Friday, November 14, 2008

बस एक पर उपकार है....!

आभूषण नर देह का
बस एक पर उपकार है
हार को भूषन कहे
उस बुद्धि को धिक्कार है
स्वर्ण की ज़ंजीर बांधे
श्वान फ़िर भी श्वान है
मुक्ति को जो समझ ले
वो ही यहाँ इंसान है।
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3 comments:

अजित वडनेरकर said...

बहुत खूब डाक्टसाब...

अभिषेक ओझा said...

सुभाषित !

madan said...

Sir is kavita ki koi detail bata sakte ho kya?

Auther's name
Poem ka name etc

ya puri kavita.....
I need it