Monday, December 22, 2008

कोटि-कोटि आँखों के आँसू...!

अहं-ग्रंथि जो काटे मन की
सच्चा नमन वही होता है,
जो करनी का बीज बन सके
सच्चा कथन वही होता है।
कोटि-कोटि आँखों के आँसू
जिनके दो नयनों में छलकें,
जिसका मन जग का दर्पण हो
सच्चा श्रमण वही होता है।।
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10 comments:

विनय said...

बहुत ही बढ़िया

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http://prajapativinay.blogspot.com/

डॉ .अनुराग said...

भावपूर्ण !

रंजना said...

वाह ! वाह ! वाह !
सत्य को कितनी सुन्दरता से कहा है आपने....एकदम मन मुग्ध हो गया.बहुत बहुत सुंदर .
साधुवाद.

विवेक सिंह said...

श्रमण क्या होता है ? कृपया बताएं .

Dr. Chandra Kumar Jain said...

विवेक जी,
श्रमण का अर्थ होता है साधु.
भारत में ब्राह्मण और श्रमण ये
दो संस्कृतियाँ सुविदित हैं....महावीर
और बुद्ध श्रमण संस्कृति के दो शिखर हैं.
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आप आते रहिये.....अच्छा लगा.
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Dr. Chandra Kumar Jain said...

विनय जी
डॉ.अनुराग
रंजना जी,
आपका भी बहुत बहुत शुक्रिया.
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

सतीश सक्सेना said...

बहुत ख़ूबसूरत रचना !

Vijay Kumar Sappatti said...

bahut sundar , bhaavpoorn abhivyakhti ..

specially these lines :::

जिसका मन जग का दर्पण हो
सच्चा श्रमण वही होता है।।

aapko bahut badhai ..

vijay
for some new poems , pls visit my blog : http://poemsofvijay.blogspot.com/

Dr. Chandra Kumar Jain said...

सतीश भाई और विजय जी
आभार आपका.
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चन्द्रकुमार

अजित वडनेरकर said...

अद्भुत गीत है...बोध है...
आपका कायल हूं कि छोटी छोटी पंक्तियों में
सच्ची और प्रबोधनकारी बात
आप कविता में कह डालते हैं

"अहं-ग्रंथि जो काटे मन की
सच्चा नमन वही होता है"

धन्यवाद...