Monday, June 9, 2008

अगर वक़्त मिला होता....!


हमारे शहर में, 'मुक्तिबोध-स्मारक' के लोकार्पण प्रसंग पर
११-१२ सितम्बर २००५ को
प्रख्यात कवि-समालोचक श्री अशोक वाजपेयी के साथ मुझे
'त्रिधारा' साहित्य-संवाद में सहभागिता और संयोजन का सौभाग्य मिला था।
उनकी ये कविता मैंने उद्भावना कवितांक ४७-४८ में पढ़ी थी।
सोचा कि आपको भी बताऊँ कि क्या होता ...अगर वक़्त मिला होता !
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अगर वक़्त मिला होता
तो मैं दुनिया को कुछ बदलने की कोशिश करता।
आपकी दुनिया को नहीं/अपनी दुनिया को
जिसको सम्हालने-समझने
और बिखरने से बचाने में ही वक़्त बीत गया।

वैसे वक़्त का टोटा नहीं था
कुल मिलाकर ठीक-ठाक मिल ही गया
पर पता नहीं क्यों पूरा नहीं पड़ा।
अनंत पर इतना एकाग्र रहा
कि शायद इतिहास पर नज़र डालना भूल गया।

उस वक़्त में प्रेम किया,भोजन का जुगाड़ किया,
छप्पर नहीं जुटा लेकिन लोगों के संग-साथ की /
गरमाहट ने सहारा दिया,
कविताएँ लिखीं, कुछ दूसरों की मदद की/
कुछ बेवज़ह विवाद में फँसा
नौकरी की और शिखर पर पहुँचने में सफल नहीं हुआ,
झंझटों से बिना कुम्हलाये निकल आया
पर न सुख दे सका,न पा सका।

हँसने के लिए महफिलें बहुत थीं
रोने के लिए कंधे कम मिले
जब-तब भीड़ में पहचान लिया गया
पर इसीलिए चेहरे के सारे दाग़ जग-ज़ाहिर होते रहे।
पुरखों की याद करने का मौका कम आया
और पड़ोस के कई लोगों के चेहरे /गैब में गुम होते रहे
मुझे कोई भ्रम नहीं है/कि मेरे बदले
दुनिया जरा भी बदल सकती है
पर अगर वक़्त मिलता/तो एक छोटी सी कोशिश की जा सकती थी,
हारी होड़ सही/लगाई जा सकती थी।

दुनिया यों बड़ी मेहनत-मशक्कत से/ बदलती होगी
फौज़-फाँटे और औजारों-बाज़ारों से,
लेकिन शब्दों का एक छोटा सा लुहार/और नहीं तो
अपनी आत्मा की भट्टी में तपते हुए/इस दुनिया के लिए
एक नए किस्म का चका ढालने की
ज़ुर्रत कर ही सकता था -

अगर वक़्त
मिला होता
तो दुनिया की हरदम डगमगाती गाड़ी में
एक बेहतर चका लगाकर उसका सफ़र आरामदेह बनाने की,
उसे थोड़ा सा बदलने की गुस्ताखी तो की ही जा सकती थी।
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7 comments:

मीत said...

बहुत बढ़िया है भाई. हम तक पहुंचाने का बहुत बहुत शुक्रिया.

बाल किशन said...

सुंदर कविता.
पढ़ कर लगा जैसे मेरे बारे मे ही लिखी गई हो.
बहुतों को ऐसा लगता होगा शायद यही इसकी खासियत है.

नीरज गोस्वामी said...

"अगर वक़्त मिला होता"
जैन साहेब
वक्त ही तो नहीं मिलता जीवन में...ये ही त्रासदी है.
बेहद खूबसूरत रचना...अशोक वाजपेयी की क्या बात है. लाजवाब.
नीरज

DR.ANURAG said...

vah..ek jamane me insaan apni soch yahi se shuruaat karta hai..

Udan Tashtari said...

बहुत आभार इसे यहाँ प्रस्तुत करने का.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

मीत जी,बालकिशन जी,नीरज जी,
डाक्टर अनुराग और समीर साहब
आप सब का तहे दिल से शुक्रिया.
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सृजन और अभिव्यक्ति के
पथ आपका साथी
चंद्रकुमार

Hindi Choti said...


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