Sunday, July 20, 2008

सूक्ति-कविता...!


मिलन सारिता,वचन मधुरता
विनय शीलता,हृदय पवित्र
बुद्धि,साहस और परिश्रम
जीवन उन्नति के ये सूत्र
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व्यर्थ है शिक्षा
सकल संस्कार,शुद्धाचार बिन
फूल है क्या काम का
मधु सुरभि के संभार बिन
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छोड़िए रोना व्यथा का

वेदना में चीखना

दुश्मनी इनसे न करना

बेहतर है सीखना

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8 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सुंदर कथन

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया!!

shailee said...

बहुत बढिया ।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

रंजना जी
परमजीत जी
और शैली...
आप सब का शुक्रिया.
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डा. चन्द्रकुमार जैन

Udan Tashtari said...

बहुत बढिया ।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

आभार समीर साहब.
चन्द्रकुमार

vipinkizindagi said...

अच्छा लिखा है

Dr. Chandra Kumar Jain said...

धन्यवाद विपिन.
खूब लिखिए...अच्छा लिखिए
खूब अच्छा पढिए.
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सस्नेह शुभकामनाएँ
डा.चन्द्रकुमार जैन