
सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते
किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल
तुम हो हमें करवट भी बदलने नहीं देते
परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले
क्यों हमको जलाते हो कि जलने नहीं देते
हैरान हूँ किस तरह करुँ अर्ज़-ए-तमन्ना
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते
दिल वो है कि फरियाद से लबरेज़ है हर वक़्त
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते
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अकबर इलाहाबादी की ग़ज़ल.
2 comments:
bahut hi khubsoorat likha hai aapane ......bahut bahut badhaaee
बहुत दिनो बाद अकबर ईलाहाबादी को पढा ,धन्यवाद डॉ.चन्द्रकुमार
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