Monday, October 13, 2014

समीर : साँसों में समा जाते हैं जिनके दिल से लिखे गीत
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राष्ट्रीय किशोर कुमार 
अलंकरण पर विशेष 
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

खण्डवा में विख्यात गीतकार समीर को मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्थापित राष्ट्रीय किशोर कुमार सम्मान से विभूषित किया गया। महान गायक एवं हरफनमौला कलाकार स्वर्गीय किशोर कुमार के नाम पर स्थापित यह सम्मान प्रत्येक वर्ष बारी-बारी से निर्देशन, अभिनय, पटकथा एवं गीत लेखन के क्षेत्र में प्रदान किया जाता है। उल्लेखनीय है कि गीतकार समीर राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी सेवा सम्मान से भी अलंकृत हो चुके हैं। 

श्री समीर को यह सम्मान गीत लेखन के क्षेत्र में प्रदान किया गया है। इस सम्मान के लिए मध्यप्रदेश शासन द्वारा गठित चयन समिति की एक बैठक कुछ समय पहले मुम्बई में आयोजित की गयी थी। चयन समिति में विख्यात पटकथाकार सलीम खान, अभिनेता निर्देशक सतीश कौशिक, प्रख्यात पार्श्व गायिका अनुराधा पौडवाल, गीत लेखक इब्राहिम अश्क तथा फिल्म पत्रकार जयप्रकाश चौकसे शामिल थे। 

गीतकार समीर का जन्म 24 फरवरी 1958 में हुआ। वे हिन्दी सिनेमा जगत के श्रेष्ठ और निरन्तर सृजन सक्रिय गीतकार हैं। अपने समय के प्रतिष्ठित गीतकार अनजान के बेटे समीर तीन दशक से लगातार फिल्मों में एक गीतकार के रूप में अपनी सम्मानजनक उपस्थिति के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने माधुर्य भरे गीत लिखे हैं और वे गीत लोकप्रिय तथा यादगार रहे हैं। दिल, आशिकी, दीवाना, हम हैं राही प्यार के, कुछ कुछ होता है, बेटा, साजन, राजा हिन्दुस्तानी, फिजा, धड़कन, कभी खुशी कभी गम, देवदास, तेरे नाम, धूम, साँवरिया, राओड़ी राठौड़, दबंग-2 आदि अनेक ऐसी फिल्म हैं जिनमें समीर के लिखे गीत सुनने वालों की जुबां पर लम्बे समय बने रहे हैं। उन्हें अनेक वर्ष निरन्तर फिल्म फेयर पुरस्कार मिले हैं, आइफा, स्क्रीन अवार्ड प्राप्त हुए हैं। उत्तरप्रदेश सरकार का यश भारती सम्मान भी प्राप्त हुआ है। 
 
गीतकार समीर ने 635 फिल्मों में पाँच हजार से अधिक गीत रचे हैं। अनेक लोकप्रिय फिल्मों में समाहित उनके गीतों को देश-दुनिया में बहुत गाया-गुनगुनाया गया। वे अनु मलिक और नदीम-श्रवण से लेकर आनंद-मिलिंद, हिमेश रेशमिया और दिलीप सेन,समीर सेन तक कई संगीतकारों के चहेते गीतकार रहे हैं।  

बैंक अधिकारी के रुप में अपने कैरियर की शुरूआत करने के बाद बालीवुड में अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्र मुग्ध करने वाले गीतकार समीर लगभग चार दशक से सिनेप्रेमियों के दिलों पर राज कर रहे है। उन्होंने हिन्दी के अलावा भोजपुरी, मराठी फिल्मों के लिये भी गीत लिखे है। काफी मेहनत करने के बाद 1983 में उन्हें बतौर गीतकार बेखबर फिल्म के लिये गीत लिखने का मौका मिला। इस बीच समीर को इंसाफ कौन करेगा, जवाब हम देगे, दो कैदी, रखवाला, महासंग्राम,बाप नंबरी बेटा दस नंबरी जैसी कई बड़े बजट की फिल्मों में काम करने का अवसर मिला लेकिन इन फिल्मों की असफलता के कारण वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में नाकामयाब रहे।

लगभग दस वर्ष तक मुंबई में संघर्ष करने के बाद समीर गीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये।वर्ष 1990 में ही उन्हें महेश भट्ट की फिल्म आशिकी में भी गीत लिखने का अवसर मिला। फिल्म आशिकी में सांसों की जरूरत है जैसे, मैं दुनिया भूला दूंगा और नजर के सामने जिगर के पास  गीतों की सफलता के बाद समीर को कई अच्छी फिल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गये।जिनमें बेटा, बोल राधा बोल, साथी, और फूल और कांटे जैसी बडे बजट की फिल्में शामिल थी। इन फिल्मों की सफलता के बाद उन्होंने सफलता की नयी बुलंदियों को छुआ और एक से बढकर एक गीत लिखकर श्रोताओं को मंत्रमुंग्ध कर दिया। 

वर्ष 1997 में अपने पिता अंजान की मौत और अपने मार्गदर्शक गुलशन कुमार की हत्या के बाद समीर को गहरा सदमा पहुंचा। इस हत्याकांड में संगीतकार नदीम का नाम आने पर उन्होंने कुछ समय तक फिल्म इंडस्ट्री से किनारा कर लिया और वापस बनारस चले गये थे। बहरहाल समीर अपने गीतों की तरह उनके चाहने वालों की साँसों की ज़रुरत बने हुए हैं। 
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राजनांदगांव। मो.9301054300 

Wednesday, October 8, 2014

पद्मभूषण प्रो.थॉमस को अमेरिका का नेशनल मेडल ऑफ साइंस 

भारतीय मूल की 
वैज्ञानिक
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 चेतना 
हुई गौरवान्वित 
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

एक बार फिर एक भारतीय मूल की विशिष्ट प्रतिभा ने भारत का नाम रौशन कर दिखाया है। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग के प्राध्यापक भारतवंशी थॉमस कैलथ उन लोगों में शामिल हैं, जिन्हें राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चालू सप्ताह के दौरान अमेरिका के नेशनल मेडल आफ साइंस अवार्ड दिए जाने की घोषणा की है। 

पुणे में शिक्षा ग्रहण करने वाले कैलथ को भारत के नागरिक सम्मान पद्म भूषण से भी नवाजा जा चुका है। उन्होंने पुणे के कॉलेज आफ इंजीनियरिंग से बीई (दूरसंचार) किया है। इसके बाद उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्युट आफ टेक्नोलॉजी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में एसएम और एससीडी की डिग्री ली।

गौरतलब है कि मैसाचुसेट्स से डिग्री लेने के बाद उन्होंने कैलिफोर्निया के जेट प्रोपल्सन लैब्स में काम किया और इसके बाद 1963 में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक नियुक्त किए गए। 1969 में उनकी पदोन्नति करते हुए उन्हें प्राध्यापक बना दिया गया। वहआईईईई के फेलो हैं और उन्हें 2007 में आईईईई मेडल आफ ऑनर से सम्मानित किया गया। इनके अलावा आधा दर्जन राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें पहले ही मिल चुके हैं। 

राष्ट्रपति ओबामा ने किया ऐलान 
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राष्ट्रपति ओबामा ने नेशनल मेडल आफ टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन की भी घोषणा की। साल के अंत में व्हाइट हाउस में विशेष कार्यक्रम के दौरान नामित किए गए लोगों को यह मेडल दिए जाएंगे। व्हाइट हाउस के अनुसार, ओबामा ने कहा - हमारे विद्वानों और आविष्कारकों ने विश्व को समझने की क्षमता को बढ़ाया है, उनके क्षेत्रों में अमूल्य योगदान दिया है,कई जिंदगियों के सुधार में मदद की है। हमारा देश उनकी उपलब्धियों और खोज, जांच और आविष्कार में तल्लीन देशभर के सभी वैज्ञानिकों व तकनीशियनों से धनी है।

ज्ञातव्य है कि एमआईटी से इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में पीएचडी की डिग्री पाने वाले कैथल भारत में जन्मे पहले भारतीय हैं। हिताची अमेरिकन प्रोफेसर ऑफ इंजीनियरिंग कैलथ 1963 में इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के संकाय में शामिल हुए लेकिन वह अपने अनुसंधान और लेखनी को लेकर सतत सक्रिय रहे।

कोशिश की ईमानदारी का नतीजा 
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दरअसल अमेरिका में,अपने स्वयं के प्रयासों के माध्यम से अपनी क्षमता को प्राप्त करना एक आदत की तरह शुमार है। वहां जैसे आत्मनिर्भरता जीवन का मुख्य उद्देश्य है। एक स्वतंत्र लगातार पूछताछ की जिस मानसिकता की आवश्यकता है और लगातार पारंपरिक ज्ञान को चुनौती देने का जो ज़ज़्बा है वही वहाँ की प्रतिभाओं को अन्वेषण के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। यह अक्सर ज्ञान का नया आयाम खोजने के लिए अपने दायरे से बाहर निकालकर सोचने की प्रवृत्ति है जो कभी हार मानना नहीं जानती। 

वैज्ञानिक अनुसंधान का युद्ध अचानक नहीं जीता  है। पहले कई लड़ाइयों की आवश्यकता है। फिर चाहिए धीरज। विज्ञान एक दिन में बनने वाली कहानी नहीं है। पश्चिम में, यह मानसिक विभूति आबाद है कि वहां के अनुसन्धाता विफलता से डरने के स्थान पर उसका जश्न मनाते हैं कि अब जीतने के लिए मील के पत्थर पर लिखी कोई नई इबारत तो लिखी हुई मिली। असफलता पर निराश होकर चुप बैठ जाना कोई समाधान नहीं हो सकता। 

लीनियर सिस्टम्स के धुरंधर 
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भारतीय मूल के छठवें व्यक्ति हैं, जिन्होंने ऊपर कही गई बातों को सिद्ध कर दिखाया है। वे अब 79 वर्ष के हैं। कैलथ स्टैनफोर्ड में 1963 में एसोसिएट प्रोफ़ेसर और 1968 में प्रोफ़ेसर बने। वर्तमान में वे वहीं प्रोफ़ेसर इमेरिटस हैं। उनके शिक्षण और शोध के प्रमुख विषयों में सूचना सिद्धांत, संचार, रैखिक प्रणालियाँ , आकलन और नियंत्रण, सिग्नल प्रोसेसिंग, अर्धचालक विनिर्माण, संभाव्यता और आँकड़े, मैट्रिक्स और ऑपरेटर सिद्धांत आदि हैं। शताधिक शोधार्थियों को मार्गदर्शन दिया है। प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में 300 से अधिक शोध पत्र,कई किताबें, मोनोग्राफ सहित वृहत पाठ्य पुस्तक लीनियर सिस्टम्स और लीनियर एस्टीमेशन प्रकाशित। 

चिंतनीय है कि एक राष्ट्र की संस्कृति, विश्वास प्रणाली, मूल्य, दृष्टिकोण आदि की वैज्ञानिक अनुसंधान की गुणवत्ता का निर्धारण करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। मार्गदर्शन, नेतृत्व और दिशा के साथ-साथ निरंतर कुछ नया व सार्थक हासिल करने की तीव्र महत्वाकांक्षा के बगैर कोई बड़ी उपलब्धि नहीं मिल सकती। बहरहाल गणित में फील्ड्स मॉडल जीतने वाले भारतीय मूल के युवा मंजुल भार्गव के बाद उम्रदराज़ प्रोफ़ेसर थॉमस का नाम हमारी सरज़मीं की मिट्टी की सुवास बनकर भारत का गौरव वर्धन कर रहा है। 
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हिन्दी विभाग,
शासकीय दिग्विजय पीजी कालेज, 
राजनांदगांव मो.9301054300 

Sunday, April 6, 2014

'मैनेजमेंट' में भविष्य की सम्भावनाएँ 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 


आपने उस छोटी चिड़िया की कहानी तो सुनी ही होगी, जो खुद को बदसूरत मानते-मानते इस कदर आत्मविश्वासहीन हो गयी कि अपनी बोली भी भूल गयी। एक दिन अचानक उसने साफ जल में खुद को देखा, तो महसूस किया कि वह अब छोटी चिड़िया नहीं, बल्कि एक खूबसूरत हंस हो चुकी है। खुद को पहचान कर वह इतनी खुश हुई कि उसके मुँह से उसकी स्वाभाविक बोली निकल पड़ी। और वह सिंह-शावक, जो परिस्थितिवश भेड़ों के बीच पला-बढ़ा और खुद को भेड़ का मेमना ही समझने लगा, उन्हीं की तरह व्यवहार करने लगा ! एक शेर ने जब उसे जबरन पकड़कर नदी के पानी में उसके अपने रूप का दर्शन कराया, तब कहीं जाकर उसके मुँह से मिमियाहट के बजाय दहाड़ निकली। इसलिए,खुद को पहचानिए।  कहीं आप तो अपने को उस चिड़िया की तरह नहीं समझते ? उस सिंह-शावक की तरह अपने असली रूप को भुला तो नहीं बैठे ? अगर हाँ, तो अपने को पहचानने की कोशिश करें। आपके भीतर भी कोई हंस, कोई सिंह छिपा है, जो बाहर आने को बेताब है। इसके लिए आपको अपने जीवन और कार्य के प्रबंधन की कला सीखनी होगी। 

प्रबंधन एक ऐसा शब्द है जिसके अनेक अर्थ हैं। प्रबन्धन का लोकप्रिय अर्थ है -उपलब्ध संसाधनों का दक्षतापूर्वक तथा प्रभावपूर्ण तरीके से उपयोग करते हुए लोगों के कार्यों में समन्वय करना ताकि लक्ष्यों की प्राप्ति सुनिश्चित की जा सके। प्रबन्धन के अन्तर्गत नियोजन,संगठन-निर्माण, स्टाफिंग, नेतृत्व करना या निर्देशन करना तथा संगठन अथवा पहल का नियंत्रण करना आदि शामिल हैं। एक कला,विज्ञान और पेशे के रूप में प्रबंधन का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। 

गौर करें तो प्रबंधन आत्म-विकास की सतत प्रक्रिया है। अपने को व्यवस्थित-प्रबंधित किए बिना आदमी दूसरों को व्यवस्थित-प्रबंधित करने में सफल नहीं हो सकता, चाहे वे दूसरे लोग घर के सदस्य हों या दफ्तर या कारोबार के। इस प्रकार आत्म-विकास ही घर-दफ्तर, दोनों की उन्नति का मूल है। इस लिहाज से देखें तो प्रबंधन का ताल्लुक कंपनी-जगत के लोगों से ही नहीं, मनुष्य मात्र से है। वह इंसान को बेहतर इंसान बनाने की कला है,क्योंकि बेहतर इंसान ही बेहतर कर्मचारी, अधिकारी,प्रबंधक या कारोबारी हो सकता है। 

प्रबंध में पारस्परिक रूप से संबंधित वह कार्य सम्मिलित हैं जिन्हें सभी प्रबंधक करते हैं। प्रबंधक अलग-अलग कार्यों पर भिन्न समय लगाते हैं। संगठन के उच्चस्तर पर बैठे प्रबंधक नियोजन एवं संगठन पर नीचे स्तर के प्रबंधकों की तुलना में अधिक समय लगाते हैं।

कार्य-क्षेत्र
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व्यावसायिक प्रबंधकों के लिए मुख्य रूप से पांच कार्य-क्षेत्र होते हैं और छात्र इनमें से किसी क्षेत्र में जाने का प्रयास कर सकता है और उसमें विशेषज्ञता प्राप्त कर सकता है। ये क्षेत्र निम्नलिखित हैं - 1.कार्मिक या मानव संसाधन विकास, 2.वित्त उत्पादन या परिचालन कार्य, 3 विपणन तथा सूचना सेवा, 4.सूचना सेवाएं। 

प्रवेश
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प्रबंधन में किसी करियर में जाने के मूल रूप में दो मार्ग हैं -सम्पूर्ण-कार्यों/विशेषज्ञता क्षेत्रों में से किसी एक में विशेषज्ञ बनना।•किसी संगठन में एक प्रशिक्षणार्थी के रूप में कार्य प्रारंभ करके प्रबंधन में करियर बना सकते हैं, तथापि इसके लिए कुछ विगत योग्यताएं और अनुभव आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त, अधिकांश संगठन योग्यता प्राप्त प्रबंधन स्नातकों को वरीयता देते हैं। इसलिए प्रबंधन व्यवसाय में जाने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण होना अनिवार्य है ।

क्या पढ़ना होगा ?
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प्रबंधन-पाठ्यक्रम निजी तथा राजकीय प्रबंधन संस्थानों द्वारा मुख्य रूप से अधिस्नातक स्नातकोत्तर डिग्री/डिप्लोमा स्तर पर चलाएं जाते हैं। सामान्यतः 10+2 उत्तीर्ण उम्मीदवार अधिस्नातक प्रबंधन डिग्री (जैसे बी.बी.ए.,बी.बी.एस.,बी.एम.एस.) कर सकते हैं। स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों (एम.बी.ए., पी.जी.डी.बी.ए.) के लिए किसी भी विषय में स्नातक होना और प्रवेश चयन प्रक्रिया उत्तीर्ण करना एम.बी.ए., पी.जी.डी.एम., प्रबंधकीय अर्थशास्त्र आदि जैसे कार्यक्रमों के लिए पात्र बनाते हैं। विभिन्न संस्थानों में अंकों की निर्धारित प्रतिशतता मामूली रूप में भिन्न हो सकती है, किंतु प्रवेश के लिए कुल न्यूनतम प्रतिशतता सामान्यतः 50% से कम नहीं होती है। स्नातक पाठ्यक्रम के अंतिम वर्ष के छात्र भी प्रबंधन पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए आवेदन कर सकते हैं। स्नातकोत्तर स्तर पर पाठ्यक्रमों में मुख्य रूप से किसी विशिष्ट क्षेत्र में विशेषज्ञता दिलाई जाती है। कार्यरत व्यवसायियों के लिए एक कार्यपालक एम.बी.ए. पाठ्यक्रम भी चलाया जाता है। कुछ सीमित संस्थाएं अंशकालिक प्रबंधन पाठ्यक्रम भी चलाती हैं ।

चयन
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अधिकांश प्रबंधन विद्यालय एक मानक चयन पद्धति का अनुसरण करते हैं। भारतीय प्रबंधन संस्थान (आई.आई.एम.एस) तथा कुछ प्रबंधन संस्थान प्रत्येक वर्ष दिसंबर में सामान्य प्रवेश परीक्षा (कैट) नामक एक लिखित परीक्षा आयोजित करते हैं। अन्य संस्थाएं प्रबंधन अभिरुचि परीक्षा (एम.ए.टी.) जैसी पृथक प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करती हैं। बड़े समाचार पत्र इनके विज्ञापन प्रकाशित करते हैं। जिसमें आवेदन पद्धति, परीक्षा के स्थान, तारीख एवं समय का उल्लेख होता है। परीक्षा में मौखिक अभिव्यक्ति एवं समस्या समाधान क्षमताओं एवं व्याख्या ज्ञान जांच शामिल होती है ।

कैट या मैट एक ऐसी अनिवार्य पद्धति है जो उम्मीदवार के व्यक्तित्व एवं ज्ञान का विश्लेषण करती है.प्रश्न-पत्रों का कोई निर्धारित ढांचा नहीं है. प्रश्न-पत्र ऑबजेक्टिव प्रकृति के होते हैं। कैट परीक्षा की तैयारी करने में उम्मीदवारों की सहायता के लिए प्रत्येक वर्ष कैट नामक एक पुस्तक प्रकाशित की जाती है। विभिन्न प्रबंधन संस्थाओं द्वारा ली जाने वाली ऐसी प्रवेश परीक्षाओं के लिए स्थानीय प्रशिक्षण विद्यालय भी छात्रों की तैयारी कराते हैं ।

लिखित परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद, उम्मीदवार अपनी पसंद के किसी एक या अधिक संस्थाओं को निर्धारित प्रारूप में आवेदन कर सकते हैं। सामान्य रूप से उनका चयन सामूहिक विचार-विमर्श (जी.डी.) और उसके बाद एक व्यक्तिगत साक्षात्कार (पी.आई.) में उनके निष्पादन के आधार पर किया जाता है अधिस्नातक पाठ्यक्रमों की अवधि 3 वर्ष होती है। तथापि, स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की अवधि 1-2 वर्ष होती है ।

संस्थाएँ 
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एम.बी.ए. डिग्री/डिप्लोमा की भारी मांग होने के कारण देश भर में व्यवसाय विद्यालयों की संख्या बढ़ी है। व्यवसाय प्रबंधन पाठ्यक्रम चलाने वाली कुछ संस्थाएं निम्नलिखित हैं : 

भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद, कलकत्ता, बंगलौर, लखनऊ, इंदौर, तथा कोझीकोड (कालीकट) 
जमनालाल बजाज प्रबंधन अध्ययन विद्यालय, मुम्बई
जे़वियर्स श्रमिक संबंध संस्थान, जमशेदपुर
प्रबंधन अध्ययन संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय
नरसी मोनजी प्रबंधन अध्ययन संस्थान, मुंबई
सिम्बोसिस व्यवसाय प्रबंधन संस्थान, पुणे
व्यवसाय प्रबंधन संस्थान, राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, बंगाल, कोलकाता
अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन संस्थान, नई दिल्ली
आई.आई.एफ.टी., नई दिल्ली
एम.डी.आई.,गुड़गांव सहित कई अन्य संस्थाएं भी है। 

सम्भावनाएँ 
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उदारीकरण, निजीकरण तथा सार्व-भौमिकरण होने के साथ ही अधिकाधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में आ रही हैं और अनेक भारतीय कंपनियां विदेश में संयुक्त उद्यम के लिए जा रही हैं। इससे योग्य प्रबंधकों को संगठनों के चलाने तथा उनके प्रबंधन के लिए करियर के आकर्षक विकल्प खुलते जा रहे हैं। इस क्षेत्र में अत्यधिक कुशल व्यवसायियों की आवश्यकता के साथ-साथ प्रबंधन स्नातकों की व्यापक मांग रही है। ऐसे स्नातकों के लिए निम्नलिखित क्षेत्रों में अनेक संभावनाएं विद्यमान हैं। 

कौशल एवं प्रतिभा
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अधिकांश प्रबंधकों में विशेषज्ञतापूर्ण पृष्ठ-भूमि एवं प्रंबधकीय कौशल दोनों होते हैं। आपको किसी विशेष कार्य जैसे विपणन, परिचालन या विनिर्माण कार्य प्रांरभ करने में विशेषज्ञता प्राप्त करनी होती है। आप किसी भी प्रवेश स्तर के पद से अपने तरीके से काम प्रारंभ करें और सीखने तथा उपलब्धि प्राप्त करने की संभावना प्रदर्शित करें और इस तरह प्रबंध कौशल प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह आप प्रबंधकीय रैंकों पर पदोन्नति ले सकते हैं। एक प्रबंधक बनने के लिए आपको तीन क्षेत्रों में अपनी सक्षमता प्रदर्शित करनी चाहिए। किसी विशिष्ट कार्य की व्यवस्था का ज्ञान एवं समझ।व्यक्तियों की समझ तथा व्यक्तियों के साथ प्रभावी रूप में कार्य करने की क्षमता और विभिन्न अंशों एवं पूर्ण के बीच संबंधों पर सोचने तथा देखने की क्षमता। 

एक प्रबंधक के रूप में आप अपना अधिकांश कार्य व्यक्तियों के साथ और अपना कार्य व्यक्तियों से कराने पर व्यतीत करें। इससे आपके अंतर-वैयक्तिक कौशल के साथ-साथ सफलता के लिए आवश्यक कौशलों का विकास होगा। आप जैसे-जैसे करियर के मार्ग पर आगे बढ़ते जाएंगे वैसे-वैसे आप तकनीकी कौशल पर कम और संकल्पनात्मक कौशल पर निर्भर होते चले जाएंगे।

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दिल से 

एक अच्छा प्रबंधक सबको साथ लेकर चलता है और देखते ही देखते सबसे अलग किरदार बना लेता है। फिर भी वह कभी नहीं भूलता कि उसके कम को आसान बनाने में अनेक लोगों की भागीदारी है। लिहाज़ा,वह हमेशा शुक्रगुज़ार रहता है कि - 

नशेमन पे मेरे एहसान पूरे चमन का है 
कोई तिनका कहीं का और कोई तिनका कहीं का है 

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Sunday, March 16, 2014

अमीर खुसरो की लाज़वाब पहेलियाँ और मुकरियाँ 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 


खडी बोली हिंदी को साहित्य रचना का माध्यम बनाने वाले विश्व विख्यात अमीर खुसरो का मूल नाम अमीर सैफ़ुद्दीन ख़ुसरो था. उनका जन्म 1253 में एटा (उत्तरप्रदेश) में हुआ था. हिंदी, उर्दू, फारसी,ब्रजभाषा में उन्होंने रचनाएँ लिखीं। कविता को अभिव्यक्ति की मूल विधा के रूप में अपनाया। उनका निधन 1325 में हुआ. स्मरणीय है कि तबला हज़ारों साल पुराना वाद्ययंत्र है किन्तु नवीनतम ऐतिहासिक वर्णन में बताया जाता है कि तेरहवीं शताब्दी में भारतीय कवि तथा अमीर ख़ुसरो ने पखावज के दो टुकड़े करके तबले का आविष्कार किया।

आइये, अमीर साहब कि चाँद पहेलियों और मुकरियों का रसास्वादन करें।

रोटी जली क्यों? 
घोड़ा अड़ा क्यों? 
पान सड़ा क्यों ?

उत्तर : फेरा न था

*** 
पंडित प्यासा क्यों? 
गधा उदास क्यों?

उत्तर : लोटा न था

***
एक नारी के हैं दो बालक, दोनों एकहि रंग।
एक फिरे एक ठाढ़ा रहे, फिर भी दोनों संग।

उत्तर : चक्की

***
चार अंगुल का पेड़, सवा मन काफ्ता।
फल लागे अलग अलग, पक जाए इकट्ठा।।

उत्तर : कुम्हार की चाक

*** 
गोरी सुंदर पातली, केहर काले रंग।
ग्यारह देवर छोड़ कर चली जेठ के संग।। 

उत्तर : अरहर की दाल

*** 
ऊपर से एक रंग हो और भीतर चित्तीदार।
सो प्यारी बातें करे फिकर अनोखी नार।।

उत्तर : सुपारी

*** 
एक नार कुएँ में रहे,
वाका नीर खेत में बहे।
जो कोई वाके नीर को चाखे,
फिर जीवन की आस न राखे।।

उत्तर : तलवार

***
स्याम बरन की है एक नारी,
माथे ऊपर लागै प्यारी।
जो मानुस इस अरथ को खोले,
कुत्ते की वह बोली बोले।।

उत्तर : भौं 

***
एक गुनी ने यह गुन कीना,
हरियल पिंजरे में दे दीना।
देखा जादूगर का हाल,
डाले हरा निकाले लाल।

उत्तर : पान

***
 एक थाल मोतियों से भरा,
सबके सर पर औंधा धरा।
चारों ओर वह थाली फिरे,
मोती उससे एक न गिरे।

उत्तर : आसमान

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और ये चुनिंदा कुछ मुकरियाँ - 

1.
खा गया पी गया
दे गया बुत्ता
ऐ सखि साजन?
ना सखि कुत्ता!

2. 
लिपट लिपट के वा के सोई
छाती से छाती लगा के रोई
दांत से दांत बजे तो ताड़ा
ऐ सखि साजन? ना सखि जाड़ा!

3. 
रात समय वह मेरे आवे
भोर भये वह घर उठि जावे
यह अचरज है सबसे न्यारा
ऐ सखि साजन? ना सखि तारा!

4.
नंगे पाँव फिरन नहिं देत
पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत
पाँव का चूमा लेत निपूता
ऐ सखि साजन? ना सखि जूता!

5. 
ऊंची अटारी पलंग बिछायो
मैं सोई मेरे सिर पर आयो
खुल गई अंखियां भयी आनंद
ऐ सखि साजन? ना सखि चांद!

6. 
जब माँगू तब जल भरि लावे
मेरे मन की तपन बुझावे
मन का भारी तन का छोटा
ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा!

7. 
वो आवै तो शादी होय
उस बिन दूजा और न कोय
मीठे लागें वा के बोल
ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल!

8. 
बेर-बेर सोवतहिं जगावे
ना जागूँ तो काटे खावे
व्याकुल हुई मैं हक्की बक्की
ऐ सखि साजन? ना सखि मक्खी!

9. 
अति सुरंग है रंग रंगीले
है गुणवंत बहुत चटकीलो
राम भजन बिन कभी न सोता
ऐ सखि साजन? ना सखि तोता!

10. 
आप हिले और मोहे हिलाए
वा का हिलना मोए मन भाए
हिल हिल के वो हुआ निसंखा
ऐ सखि साजन? ना सखि पंखा!

Tuesday, February 18, 2014

जंगलों से गुज़रती हैं ज़िंदगी की कई राहें 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 


आज वनों के विनाश की चर्चा आम तौर पर पढ़ी-सुनी-देखी जा सकती है।  इसे पर्यावरण के समक्ष एक बड़े संकट के रूप में भी देखा जा रहा है। बढ़ती आबादी व निर्बाध रूप से हो रहे निर्माण कार्यों का कारण धरती से वन खत्म होते जा रहे हैं। वन  धरती की ऐसी प्राकृतिक संपदा है जो धरती पर मनुष्यों व जीव-जंतुओं के जीवन को आसान व रहने योग्य बनाते हैं। जंगल जीव जंतुओं को ही नहीं, जड़ी-बूटियों को भी आश्रय देते हैं। 

जंगल पर्यावरण के लिहाज से ही नहीं, किसी देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहद जरूरी हैं। दुनिया भर में जंगलों को बचाने पर बहुत जोर दिया जा रहा है, मुहिम चलाई जा रही है, पौधरोपण किया जा रहा है। इसके लिए खासतौर से प्रशिक्षित  व्यक्तियों जैसे कि फारेस्टरी स्पेशलिस्ट, फारेस्टरी मैनेजमेंट एक्सपर्ट और फॉरेस्ट ऑफिसर्स की मांग बढ़ती जा रही है। आइये, इस जानदार भविष्य विकल्प पर आज कुछ बेशकीमती जानकारी हासिल करें। 

कार्य क्षेत्र
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फॉरेस्टरी के अंतर्गत जंगलों की सुरक्षा, लकड़ी की जरुरतों को पूरा करने के लिए वृक्षों की खेती, उन्हें आग, बीमारी और अतिक्रमण रोकने से संबंधित कार्यों फारेस्टर को दक्षता प्राप्त होती है। इनके कार्यों में जीव-जंतुओं के बिहेवियर को समझना, पेड़-पौधों की वैज्ञानिक तौर पर जांच करना, कीड़े-मकोड़ों से पौधों की सुरक्षा करना आदि प्रमुखता से शामिल होता है। इसके अलावा जानवरों, पेड़ों व प्रकृति की खूबसूरती को बचाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। 

शैक्षिक योग्यता
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फारेस्टरी से संबंधित स्नातक, स्नातकोत्तर और डिप्लोमा स्तर के कई कोर्स हैं। यहां तक कि आप फारेस्टरी में पीएचडी भी कर सकते हैं। ऐसे व्यक्ति जिन्होंने इंटरमीडिएट स्तर पर फिजिक्स, केमेस्ट्री, और बायोलॉजी की पढ़ाई की है वे बीएससी फारेस्टरी का कोर्स करने के बाद फारेस्ट मैनेजमेंट, कमर्शियल फारेस्टरी, फारेस्ट इकोनामिक्स, वुड साइंस एंड टेक्नोलॉजी, वाइल्ड लाइफ साइंस, वेटेरिनरी साइंस आदि कोर्स कर सकते हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट आफ फारेस्ट मैनेजमेंट, नेहरू नगर भोपाल फारेस्ट मैनेजमेंट का कोर्स कराता है। इसके बाद आप किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से पीएचडी भी कर सकते हैं। इतना ही नहीं फॉरेस्ट्री में बैचलर डिग्री लेने के बाद आप संघ लोक सेवा आयोग, नई दिल्ली द्वारा आयोजित इंडियन फारेस्ट सर्विस की परीक्षा में भी शामिल हो सकते हैं।

अतिरिक्त योग्यता
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इस प्रोफेशन में करिअर मजबूत बनाने के लिए आपको शारीरिक रूप से भी मजबूत होना जरूरी है, इसके साथ ही आपका प्रकृति प्रेमी होना इस प्रोफेशन में सोने पर सुहागा साबित होगा। अगर आप घूमने-फिरने के शौकीन हैं, एडवेंचर पसंद करते हैं और चुस्त दुरुस्त हैं तो यह आपके करिअर को और आगे ले जाने में मदद करेगी। आप में धैर्य और वैज्ञानिक चेतना, प्रकृति से लगाव जैसे गुण हैं तो आपको फरेस्टरी के अध्ययन और उससे संबंधित कार्य में आनंद आएगा।

कोर्स और संस्थान
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इस प्रोफेशन में करिअर को बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए छात्रों को बीएससी फारेस्टरी या एमएससी फारेस्टरी में प्रवेश लेना होता है। कई संस्थान इसमें प्रवेश के लिए परीक्षा का भी आयोजन करते हैं। 

1.एग्रीकल्चर  कालेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, कोयंबटूर 
2.बिरसा एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय, कांके, रांची 
3.कालेज आफ एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी - हिसार 
4.कालेज आफ एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना 
5. कालेज आफ हार्टीकल्चर एंड फॉरेस्टरी, सोलन, हिमाचल प्रदेश 
6. जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्व विद्यालय, जबलपुर 
    के अलावा कुछ अन्य संस्थान भी हैं.

रोजगार का अम्बार 
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फारेस्टर्स का काम विशेषता के आधार पर ऑफिस, लेबोरेटरी या फील्ड कहीं भी हो सकता है। संबंधित कोर्स करने के बाद आप सरकारी और गैरसरकारी संगठनों के अतिरिक्त प्लांटेशन की फील्ड में कार्यरत कारपोरेट कंपनी में भी जॉब पा सकते हैं। इतना ही नहीं विभिन्न इंडस्ट्री में इंडीस्ट्रियल और एग्रीकल्चरल कंसल्टेंट के रूप में भी नौकरी के अवसर होते हैं। इसके अलावा अनेक शोध संस्थानों, जूलाजिकल पार्कों, आदि में नौकरी की संभावना होती है। इसके अतिरिक्त फारेस्ट और वाइल्ड लाइफ कन्वर्जेशन से संबंधित विशेषज्ञ के तौर पर आप काम कर सकते हैं।

फारेस्टर  - एक सफल फारेसटर का काम जंगल और जंगली जीवों की सुरक्षा करना, लैंड स्केप मैनेजमेंट, जंगल व प्रकृति से संबंधित अध्ययन और रिपोर्ट को तैयार करना होता है। 
डेंड्रोलाजिस्ट -डेंड्रोलाजिस्ट मुख्य रूप से लकड़ी और पेड़ों की साइंटिफिक स्टडी करते हैं। इनके कार्यों में पौधों को बीमारियों से बचाने का जिम्मा होता है। 
एंथोलाजिस्ट-इनका काम एनीमल बिहेवियर का वैज्ञानिक अध्ययन करना होता है। ये चिड़ियाघर, एक्वेरियम और लेबोरेटरी में जानवरों की हेल्दी हैबिट्स डिजाइन करने का काम भी करते हैं। इन्हें जानवरों का सबसे करीबी माना जाता है। 
एंटोमोलाजिस्ट-एंटोमोलाजिस्ट कीड़े मकोड़े से होने वाली बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए अध्ययन करते हैं। यह एक तरीके से पौधों की सुरक्षा का जिम्मा उठाते हैं।
सिल्वीकल्चररिस्ट-इनका काम जंगलों के विस्तार के लिए विभिन्न पौधों को तैयार करना है और उनके विकास की जिम्मेदारी भी इन्हीं पर होती है।
फारेस्ट रेंज ऑफिसर -इनका काम जंगलों, अभ्यारण्य, गार्डेन की सुरक्षा करना होता है। इनका चयन इंडियन फारेस्ट सर्विसेस के तहत होता है। 
जू क्यूरेटर-जू क्यूरेटर चिड़ियाघर में जानवरों की दिनचर्या को जांचता है और उनके कल्याण और प्रशासन के लिए जिम्मेदार होता है। 

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दिल से .... 

अवसर, अक्सर कठिनाइयों के घर 
में रहता है। ज़रा गौर कर दरवाज़ा 
खटखटा कर तो देखिये।

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पत्रकारिता में 'कॅरियर' की इंद्रधनुषी सम्भावनाएँ 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन  


भारत में विकास तथा गवर्नेंस का क्षेत्र हाल ही में एक नया उदाहरण बना है, जिसका मुख्य आधार नई नीतिगत अर्थ व्यवस्था, परिवर्तित व्यवसाय, परिवेश और ज्ञान की शक्ति का सर्वस्वीकृत होना है। नए हालातों में पत्रकारिता की प्रासंगिकता व्यापक रूप से बढ़ गई है। आज लोकतंत्र का यह चौथा स्तम्भ अपने महत्व और विस्तार के मद्देनज़र केन्द्रीय भूमिका में आ गया है। पत्रकारिता के बढ़ रहे महत्व को देखते हुए,कई मीडिया संस्थाएं, शैक्षिक संस्थाएं और इलेक्ट्रॉनिक चैनल स्थापित किए गए हैं। 

दरअसल मीडिया आज समाज तथा शासन का वास्तविक दर्पण बन गया है। इसे लोक शिक्षक के रूप में देखा है। मीडिया जन-साधारण की समस्याओं को उजागर करने,उनकी आवाज़ बुलंद करने तथा उन्हें न्याय दिलाने का एक प्रभावी साधन यानी मंच बन गया है। लिहाज़ा, कोई  आश्चर्य नहीं कि कॅरियर की दृष्टि भी पत्रकारिता का क्षेत्र पहले से ज्यादा विस्तृत और आकर्षक बन गया है। 

पत्रकारिता के क्षेत्र में एक सफल करियर के रूप में किसी भी व्यक्ति को जिज्ञासु,दृढ़ इच्छा शक्ति वाला, सूचना को वास्तविक, संक्षिप्त तथा प्रभावी रूप में प्रस्तुत करने की अभिरुचि रखने वाला, किसी के विचारों को सुव्यवस्थित करने तथा उन्हें भाषा तथा लिखित-दोनों रूपों में स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करने में कुशल होना चाहिए। दबाव में कार्य करने के दौरान भी नम्र एवं शांत चित्त बने रहना एक अतिरिक्त योग्यता होती है। जीवन के सभी क्षेत्रों से व्यक्तियों का साक्षात्कार लेते समय पत्रकार को व्यावहारिक, आत्मविश्वासपूर्ण तथा सुनियोजित रहना चाहिए। उसे प्रासंगिक तथ्यों को अप्रासंगिक तथ्यों से अलग करने में सक्षम होना चाहिए। अनुसंधान तथा सूचना की व्याख्या करने के लिए विश्लेषण कुशलता होनी चाहिए।

बदलते परिवेश ने वैसे देखा जाय तो प्रायः प्रत्येक करियर की संभावनाओं में आमूल परिवर्तन कर दिया है। इस लिहाज़ से पत्रकारिता एक प्रतिष्ठित व्यवसाय है और कुछ मामलों में एक उच्च वेतन देने वाला व्यवसाय है,जो युवाओं की बडी़ संख्या को आकर्षित कर रहा है। इससे कौन इंकार कर सकता है कि किसी भी राष्ट्र के विकास में पत्रकारिता अहम भूमिका निभाती है। इसमें आजकल नागरिकों की सीधी भागीदारी की मांग बढ़ती  है।यह वह साधन है, जिसके माध्यम से हमें समाज की दैनिक घटनाओं के बारे में सूचना प्राप्त होती है। वास्तव में पत्रकारिता का उद्देश्य जनता को सूचना देना, समझाना, शिक्षा देना और उन्हें प्रबुद्ध करना है।

कलम तलवार से कहीं अधिक प्रभावशाली है, इसे आज की पत्रकारिता ने सिद्ध कर दिखाया है।अब सिर्फ खबर देना पत्रकारिता नहीं है। घटनाओं की मात्र साधारण रिपोर्ट देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि रिपोर्टिंग में अधिक विस्तार, स्पष्टता , विशेषज्ञता और व्यावसायिकता होना आवश्यक है। यही कारण है कि पत्रकार अपनी योग्यता प्रमाणित करने के लिए समाचारपत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं के लिए राजनीति शास्त्र,वित्त,अर्थशास्त्र,कला, संस्कृति एवं खेल जैसे विविध क्षेत्रों के अलावा अनगिन क्षेत्रों में विशेषज्ञता प्राप्त करते हैं। घटनाओं और चीज़ों पर पकड़ के अलावा इसे भाषा पर भी अधिकार हासिल करना होता है। 

अब एक करियर के रूप में अगर देखें तो तीन ऐसे मुख्य क्षेत्र हैं जिनमें पत्रकारिता के इच्छुक व्यक्ति रोजगार ढूंढ़ सकते हैं: •शिक्षण एवं अनुसंधान •प्रिंट पत्रकारिता •इलेक्ट्रॉनिक (श्रव्य/दृश्य) पत्रकारिता।

शिक्षण एवं अनुसंधान: उच्च शिक्षा, पत्रकारों के लिए रोजगार का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, किंतु अनुसंधान भी पत्रकारिता में एक सामान्य करियर विकल्प है। पत्रकारिता में उच्च शिक्षा और पी.एचडी. उपाधि धारक कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थाओं में रोजगार तलाशते हैं। कई अध्यापन पदों पर विशेष रूप से विश्वविद्यालयों और संस्थानों में अनुसंधान सम्बन्धी कार्यकलाप अपेक्षित होते हैं। यद्यपि यह निश्चित तौर पर सत्य है कि पुस्तकों अथवा लेखों को प्रकाशित करना कार्य - सुरक्षा तथा पदोन्नति का मुख्य मार्ग है और अधिकांश विश्वविद्यालयों में वेतन वृद्धि होती है, यह अपेक्षा ऐसी स्थापनाओं में अधिक लागू होती है जहां मूल छात्रवृत्ति को महत्व तथा समर्थन दिया जाता है। तथापि कई संस्थाएं उन्नति के एक प्रारंभिक मार्ग के रूप में अनुसंधान अथवा अध्यापन पर अधिक बल देती है। 

इसके परिणामस्वरूप यद्यपि कुछ व्यवसायों में पत्रकारिता में कोई डिग्री विशेष रूप से अपेक्षित होती है, तथापि, ऐसा शैक्षिक प्रशिक्षण विविध प्रकार के व्यवसायों में जाने की एक महत्वपूर्ण योग्यता हो सकती है। पत्रकारिता में कला-स्नातक या मास्टर ऑफ आर्टस अथवा अनुसंधान (पीएच.डी.) डिग्रियों के लिए, गैर-लाभ भोगी क्षेत्र में, कोई विश्वविद्यालय, कोई संस्थान कोई व्यावसायिक या मीडिया फर्म रोजगार का क्षेत्र हो सकती है।

प्रिंट पत्रकारिता: प्रिंट पत्रकारिता समाचार पत्रों पत्रिकाओं तथा दैनिक पत्रों के लिए समाचारों को एकत्र करने एवं उनके सम्पादन से संबद्ध हैं। समाचार पत्र एवं पत्रिकाएं, वे बड़ी हों या छोटी, हमेशा विश्वभर में समाचारों तथा सूचना का मुख्य स्रोत रही हैं और लाखों व्यक्ति उन्हें प्रतिदिन पढ़ते हैं। कई वर्षों से प्रिंट पत्रकारिता बडे़ परिवर्तन की साक्षी रही है। आज समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएं विविध विशेषज्ञतापूर्ण वर्गों जैसे राजनीतिक घटनाओं व्यवसाय समाचारों, सिनेमा, खेल, स्वास्थ्य तथा कई अन्य विषयों पर समाचार प्रकाशित करते हैं, जिनके लिए व्यावसायिक रूप से योग्य पत्रकारों की मांग होती है। प्रिंट पत्रकारिता में कोई भी व्यक्ति सम्पादक, संवाददाता, रिपोर्टर, आदि के रूप में कार्य कर सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता: इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता का विशेष रूप से प्रसारण के माध्यम से जन-समुदाय पर पर्याप्त प्रभाव है। दूरदर्शन, रेडियो, श्रव्य, दृश्य (ऑडियो, वीडियो) और वेब जैसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने दूर -दराज के स्थानों में समाचार, मनोरंजन एवं सूचनाएं पहुंचाने का कार्य किया है। वेब में, कुशल व्यक्तियों को वेब समाचार पत्रों (जो केवल वेब की पूर्ति करते हैं और इनमें प्रिंट संस्करण नहीं होते और लोक प्रिय समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओं को जिनके अपने वेब संस्करण होते हैं, साइट रखनी होती है। इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता में कोई भी व्यक्ति रिपोर्टर, लेखक, सम्पादक, अनुसंधानकर्ता, संवाददाता और एंकर बन सकता है।

शिक्षा:

स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम एवं अनुसंधान चलाने वाले कई विश्वविद्यालय तथा संस्थान हैं, उनमें कुछ निम्नलिखित हैं:- 

लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी
जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली
मुद्रा संचार संस्थान
सिम्बियोसिस पत्रकारिता एवं संचार संस्थान
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
•      कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्व विद्यालय,रायपुर 
       (सूचना - उदाहरण मात्र )


अवसर :

पत्रकारिता में कोई पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद, कोई भी व्यक्ति किसी मीडिया अनुसंधान संस्थान या किसी सरकारी संगठन में एक अनुसंधान वैज्ञानिक बन सकता है। अनुसंधान कार्य के दौरान भी कोई व्यक्ति अन्य अनुदानों तथा सुविधाओं के अतिरिक्त, मासिक वृत्तिका प्राप्त कर सकता है। कोई भी व्यक्ति किसी समाचारपत्र में या इलेक्ट्रॉनिक चैनल में एक पत्रकार के रूप में कार्यग्रहण कर सकता है और अच्छा वेतन अर्जित कर सकता है। प्रेस अधिकारी के रूप में अपनी दक्षता सिद्ध कर सकता है। 

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दिल से …

बीस वर्ष की आयु में व्यक्ति का जो चेहरा रहता है, 
वह प्रकृति की देन है, तीस वर्ष की आयु का चेहरा
जिंदगी के उतार-चढ़ाव की देन है लेकिन 
पचास वर्ष की आयु का चेहरा व्यक्ति की अपनी कमाई है। 
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Monday, February 17, 2014

राजनीतिक संचार में 'भविष्य' की उजली लकीरें 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 


राजनीतिक संचार आज के युग अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया है. इसका सम्बन्ध राजनीति विज्ञान, संचार और ख़ास तौर पर मीडिया के साथ है. मीडिया, राजनीति और लोक नीति में रूचि रखने वाले मुखर विद्यार्थियों के लिए यह क्षेत्र अनंत सम्भावनाओं से परिपूर्ण है. इस कोर्स में जहां एक तरफ मीडिया और  राजनीति का अध्ययन इस तरह किया जाता है कि पब्लिक पॉलिसी को लागू करने में मीडिया की भूमिका को भलीभांति समझा जा सके, वहीं शासन और संगठन के सुचारु संचालन के मद्देनज़र अपील करने वाले प्रभावी संचार का व्यावहारिक ज्ञान भी प्राप्त किया जाता है.

कोई भी व्यक्ति, किसी देश में प्रचलित राजनीतिक संचार गतिविधियों की संरचना, अंश एवं प्रवाह के संबंध में उस देश की सामाजिक एवं राजनीतिक प्रक्रिया का विश्लेषण कर सकता है। आप प्रचार प्रबंधक,प्रचार रणनीतिकार, शासकीय अधिकारी ( निर्वाचित या नियुक्त ), राजनीतिक संवाददाता या पत्रकार, वकील, विधिक सलाहकार, राजनीतिक प्रचारक, रानीतिक विश्लेषक, प्राध्यापक, जन संपर्क प्रबंधक, प्रेस सचिव, सम्भाषण लेखक, प्रवक्ता अदि बन सकते हैं. लेकिन, याद रहे कि ये कुछ उदाहरण मात्र  हैं. वास्तव में राजनीति और प्रशासन ही किसी भी देश की व्यवस्था की धुरी है. इसलिए राजनीतिक संचार में निपुण व्यक्ति के लिए अवसरों की कमी नहीं है.

कार्य –क्षेत्र
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राजनीतिक संचार उन संदेशों का आदान-प्रदान करता है और उसे अर्थ देता है जो सार्वजनिक नीति के संचालन से संबंधित होते हैं। संदेश व्यापक रूप में शासन से या सार्वजनिक नीति के संचालन से संबंधित होते हैं, सामान्यतः यह माना जाता है कि राजनीतिक संचार केवल चुनावों से संबंधित होता है, किंतु ऐसा नहीं है। राजनीति मोटे तौर पर उस प्रक्रिया को निर्धारित करती है; और उससे संबंधित होती है, जिसके द्वारा समाज नीतिगत मामलों पर सर्वसम्मति पर पहुंचता है। इस तरह, राजनीति संचार का आधार विशिष्ट वर्ग अथवा आम जनता के व्यापक संबंध वाले मामलों के बारे में नागरिकों, मीडिया एवं नेताओं के ‘कथोपकथन’ है।

राजनीतिक संचार में संचार, राजनीति विज्ञान, मनोविज्ञान, सामाजिकी, प्रबंधन एवं दर्शन शास्त्र विषयों के स्नातकों के लिए अवसर हैं।राजनीतिक संचार में कुछ सीखने और आगे बढ़ने के लिए चुस्त-दुरुस्त मानसिकता के साथ-साथ लचीलापन बेहद जरूरी है. इसमें राजनीति या संचार का सैद्धांतिक अध्ययन मात्र सब कुछ नहीं है बल्कि संचार-संवाद में उस पढ़ाई का सही व सटीक उपयोग करना सीखना महत्वपूर्ण है.

राजनीति संचार के छात्र सामान्यतः नीति एवं शासन मामलों की आम जनता की समझ को रूप देने में संचार एवं मीडिया की भूमिका के बारे में शिक्षा प्राप्त करते हैं। वे मीडिया के समर्थन, राजनीतिक विकास के बारे में संदेशों के प्रारूपण एवं राजनीतिक सेवाओं को प्रोतसाहन देने की नीतियों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। संचार एक ऐसा मुख्य साधन है जिसका राजनीतिक संचार किसी राष्ट्र के राजनीतिक जीवन के प्रत्येक पहलू पर बल देते हुए राजनीतिक माहौल को समझने में प्रयोग करते हैं। 

राजनीतिक संचार का कार्य - क्षेत्र विशाल है।  एक सुनियोजित राजनीतिक संचार प्रयास व्यक्तियों को, उपयुक्त ज्ञान के माध्यम से विवेक पूर्ण एवं संगत नीतिगत निर्णय लेने में समर्थ बनाता है, उनमें आवश्यक कौशल तथा आशावाद का संचार करता है, परिवर्तित मानसिकता तथा परिवर्तित आचरण के माध्यम से उपयुक्त कार्य को सुसाध्य बनाता है । भारत जैसे देश में, जहां अधिकांश जनसंख्या या अब भी गांवों में रहती है तथा निरक्षरता एवं गरीबी जैसी समस्याएं अब भी विकास के मार्ग में बाधक हैं, हमें ऐसे जन-समुदाय तक पहुंच ने के लिए ऐसे कई संचार चैनलों की आवश्यकता है जो व्यक्तिगत तथा सामाजिक स्तर पर अच्छे शासन के रूप में राजनीतिक विकास की जानकारी रखते हों और उन्हें प्रोत्साहन देने में सक्षम हों।

क्या करना  होता है ?
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संचार /मीडिया अध्ययन में डिग्री या डिप्लोमा के साथ किसी समाज/राष्ट्र की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक प्रणाली की व्यापक समझ व्यक्ति को सरकार एवं सार्वजनिक कार्यों के बीच एक सम्पर्क-कड़ी के रूप में कार्य करने के विभिन्न संचार कार्य के अवसर दे सकती है जो यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि आम व्यक्ति अच्छे शासन के श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। सामान्य राजनीतिक संचार व्यवसाय व्यक्ति के प्रोफाइल वृद्धि कार्यक्रम, मीडिया विश्लेषण, मीडिया सामग्री निर्माण, राजनीतिक कॉन्फरेंसों तथा इवेंट्स के आयोजन एवं प्रबंधन, भाषण और प्रस्तुति लेखन जैसे और ऐसे अन्य अनेक क्षेत्रों में कार्य करने के अवसर देता है।

समर्थन की भूमिका में, राजनीतिक संचार  राजनीतिक नेताओं को ‘‘क्या, कैसे, किसे और कब कहना है” पर सलाह देते हैं। राजनीतिक संचार के व्यवसाय में राजनीतिक निगरानी, नीतिगत अनुसंधान और विश्लेषण, योजनागत एवं कार्य-विधि संबंधी सलाह देन और प्रतिष्ठा प्रबंधन कार्य शामिल हैं ताकि राजनीतिक नेताओं को यह जानकारी हो कि वे अपनी प्रतिष्ठा कैसे बढ़ाएं और अपने समाज के व्यक्तियों से मजबूत संबंध कैसे बनाएं।

अच्छे संचार एवं प्रबंधन कौशल के साथ राजनीति एवं संचार के बीच सह-संबंध की संकल्पना समझ वाला व्यक्ति, अपने ग्राहकों के लिए राजनीतिक तथा नीतिगत अभियान प्रबंधन योजनाओं का विकास करने, संयोजन करने एवं चलाने के लिए राजनीतिक संचार परामर्श-संस्थाओं के साथ कार्य कर सकता है। राजनीतिक संचार परामर्श संस्थाएं इटंरनेट निगरानी एवं रिबटल सहित व्यावहारिक एवं नव प्रवर्तित इलेक्ट्रॉनिक अभियान सेवाओं का विकास कर रहे हैं ऑनलाइन प्रेस कार्यालय चला रहे हैं, जो आपको साइबर मीडिया के साथ एक राजनीतिक संचारक के रूप में कार्य करने का भी शानदार अवसर देते हैं।

पात्रता और पढ़ाई  
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इस समय कई भारतीय विश्वविद्यालयों के संचार विभाग स्नातकोत्तर स्तर पर राजनीतिक संचार को अपने एक वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ा रहे हैं। पत्रकारिता एवं जनसंचार में प्रशिक्षित एवं राजनीति विज्ञान, सामाजिकी, मनोविज्ञान या प्रबंधन में डिग्रीधारी व्यक्ति को विविध क्षेत्रों में एक राजनीतिक संचार क के रूप में कार्य करने के लिए आसानी से भर्ती किया जा सकता है। संचार की दृष्टि से विकास के राजनीतिक आयामों की अच्छी समझ होना इसकी प्रथम अपेक्षा है।

रोजगार की खोज कहाँ ?
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राजनीतिक विकास के क्षेत्र में कार्यरत सरकारी राजनीतिक संगठन, राजनीतिक एजेंसियों और विभाग तथा शैक्षिक एवं अनुसंधान संस्थाएं, संचार परामर्श संस्थाएं, शासन क्षेत्र में कार्यरत मीडिया संगठन, गैर-सरकारी संगठन सामान्यतः अपनी रिक्तियां समाचार पत्रों में विज्ञापित करते हैं। इन संगठनों के वेबसाइट पर भी रोजगार, पात्रता एवं आवेदन-पद्धति के विवरण दिए जाते हैं। इन एजेंसियों के साथ आप एक राजनीतिक संचार विशेषज्ञ, पत्रकार, अनुसंधानकर्ता तथा मीडिया सलाहकार के रूप में कार्य कर सकते हैं।

वेतन
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राजनीतिक संचार क्षेत्र में वेतन आपकी योग्यता तथा अनुभव, नीति एवं शासन संबंधी मामलों में आपकी विशेषज्ञता और आपकी संचार कुशलता पर निर्भर करता है। संचार अध्ययन में डिग्री या डिप्लोमा के साथ राजनीतिक विकास मामलों की अच्छी समझ आपको एंट्री स्तर के पदों पर 25000/- रु. वेतन और अधिक  भी अर्जित करने में सहायता कर सकती है। एक मजबूत नेतृत्व, टीम विकास तथा नेटवर्किंग कौशल नीति-प्रबंधन एवं शासन क्षेत्र में आपको कोई उच्च पद दिला सकता है।

कौशल निखारें 
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एक राजनीतिक संचार के रूप में किसी व्यक्ति को किसी सम्पूर्ण राजनीति संचार अभियान को अनुकूल बनाने के लिए प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए या किसी वेबसाइट के लिए साधारण राजनीतिक संदेशों की रूपरेखा को लेकर सभी स्तरों पर प्रभावी संचार की अच्छी समझ होनी चाहिए। समस्याओं का विश्लेषण करना सीखना होगा।

यह समझने के लिए कि किसी देश में राजनीतिक आधुनिकीकरण की सम्पूर्ण प्रक्रिया किस तरह स्थान लेती है, एक राजनीतिक संचारक के रूप में आपको उस समाज की वस्तुनिष्ठ सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं के वृहद् विश्लेषण तथा विषयनिष्ठ मनोवैज्ञानिक समस्याओं के सूक्ष्म विश्लेषण की व्यापक समझ होनी चाहिए। याद रहे कि यह क्षेत्र समझदारी के साथ-साथ सहनशीलता की मांग भी करता है,वरना इसमें टिक पाना मुश्किल है.

दिल से 
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अपने अन्दर योग्यता का होना अच्छी बात है , 
लेकिन दूसरों में योग्यता खोज पाने वाले सचमुच महान होते है.
इसलिए,जीवन में हमारी सबसे बडी जरूरत कोई ऐसा व्यक्ति है, 
जो हमें वह कार्य करने के योग्य बना दे  जिसे हम कर सकते हैं ।

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