Friday, August 21, 2009

ख़ुद से सही पहचान हो जाए....!

कि जिस दिन आपकी ख़ुद से सही पहचान हो जाए

उसी दिन सारी दुनिया में अलग ही शान हो जाए

ये सुख-दुःख, लाभ-हानि, कुछ नहीं बस फेर है मन का

सबब इन सब का क्या है जिस घड़ी ये ज्ञान हो जाए

फ़रक छोटे बड़े का भी बहुत तकलीफ देता है

सहज समभाव बन जाए विलग अभिमान हो जाए

जो हम सब एक हों अपना-पराया कौन रह जाए

नहीं कुछ भी कहीं अन्तर अगर संज्ञान हो जाए

जो दुनिया चल रही है तो चलाने वाला भी होगा

अगर जग के नियंता का जरा भी भान हो जाए

कोई भी कामयाबी छुप नहीं पाती छुपाने से

बिना बोले ही सत् की बात कानों कान हो जाए।

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डॉ.बी.पी.दुबे की ग़ज़ल साभार प्रस्तुत.

6 comments:

कविता said...

Khud se pahchaan jaroori hai.
Think Scientific Act Scientific

pukhraaj said...

कभी तो देखो आईने को कि आइना कभी झूठ नहीं बोलता

ओम आर्य said...

बहुत ही खुबसूरत बात कही है आपने ............इस रचना के माध्यम से .....बधाई

mehek said...

जो हम सब एक हों अपना-पराया कौन रह जाएनहीं कुछ भी कहीं अन्तर अगर संज्ञान हो जाए
bahut hi sachhi sahi baat keh di,sunder rachana.

Mrs. Asha Joglekar said...

Bhut hee sunder jeewan darshan ko ujagar karatee ye aapkee gajal bahut man bhayee.

Mrs. Asha Joglekar said...

Bahut