Monday, December 1, 2008

उन गीतों को आज जगाओ...!

ऐसे गीत बचा कर रखो

जो घावों को भर सकते हों,

उन गीतों को आज जगाओ

जो दुर्दिन से लड़ सकते हों !

और ज़रा तुम गीत चुनिंदा

ऐसे चुनो समय के साथी,

देश के दुश्मन की छाती पर

वक़्त पड़े जो चढ़ सकते हों !!

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10 comments:

sandhyagupta said...

Utsaah badhane wali rachna.

Anil Pusadkar said...

हां गुस्से के साथ-साथ ये भी ज़रुरी है। अच्छी रचना।

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया व सामयिक रचना है।बधाई।

अजित वडनेरकर said...

गुस्सा झलक रहा है

अभिषेक ओझा said...

सहज ही मन से निकली हुई पंक्तियां हैं... आजकल बहुत आक्रोश है मन में !

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

ऐसे चुनो समय के साथी,
देश के दुश्मन की छाती पर
वक़्त पड़े जो चढ़ सकते हों
samayik veer ras se paripoorn . umda. badhai.

अशोक मधुप said...

ऐसे गीत बचा कर रखो
जो घावों को भर सकते हों,उन गीतों को आज जगाओ जो दुर्दिन से लड़ सकते हों !
बहुत अच्छा गीत। बधाई

नीरज गोस्वामी said...

क्या बात है जैन साहेब...बेहद कमाल की रचना...एक एक शब्द सच्चा...
नीरज

dr. ashok priyaranjan said...

अच्छा िलखा है आपने । भावों को प्रभावशाली ढंग से अिभव्यक्त िकया है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-उदूॆ की जमीन से फूटी गजल की काव्यधारा । समय हो तो पढें और प्रतिक्रिया भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

Hindi Choti said...


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