Monday, December 8, 2008

अहा ! ज़िंदगी.

दुःख को सुख से भाग भले दो

दुःख से भाग नहीं पाओगे।

जितना सुख जग को बाँटोगे

उतना गुना सहज पाओगे।।

एक प्रतिध्वनि यह जीवन है

दिया हुआ वापस मिलता है।

सुख-दुःख में सम रह पाए तो

अहा! ज़िंदगी कह पाओगे !!

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9 comments:

Vidhu said...

जितना सुख जग को बाँटोगे

उतना गुना सहज पाओगे।।

achchi kavitaa hai,badhai.

"अर्श" said...

behad khubsurat kavita bahot hi khub kaha hai aapne... aap jaise bidwano ko bhala main kya badhai de sakta hun....

abhar

arsh

Dr. Chandra Kumar Jain said...

प्रिय अर्श,
आपकी शुभकामनाएँ
बहुत मूल्य रखती है.
हमारा स्नेह पूर्ण आशीष है कि
आप निरंतर आगे बढ़ें.
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

mehek said...

sachi baat sundar

रंजना said...

एक प्रतिध्वनि यह जीवन है


दिया हुआ वापस मिलता है।


shashvat satya.
sundarta se satya ka udghatan kiya aapne.

श्यामल सुमन said...

सत्कर्मों का जोड़ लगाना।
पाप पुण्य को रिज घटाना।
गुणा करोगे समय से उसको,
तब सच्चा फल पाओगे।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

अभिषेक ओझा said...

"सुख-दुःख में सम रह पाए तो" सुख है तो बाँट लो... दुःख है तो सम रहो ! बहुत अच्छी लगी ये कविता भी.

नीरज गोस्वामी said...

जितना सुख जग को बाँटोगे
उतना गुना सहज पाओगे।।
एक प्रतिध्वनि यह जीवन है
अद्वितीय रचना....कम शब्दों में गहरी बात कहना आप के ही बस की बात है...क्या कहूँ.....वाह...
नीरज

मोहन वशिष्‍ठ said...

जितना सुख जग को बाँटोगे

उतना गुना सहज पाओगे।।

प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक कविता के लिए बारम्‍बार बधाई