहनत के वास्तविक प्रतिफल से भी हाथ धोना पड़ जाता है.

समझ का रिश्ता ज़रूरी
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सब जानते हैं कि संचार के लिए कहने और सुनने वाले के अतिरिक्त एक माध्यम की आवश्यकता होती है. लेकिन, प्रभावशाली संचार की परिभाषा आज यहीं तक सीमित नहीं है. दरअसल संचार सफल व पूर्ण तभी कहा जायेगा जब कहने वाला शिद्दत से, संतुलित ढंग से अपना सन्देश बगैर किसी रुकावट या व्यवधान के किसी उपयुक्त माध्यम से, अपने लक्ष्य यानी सुनने वाले तक पहुँचा सके. पर इतने से बात नहीं बनेगी. कहे हुए को उसी तरह सुना जाना और समझा जाना भी जरूरी है, जिस तरह दरअसल वह कहा गया है. तब कहीं जाकर संचार अपनी मंजिल तय कर पाता है. ज़ाहिर है कि सधे हुए संचार में कहने और सुनने और सुनकर प्रत्युत्तर देने का एक ऐसा सफ़र पूरा होना चाहिए जिसमें भ्रम या संशय की कोई स्थिति न रह जाए.

कहना न होगा कि सफलता, संचार और संवाद कुशलता की समानुपाती है. इसके लिए गहराई से समझना जरूरी है कि आपका सन्देश क्या है, यानी आप वास्तव में क्या कहना और सुनने वाले तक क्या पहुंचाना चाहते हैं. यह भी कि समय और आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए आपने सही माध्यम का चुनाव किया भी है या नहीं. इसके अलावा यह भी गौर करना होगा कि आपका सन्देश उचित रीति से उचित व्यक्ति या समूह तक पहुँच रहा है. इसके लिए अपने और संबंधित परिवेश का ज्ञान होना भी महत्वपूर्ण है.

कहने को ढहने से बचाएँ
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हम यहाँ संचार के विषयगत या तकनीकी पक्ष की अधिक चर्चा नहीं करना चाहते, पर व्यावहारिक दृष्टि से यह देखना मुनासिब होगा कि वे कौन से गुण हैं जो संवाद कौशल की पहचान और जान भी हैं. दूसरे यह कि वह कौन सी बाधाएं हैं जो कहने की कोशिश को ढहने के मकाम तक पहुँचा देती हैं. एक और पहलू यह भी कि सुनने में भी सावधानी क्यों जरूरी है कि सुनने वाला वही सुने जो कहा जा रहा है, उसे उस तरह न सुन ले जैसा वह पहले से समझता आ रहा है. बहरहाल, बात साफ़ है कि नया युग संचार और संवाद की कुशलता को ही प्रगति का आधार मानता है. इस कसौटी पर जो खरे न उतर सकें उन्हें आने वाला समय अपनी तेज़ रफ़्तार आगोश में कुछ इस तरह ले लेगा कि न कुछ कहते बनेगा न ही आगत चुनौतियों को सहना मुमकिन होगा.

जब संचार की बात आती है तब कुछ प्रचलित शब्द जैसे सेंडर-इनकोडिंग-चैनल-डिकोडिंग-रिसीवर-फीडबैक आदि सहज रूप से मानस पटल पर उभर आते हैं. इनके अलावा संचार का एक ख़ास सन्दर्भ भी होता है, जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता. इन सब का सार वही है जो हम पहले कह चुके हैं. अब सौ टके का सवाल यह है कि संचार कला में प्रवीण कैसे बन सकते हैं ? क्या यह जन्म जात गुण है कि कोई बड़ी आसानी से अपनी बात कह लेता है और दूसरा इस मोर्चे पर सिवा परेशानी के और कुछ हासिल नहीं कर पाता है . ठहरिए, यहाँ यह जान लेना भी शायद बेहतर होगा कि कतिपय प्राकृतिक बाधाओं को छोड़कर संचार की कला में निपुणता, सही प्रयास और सटीक अभ्यास से अर्जित की जा सकती है. इसलिए निराश होने की कोई वज़ह नहीं है. तैयारी और लगन से श्रेष्ठ संचार संभव है.

फीडबैक की अहमियत
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संचार प्रक्रिया के दौरान सन्देश सम्प्रेषण से लेकर प्रत्युत्तर यानी फीडबैक तक सुलझे हुए अंदाज़ और पारस्परिक समझ का होना अपरिहार्य है. सन्देश भेजने वाले को भलीभांति मालूम रहे कि वह क्या कहना चाहता है, किससे कहना है और किस तरह कहा जाना चाहिए कि उसकी बातों का वही आशय समझा जाये जो अपेक्षित है. इसी तरह सन्देश ग्रहण करने में भी पर्याप्त सावधानी कि दरकार होती है. सन्देश क्या है, किसने प्रेषित किया है, उसका सार क्या है, यह सब धैर्य पूर्वक समझकर दिया गया प्रत्युत्तर सन्देश प्रेषक को संतुष्ट करने में समर्थ होता है कि कहने और सुनने के बीच अब लक्ष्य के अनुरूप साझेदारी का रास्ता साफ़ हो गया है. इस प्रक्रिया के अंतराल में जैसा कि पहले भी कहा गया माध्यम और सन्दर्भ की भूमिका भी अहम होगी.

अब ज़ाहिर सी बात है कि अपने सन्देश को प्रभावशाली ढंग से निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए संचार के इन सभी स्तरों पर किसी भी प्रकार की बाधा को दूर करना पड़ेगा मिसाल की तौर पर सन्देश को ही लीजिये. यदि सन्देश बहुत लंबा. अस्पष्ट या अनगढ़ होगा तो उसकी सार्थकता नहीं रह जायेगी. यह भी संभव है कि आपकी बात का गलत अर्थ निकाल लिया जाये या फिर उसकी किसी अन्य सन्दर्भ में गलत व्याख्या कर दी जाये. इतना ही नहीं आपके उच्चारण या दैहिक भाषा में भी अगर कोई दोष रहा तो तय मानिये कि आपका सन्देश, संदेह का कारण बन सकता है.

अंदाज़े  बयां कुछ और हो
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अब जहाँ तक सन्दर्भ का प्रश्न है याद रखना होगा कि समय और प्रसंग के मद्देनज़र कम शब्दों में सारभूत कहने के नतीजे अक्सर बेहतर मिलते हैं, बजाय आज की तेज़ रफ़्तार आपाधापी की ज़िन्दगी को दरकिनार कर अपनी बात कहने की जिद की जगह पर अगर आप संक्षेप में सन्देश संप्रेषित करने की प्राथमिकता समझ जाते हैं तो कोई कारण नहीं कि आप समय पर सटीक फीडबैक हासिल न कर सकें. इस सिलसिले में अपने श्रोताओं यानी सन्देश ग्राहकों की संस्कृति, परिवेश और भाषा का ज्ञान भी अलग अहमियत रखता है. इसके अभाव में संचार कभी सम्पूर्ण नहीं हो सकता. गौर तलब है कि संचार की ये बुनियादी बातें आपको प्रथम प्रभाव के योग्य बनाती हैं, लेकिन अच्छा बोलने के लिए, अपना अंदाज़े बयां दुरुस्त बनाने और कहने और सुनने के बीच परिणामों का सार्थक पुल बनाने के लिए सबसे उत्तम राजमार्ग सतत आभास ही है.

कुछ लोग हैं जिनके पास कहने योग्य कुछ भी नही होता पर वो अक्सर कुछ न कुछ कह बैठते हैं. दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जिनके पार कहने के लिए एक पूरा खजाना ही साथ साथ चलता है पर दुर्भाग्य ही समझिये कि वे चाहकर भी कुछ बोल नहीं पाते हैं.

इसलिए जिन्हें अभिव्यक्ति की शक्ति का भान है वे कुछ कहने की साथ-साथ अच्छा कहे हुए को
सुनने के लिए सदैव तत्पर देखे जा सकते हैं. और उनकी तो चर्चा ही व्यर्थ है जो कहने और सुनने के बदले महज़ कहा-सुनी में मशगूल होते है. यहाँ संचार के सारे नियम ध्वस्त हो जाते हों तो आश्चर्य क्या है ?

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