Tuesday, August 12, 2008

हर क़दम आलोक....

उठो साथी हर क़दम

आलोक करना है

तड़पती हर ज़िंदगी का

शोक हरना है

व्यक्तिगत सुख का हमें

बलिदान करके भी

शांति से हर एक घर का

चौक भरना है

उठो साथी......!

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11 comments:

नीरज गोस्वामी said...

जैन साहेब...हमेशा की तरह...एक प्रेरक रचना...आप को नमन.
नीरज

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत सुंदर! प्रेरणादायक कविता..

Dr. Chandra Kumar Jain said...

नीरज जी
और मिश्र जी
आभार आपका.
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चन्द्रकुमार

सुनीता शानू said...

एक ओजमयी रचना के लिये बधाई,

Mumukshh Ki Rachanain said...

चन्द्र कुमार जी,
पुराने संस्कारों को पुनः जीवित करने हेतु एक ओजमयी आह्वाहन के लिए आप बधाई के पात्र हैं.
आपकी रचना की निम्न पंक्तियाँ दिल को छो गई............

तड़पती हर ज़िंदगी का
शोक हरना है

चन्द्र मोहन गुप्त

अनुराग said...

bahut khoob.....lage rahiye.....

Dr. Chandra Kumar Jain said...

सुनीता जी
चंद्र मोहन जी
डॉ.अनुराग साहब
शुक्रिया आप सब का.
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डा.चन्द्रकुमार जैन

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन, मित्र. बधाई.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

धन्यवाद समीर साहब.
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चन्द्रकुमार

राजीव रंजन प्रसाद said...

प्रेरक..

Dr. Chandra Kumar Jain said...

शुक्रिया राजीव
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डा.चन्द्रकुमार जैन