खौफ की धुंध मिटाओ तो कोई बात बने
प्यार का गीत सुनाओ तो कोई बात बने
कोई हसरत न रहे बाकी हमारे दिल में
इस तरह सामने आओ तो कोई बात बने
साफगोई में जहर होता है माना लेकिन
चाशनी उसमें मिलाओ तो कोई बात बने
शख्सियत जिसकी नहीं और जो नाकाबिल है
उसको इंसान बनाओ तो कोई बात बने
अमन के नाम पर गुमराह जो करते हैं हमें
उनकी बातों में न आओ तो कोई बात बने
Monday, March 17, 2008
आदमी के मन में
Sunday, March 16, 2008
रंगों ने श्रृंगार किया है.
मधु -मादक रंगों ने देखो जीवन का श्रृंगार किया है ,
रंग उसी के हिस्से आया जिसने मन से प्यार किया है ।
वासंती उल्लास को केवल
फागुन का अनुराग न समझो
ढोलक की तुम थाप को केवल
फाग -राग ,पदचाप न समझो
जो भीतर से खुला उसी ने जीवन का मनुहार किया है ,
रंग उसी के हिस्से आया जिसने मन से प्यार किया है ।
पतझर में देखो झरना तुम
फिर वसंत का आना देखो
पीड़ा में क्रीड़ा जीवन की
आंसू में मुस्काना देखो
सुख -दुःख में यदि भेद नहीं है समझो जीवन पूर्ण जिया है ,
रंग उसी के हिस्से आया जिसने मन से प्यार किया है .
रंग उसी के हिस्से आया जिसने मन से प्यार किया है ।
वासंती उल्लास को केवल
फागुन का अनुराग न समझो
ढोलक की तुम थाप को केवल
फाग -राग ,पदचाप न समझो
जो भीतर से खुला उसी ने जीवन का मनुहार किया है ,
रंग उसी के हिस्से आया जिसने मन से प्यार किया है ।
पतझर में देखो झरना तुम
फिर वसंत का आना देखो
पीड़ा में क्रीड़ा जीवन की
आंसू में मुस्काना देखो
सुख -दुःख में यदि भेद नहीं है समझो जीवन पूर्ण जिया है ,
रंग उसी के हिस्से आया जिसने मन से प्यार किया है .
Saturday, March 15, 2008
मुसकान का मोल है
दुर्दिन में दान का मोल है
क्षुधा में जलपान का मोल है
रेगिस्तान में बारिश की तरह
दर्द में मुसकान का मोल है
क्षुधा में जलपान का मोल है
रेगिस्तान में बारिश की तरह
दर्द में मुसकान का मोल है
Friday, March 14, 2008
जितना दर्द मुझे तुम दोगे ...
जितना दर्द मुझे तुम दोगे मैं उतने ही गीत लिखूंगा
शोर मचाओ तुम कितना भी पर मैं तो संगीत रचूंगा
सीख लिया है मैंने जीना पथ की अनगिन बाधाओं से
रोको चाहे मुझे कहीं भी मैं मंजिल पर जीत लिखूंगा
शोर मचाओ तुम कितना भी पर मैं तो संगीत रचूंगा
सीख लिया है मैंने जीना पथ की अनगिन बाधाओं से
रोको चाहे मुझे कहीं भी मैं मंजिल पर जीत लिखूंगा
Thursday, March 13, 2008
मन के मीत क्यों न मिलेंगे ?
कुछ तरंगें उठीं मन में और मन के मीत जीतने की कुछ रीत सूझ गयी ।
सोचा आपसे साझा कर लूँ ।
तो ये हैं चंद सुझाव जिन्हें आज के दौर में टिप्स कहने का चलन है ।
एक ---- दूसरों को अपने विषय में बोलने दें ।
दो ----- दूसरों की रूचि की बात करें
तीन ----- दूसरों के महत्व को कम मत आँकें ।
चार ----- बहस से बचें , समझ और सुझाव का मार्ग अपनाएं ।
पाँच----- कभी किसी को मुंह पर ग़लत न कहें ।
छः ------ दूसरों के सामने स्वयं की आलोचना की हिम्मत रखें ।
सात ----- कभी अपने मित्र को यह एहसास करायें कि कुछ मामलों में वह आपसे भी आगे निकल गया है ।
आठ ------ अपने मित्र को उसकी जगह पर स्वयं को रखकर समझने की कोशिश करें ।
नव -------- दूसरों की खासियत खोजें ।
दस -------- अपनी कमजोरियों से जी न चुराएं ।
सोचा आपसे साझा कर लूँ ।
तो ये हैं चंद सुझाव जिन्हें आज के दौर में टिप्स कहने का चलन है ।
एक ---- दूसरों को अपने विषय में बोलने दें ।
दो ----- दूसरों की रूचि की बात करें
तीन ----- दूसरों के महत्व को कम मत आँकें ।
चार ----- बहस से बचें , समझ और सुझाव का मार्ग अपनाएं ।
पाँच----- कभी किसी को मुंह पर ग़लत न कहें ।
छः ------ दूसरों के सामने स्वयं की आलोचना की हिम्मत रखें ।
सात ----- कभी अपने मित्र को यह एहसास करायें कि कुछ मामलों में वह आपसे भी आगे निकल गया है ।
आठ ------ अपने मित्र को उसकी जगह पर स्वयं को रखकर समझने की कोशिश करें ।
नव -------- दूसरों की खासियत खोजें ।
दस -------- अपनी कमजोरियों से जी न चुराएं ।
Wednesday, March 12, 2008
चांदनी चिंतन की.
बात १९७० की है ।
दुनिया के जाने -माने एथलीटों ने फ़ैसला किया कि
अपना प्रदर्शन दुरुस्त करने की कोई नई पहल की जाये ।
सबने तय किया कि खेल शुरू होने से पहले वे अपनी जीत की काल्पनिक खुशी मनायेंगे ।
स्वयं को जीतते हुए देखेंगे । अमूर्त को मूर्त रूप में देखने की यह कोशिश बड़ी कारगर रही ।
खिलाड़ियों की जीत के अवसर बढ़ गए ।
मुझे लगता है हार या जीत से बड़ी बात है जीतने का ज़ज्बा बनाये रखना ।
इसे मैं सफलता की भीतरी यात्रा के रूप में देखता हूँ ।
आप ख़ुद को अप्प्रूव करेंगे तो दुनिया वालों के सामने
कुछ प्रूव करने की जरूरत नहीं रह जायेगी ।
अपने भीतर इस एहसास को जिंदा रखना कि आप
शिद्दत से जीने और जीतने को अभिन्न मानते हैं ,सचमुच बड़ी बात है ।
हार को जीत में ; रुदन को गीत में बदलने की कला बड़ी बात है ।
जो चलता है वही ठाकरें भी खाता है ,कभी गिर भी जाता है।
लेकिन गिरने में भी उठने का राज़ छुपा है ।
देखिये न कलम से स्याही गिरी कि कागज़ पर सुंदर अक्षर उठ जाते हैं ।
बादल से गिरता है पानी और धरती पर पौधे उग आते हैं ।
मानस मर्मज्ञ डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्रा की पंक्तियाँ हैं ...
वह देख तुम्हारा तेज स्वयं साधक होगा ।
तुम अपने पथ के बस आराधक हो लो ,
पथ स्वयं तुम्हारे पथ का आराधक होगा ।
दुनिया के जाने -माने एथलीटों ने फ़ैसला किया कि
अपना प्रदर्शन दुरुस्त करने की कोई नई पहल की जाये ।
सबने तय किया कि खेल शुरू होने से पहले वे अपनी जीत की काल्पनिक खुशी मनायेंगे ।
स्वयं को जीतते हुए देखेंगे । अमूर्त को मूर्त रूप में देखने की यह कोशिश बड़ी कारगर रही ।
खिलाड़ियों की जीत के अवसर बढ़ गए ।
मुझे लगता है हार या जीत से बड़ी बात है जीतने का ज़ज्बा बनाये रखना ।
इसे मैं सफलता की भीतरी यात्रा के रूप में देखता हूँ ।
आप ख़ुद को अप्प्रूव करेंगे तो दुनिया वालों के सामने
कुछ प्रूव करने की जरूरत नहीं रह जायेगी ।
अपने भीतर इस एहसास को जिंदा रखना कि आप
शिद्दत से जीने और जीतने को अभिन्न मानते हैं ,सचमुच बड़ी बात है ।
हार को जीत में ; रुदन को गीत में बदलने की कला बड़ी बात है ।
जो चलता है वही ठाकरें भी खाता है ,कभी गिर भी जाता है।
लेकिन गिरने में भी उठने का राज़ छुपा है ।
देखिये न कलम से स्याही गिरी कि कागज़ पर सुंदर अक्षर उठ जाते हैं ।
बादल से गिरता है पानी और धरती पर पौधे उग आते हैं ।
मानस मर्मज्ञ डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्रा की पंक्तियाँ हैं ...
निश्चय समझो जो कभी तुम्हारा बाधक था ,
वह देख तुम्हारा तेज स्वयं साधक होगा ।
तुम अपने पथ के बस आराधक हो लो ,
पथ स्वयं तुम्हारे पथ का आराधक होगा ।
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