Wednesday, August 4, 2010

मुक्तक....

माटी को रौंदो इतना अपने पाँवों से,
कि कला- करों से माटी की मूरत गढ़ जाए।
कई सीढियां चढ़ीं अभी अनगिन बाक़ी हैं,
जिन पर चढ़ कर ये जीवन ऊपर चढ़ जाए।।
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5 comments:

Rahul Singh said...

आपका पथ प्रशस्‍त हो.

रंजना said...

सुन्दर प्रेरणादायक...

'उदय' said...

... बेहतरीन !!!

अभिषेक ओझा said...

बड़े दिनों के बाद आना हुआ आपका ?

Vivek VK Jain said...

nice poem.....