Thursday, September 3, 2009

छवि....!


इस दुनिया की
जो छवि है मेरे भीतर
उसमें एक स्त्री के वक्ष की तरह
थामे हुए हैं उसे
नन्हे शिशु हाथ।
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प्रेम रंजन अनिमेष की पंक्तियाँ साभार.

6 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

वाह.....।
कितना सुन्दर परिकल्पना है।

नीरज गोस्वामी said...

अद्भुत कल्पना है...वाह...
नीरज

सागर said...

वाजिब सोच... और उदार भी... vv

ओम आर्य said...

खुबसूरत सोच ......

राज भाटिय़ा said...

मां का स्वरुप ही तो है यह धरती, बहुत सुंदर रचना.
धन्यवाद

शरद कोकास said...

चित्र और कविता एकाकार हो गये