Tuesday, August 7, 2012

अपना देश - अपनी बात


पहचान   के  'आधार' से सरोकार की दरकार

डॉ.चन्द्रकुमार जैन

===============
राजनांदगांव, छत्तीसगढ़. मो. 093010 54300


भोर हुई आँगन में, शुरू हुई उड़ान,

मिली हमें पहचान,

खुले नए द्वार, हमारा 'आधार'.

हर भारतवासी को पहचान पत्र और विशिष्ट पहचान नंबर देने की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘आधार’ की शुरुआत महाराष्ट्र के नंदूरबार जिले के तेंबली गांव से हुई थी. वहाँ रंजना सोनवाने को 12 अंकों वाला पहला विशिष्ट पहचान नंबर (यूआईडी नंबर) दिया गया। यह नंबर लोगों को सशक्त करने की दिशा में एक अहम कदम है. इसका विकास में सभी लोगों को शामिल करना है. महसूस किया जा रहा है कि पुराने तौर-तरीकों और नीतियों के दम पर ऐसे किसी लक्ष्य तक पहुँचना संभव नहीं है. 'आधार' परियोजना के लिए बाकायदा जीवन ऊर्जा के मूल स्रोत सूरज और अंगूठे के निशान वाला प्रतीक चिन्ह भी जारी किया गया.

गौरतलब है कि सूचना का अधिकार, महात्मा गांधी नरेगा और शिक्षा का अधिकार जैसे कार्यक्रमों की तरहविकास को व्यापक और समुचित बनाने की दिशा में हर भारतवासी को पहचान का नया आधार देने का यह कदम उठाया गया है. समझा जा रहा है कि इससे व्यवस्था पारदर्शी बनाई जा सकेगी ताकि समय पर सहायता सही लोगों तक पहुँच सके.इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आधुनिक भारत का प्रतीक और विभिन्न आर्थिक परियोजनाओं के लिए मजबूत आधार की तरह देखा जा रहा है।

दरअसल विशिष्ट पहचान के इस अभियान में देश के समग्र आर्थिक विकास के नव-संकल्प के बीज भी छुपे हैं, क्योंकि लोकतंत्र में 'लोक' की मौजूदगी के बगैर न तो लोक हित संभव है और न ही सुशासन के स्वप्न को साकार करना मुमकिन है. यदि कोई देशवासी अपनी पहचान के लिए ही भटकता रहेगा तो देश को दुनिया में नई पहचान आखिर क्यों कर मिलेगी ? लेकिन, काफी अरसे से यह भी महसूस किया जा रहा है कि जिस गति से जनता को इस पहचान से रूबरू करवाया जाना था, वह गति सतह से ऊपर उठ नहीं पा रही है, लिहाजा आधार पर अमल के सरोकार की दरकार पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है.

बड़ा काम - बड़े लाभ

इस विशाल परियोजना के निर्धारित लक्ष्य पर गौर करें तो वर्ष 2014 तक 60 करोड़ लोगों को इसके दायरे में लाने की योजना है. इस कार्ड का इस्तेमाल बैंक खाता खोलने, टेलीफोन कनेक्शन लेने जैसे कामों में पहचान के रूप में किया जा सकता है. देश के हर नागरिक को यूआईडी नंबर देने का ज़िम्मा इंफ़ोसिस के सह-संस्थापक श्री नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में गठित भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) को सौंपा गया है. भारत में आजादी के बाद कई महत्वपूर्ण अभियान शुरू किये गए जिनकी सफलता प्रायः जान जागृति और जन सहभागिता पर निर्भर रही है.लेकिन 'आधार' परियोजना को लेकर लोगों में अब तक वैसी जागरूकता नहीं दिख रही है जैसी किसी एक जिम्मेदार कदम के हमकदम होने के लिए ज़रूरी है. लोगों को समझना चाहिए कि यह योजना किस तरह बहुआयामी सुविधाओं के उपयोग और उपभोग के लिए उनकी राह आसान कर सकती है. लोग जानें कि इस योजना के तहत एक अरब से अधिक भारतीयों को एक विशिष्ट नंबर ( यूनीक आईडेंटिफ़िकेशन नंबर) दिया जाएगा.कार्ड का मक़सद है लोगों को पहचान देना, साथ ही उन लोगों की मदद करना जिन्हें सरकारी योजनाओं का फ़ायदा इस वजह से नहीं मिलता क्योंकि उनके पास अपनी पहचान साबित करने का कोई आधार नहीं होता है. 'आधार' कार्ड विभिन्न रजिस्ट्रार एजेंसियों के माध्यम से दिए जाएंगे. इसके लिए भविष्य में व्यापक प्रचार अभियान चलाये जाने की तैयारी की भी खबर है।

पहचान की चलित गवाही

आधार में रजिस्टर होने के बाद लोगों की बायोमेट्रिक पहचान यानी उंगलियों के निशान, आँखों की पुतली की छाप के साथ ही उनकी तस्वीर ली जा रही है. पूरी प्रक्रिया ख़त्म होने के बाद उन्हें एक एनरोलमेंट नंबर और इसके 20 से 30 दिनों के भीतर 'आधार' नंबर दिया जा रहा है. प्रक्रिया से जुड़ी शिकायतों के लिए भी एक केंद्र बनाये जाने की पहल की गयी है. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के अध्यक्ष के मुताबिक वे बंजारों और यायावर आदिवासी जैसे भारतीयों को भी विशिष्ट पहचान पत्र दिलाना चाहते हैं, जिनके पास अपनी पहचान बताने के लिए कोई सरकारी दस्तावेज़ नहीं है. इसके लिए जानकारी हासिल करने के पहले तरीके में राशन कार्ड और रोज़गार कार्ड की तरह के सरकारी कागज़ात काम आएंगे.सत्यापन के लिए जानकारी हासिल करने में किसी ऐसे आदमी की गवाही भी उपयोगी है जो कहे कि वो उन्हें अच्छे से जानता है. इस पहचान पत्र के बाद भारत के एक हिस्से के आदमी की पहचान का सत्यापन भारत के दूसरे हिस्से में भी आसानी से हो जाएगा. ये 'मोबाइल पहचान पत्र' होगा. भारत के किसी भी कोने से किसी भी आदमी की पहचान तय करने के लिए महज़ फ़ोन कर के उसके कार्ड का क्रमांक बताना होगा और कम्पूटर के 'एस' या 'नो' ज़वाब मात्र से उसका सत्यापन हो जाएगा

इलेक्शन आईडी से अलग वजूद

समझा जा रहा है कि आधार पहचान पत्र शायद मतदाता परिचय पत्र की तरह ही होगा किन्तु जानकारी के अभाव में लोगों को ये तथ्य अभी स्पष्ट नहीं है कि चुनाव आयोग के मतदाता पहचान पत्र से अलग इस पहचान पत्र के लिए एक ही सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके लिए एक ही प्रक्रिया इस्तेमाल होगी और हर चीज़ की दो बार जाँच होगी. पहला कार्ड जो जारी हुआ है उसमें इस तकनीक का सफल प्रयोग जाहिर हो गया है. परन्तु, कोई संदेह नहीं कि अगले चार सालों में साठ करोड़ लोगों को पहचान नंबर मुहैया करना बेहद चुनौती पूर्ण कार्य होगा क्योंकि जैसे-जैसे दूर दराज़ के हिस्सों में पहचान कार्यकर्ता जाएँगे, उन्हें नई कठिनाइयों का सामना करना होगा।

हर भारतीय का अधिकार

यहाँ 'आधार' के विषय में कुछ जरूरी बातें जान लेने की ज़रुरत है। मसलन आधार के उपयोग की कोई कानूनी बाध्यता नहीं होगी.यह सिर्फ भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं है. यह हर उस व्यक्ति का अधिकार है जो भारत में रहता हो.आधार, भारत की नागरिकता का सबूत नहीं बल्कि केवल एक पहचान होगा। कोई भी व्यक्ति आधार की मांग कर सकता है. आधार किसी दीगर दस्तावेज़ जैसे राशन कार्ड, पासपोर्ट का स्थानापन्न नहीं है. यह सिर्फ बायोमेट्रिक और डेमोग्राफिक सूचना एकत्र करेगा. इसका सम्बन्ध जाति, धर्म या भाषा से नहीं है.इसके लिए जन्म तिथि भी एच्छिक है. न मालूम हो तो अनुमानित तिथि निकालने का प्रावधान किया गया है. .भारत के निवासियों के लिए इसके अपने बैंक खाते में भी उपयोग का विकल्प खुला होगा. पैन कार्ड में भी इसे मुद्रित करने की सहमति प्रदान कर दी गयी है।

तो लीजिए, अपनी पहचान के नए आधार के स्वागत के लिए जागरूक रहकर पहल से शुमार हो जाइए. 12 अंकों में साल के बारह महीने, कभी भी, कहीं भी बगैर किसी मशक्कत के खुद को 'प्रूव'करने की सहूलियत आपके साथ चलेगी.

==============================================

Monday, August 6, 2012

सुलगता सवाल


ई वेस्ट की अनदेखी पड़ सकती है भारी
=================================

डॉ. चन्द्रकुमार जैन

राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)

===========================


विकसित देशों के साथ विकासशील देशों की प्रतिस्पर्धा कोई नई बात नहीं है, किन्तु भारत को ऐसी प्रतिस्पर्धा का खामियाजा ई वेस्ट यानी इलेक्ट्रानिक कचरे की गंभीर समस्या के रूप में भुगतना पड़ेगा, इसकी शायद कल्पना भी नहीं की गयी थी. कई देशों ने अपने ई-वेस्ट के निबटारे के लिए भारत को स्थायी और सुविधाजनक अड्डा बना लिया है. दूसरी ओर भारत में इस समस्या से निदान का कोई ठोस प्रबंधन नहीं दिख रहा है.

अनियोजित और अव्यवस्थित ढंग से,सब तरफ चीजें रिसाइकिल कर, बाज़ार में बेधड़क खपाई जा रही हैं. समझा जा रहा है इस सिलसिले में क़ानून भी कुछ ख़ास नहीं कर पा रहा है. ई-वेस्ट की ग़लत रीसाइकलिंग के खतरों का विज्ञापन भी बेअसर मालूम पड़ रहा है, वरना समस्या इस कदर चिंताजनक नहीं होती.दरअसल हमारे देश में ई-वेस्ट को लेकर कभी गंभीर कदम उठाये ही नहीं गए, न ही उन्हें ठिकाने लगाने के कोई कारगर कदम उपाय किए गए. लिहाज़ा जहाँ-तहाँ ई-वेस्ट का ऐसा मंज़र देखा जा सकता है कि जैसे ये कोई मुद्दा ही नहीं है.


चोर दरवाजों से आता है ?
========================


आंकड़े कहते हैं कि हर साल भारत में 3,50,000 टन इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट जमा हो जाता है और 50,000 टन गैर कानूनी ढंग से आयात होता है. उन्हें यहाँ तक लाने के चोर दरवाजे बड़ी कुशलता से खोज लिए गए हैं. मसलन उन्हें स्क्रैप, बिजली के दोयम दर्जे के सामान एवं अन्य चीजों के रूप में भारत पहुँचाया जाता है . इस ई-वेस्ट का 90 प्रतिशत हिस्सा रिसाइकिल कर दिया जाता है, लेकिन यह सब अनियोजित तरीक़े से करना भारी पड़ता है.भारत में हर साल लाखों टन ई वेस्ट एकत्र होता है जिनमें से कोई पंद्रह प्रतिशत भाग ही सही तरह से रिसाइकिल हो पाता है. कहने की आवश्कता नहीं है की शेष ई वेस्ट खतरनाक ढंग से हमारी ज़िन्दगी में पहुँचता है जिसे ढोकर जीना हमारी नियति बन चुका है.

आखिर क्या है ये ई वेस्ट ?
=======================

ई वेस्ट का साधारण अर्थ है खराब हो चुके बिजली या इलेक्ट्रानिक उपकरण जिसकी मरम्मत या दोबारा इस्तेमाल संभव न हो. इस श्रेणी में बेकार इलेक्ट्रिक वायर, पुराना रेडियो, ट्रांजिस्टर, फ्रिज, मोबाइल जैसी चीजें आती हैं. इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट अपनी सामान्य अवस्था में हानिकारक नहीं होता, जबकि इसे रिसाइकिल करने की प्रक्रिया में कई नुक़सान झेलने पड़ सकते हैं. किसी भी इलेक्ट्रिकल या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के अंदर कई तरह के तार, सर्किट, धातु , प्लास्टिक और अन्य तत्व होते हैं. अगर ई-वेस्ट का ग़लत तरीक़े से निपटारा किया जाए तो यह लोगों के स्वास्थ्य और वातावरण पर का़फी ग़लत असर करता है.


सही रिसाइक्लिंग जरूरी
====================

ई-वेस्ट को सही तरीक़े से रिसाइकिल करना एक बड़ी चुनौती है. लेकिन ई-वेस्ट से निपटाने का काम कबाड़ वालों के हाथ में है. इसके पीछे कारण भी स्पष्ट है. ई वेस्ट के सही रिसाइकिलिंग के लिए बड़ी पूंजी चाहिए और यह अनियोजित क्षेत्र के सीमित आर्थिक संसाधन वाले निर्माताओं और उत्पादकों के बस की बहार की बात है. यदि देश में लोगों को ई-वेस्ट के संग्रह और उसे निबटान के काम में लगाया जाए और बाद की प्रक्रिया औद्योगिक स्तर पर की जाये तो समस्या एक हद तक सुलझ सकती है.

ई वेस्ट का बढ़ता ग्राफ, लोगों के जीवन से खेलने का चिंताजनक उदाहरण है. अगर नई तकनीक अपनाकर छोटी लेकिन नियोजित ढंग से रीसाइकलिंग की जा सके तो भी बात बन सकती है. वातावरण को अशुद्द करके, लोगों को घुट-घुट कर जीने के लिए विवश करके इसी तरह

ई वेस्ट की गिरफ्त में समाज पिसता रहा तो आने वाला समय बड़ा विध्वंसक बन सकता है. निर्माता कंपनियों को भी चाहिए कि भी वे अपने प्रोडक्ट की प्रोसेसिंग का दायित्व स्वयं वहन करें. भारत में ई-वेस्ट रिसाइकिलिंग के सबसे बड़े अड्डे पीतमपुर, दिल्ली और मुरादाबाद हैं. इस सन्दर्भ में यह विचार भी मूर्त रूप होना चाहिए कि ई वेस्ट की वापसी के लिए निर्माता कम्पनियाँ तैयार रहें. नोएडा की तरह देश के अन्य शहरों में भी ई वेस्ट के रि प्रोसेसिंग के लिए अधिकारिक कम्पनियाँ खोली की जानी चाहिए, क्योंकि ई वेस्ट की मात्रा इतनी अधिक है कि उसे अधिक समय तक नज़रंदाज़ करना अपने हाथों अपनी कब्र खोदने के सामान है.

==============================================






















Saturday, August 4, 2012

कागज़ वाली नाव की, बचपन वाली याद




बिन सूरज की भोर में,बूंदों की बरसात




सावन-भादों दे रहे, बरखा की सौगात



कहीं टूटती झोपड़ी, कहीं बाढ़ का जोर


सावन-भादों मास का, अजब-गजब ये दौर




कागज़ वाली नाव की, बचपन वाली याद


जी भर के वह भीगना,कहाँ रही वो बात



भीगे तन की बात कुछ,भीगे मन की और


बादल बरसे भूलते, दोनों अपना ठौर





रुनझुन-रुनझुन गा रहीं, बूँदें अपना राग


कहीं मिलन की है खुशी, कहीं है दिल में आग



गरम पकौड़े चाय की, चुस्की का आनंद


खाना- पीना भी बना, बरखा में एक छंद



===============================












Friday, August 3, 2012

सचमुच विरल हैं सघन वन छत्तीसगढ़ के



डॉ.चन्द्रकुमार जैन
=============
राजनांदगांव. मो.9301054300


जाने-माने हिंदी कवि अज्ञेय जी ने लिखा है -

जब कभी मैं

जंगलों में अकेले घूमता हूँ


मुझे लगता है


जहाँ मैं पेड़ों को देखता हूँ


वहाँ पेड़ मुझे भी देखते हैं.


वनों के प्रति कविता जैसा ऐसा ही सुन्दर भाव, संस्कृति, संपदा और संभावना की भूमि छत्तीसगढ़ में सहज विद्यमान है. यहाँ वनों का जीवन से गहरा नाता सर्वविदित है. जिस प्रकार 'धान का कटोरा' संज्ञा, छत्तीसगढ़ की अलग पहचान निर्मित करती है, उसी प्रकार हमारा यह प्रदेश वन-संपदा और वन-वैभव के विशेषण का प्रतीक भी है. याद रखना चाहिए कि वनों से छत्तीसगढ़ की राष्ट्रीय महत्ता और आंचलिक अस्मिता भी जुड़ी है और पर्यावरण व पर्यटन के कई पहलू इससे पल्लवित-पोषित हो रहे हैं.

यदि देखें तो छत्तीसगढ़ की वन संपदा और वन्य जीवों की प्रभावी मौजूदगी, वनों की विविधता और उसकी सुन्दरता ने हमारे प्रदेश की छवि अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक पहुँचा दी है. यहाँ के सघन वन सचमुच विरल हैं. बाहर की दुनिया के अनेक कुप्रभावों से यदि छत्तीसगढ़ विशेष सन्दर्भों में सुरक्षित है तो उसके पीछे यहाँ के वनों का ही योगदान है. अटल, अगम हिमालय के सामान हमारे वन हमारे रक्षक भी हैं.

छत्तीसगढ़ का भौगिलिक स्वरूप, वनों की सघनता से आच्छादित है. इससे यहाँ की संस्कृति और लोक जीवन भी संरक्षित है. यदि यह कहा जाए की छत्तीसगढ़ की पुरातन गरिमा, यहाँ के वनों पर आश्रित है तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. राज्य के वनों से उसकी प्रगति का चोली दामन का सम्बन्ध है. वन यहाँ की आय के बड़े स्रोत हैं. वन-परिवेश और वन-धन को देखकर ही अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ, छत्तीसगढ़ को ऋण एवं अनुदान देने तत्पर रहती हैं. ऐसी संस्थाओं में विश्व बैंक भी शामिल है.

राज्य में वनों की महिमा और वानिकी के 150 वर्ष पूरे होने पर प्रारंभ किया गया हरियर छत्तीसगढ़ अभियान, नई इबारत लिख रहा है. प्रदेश को हरा-भरा बनाने का बीड़ा उठाया गया है, इससे नई आशाओं का नया सूर्य उदित होता दिख रहा है. हरियर छत्तीसगढ़ अभियान के तहत पूरे प्रदेश में लगभग 6 करोड़ 20 लाख पौधे रोपने का लक्ष्य रखा गया है. इसके लिए सभी विभागों को अलग-अलग लक्ष्य दिये गये. इसमें अकेले वन विभाग पूरे प्रदेश में सवा चार करोड़ वृक्षों का रोपण कराने के अभियान को गति दी और यह सिलसिला बाद के इन वर्षों में जारी है. यह प्रदेश में वन संपदा और उसकी विरासत से मिली प्रेरणा का ही प्रतिफल है कि प्रदेश को हरा भरा बनाने का क्रांतिकारी कदम उठाया गया है.

उल्लेखनीय है कि जैव-भौगोलिक विशिष्टता तथा जैव विविधता की दृष्टि से छत्तीसगढ़ एक अतुल्य राज्य है. यहाँ के वनों में अनगिन औषधीय महत्त्व के पौधे हैं जिनका बहुआयामी उपयोग आज तक शोध का विषय बना हुआ है. हर्बल छत्तीसगढ़ विशेषण हमारे प्रदेश के लिए नितांत उपयुक्त है. यह यहाँ के वनों की ही देन है. यहाँ 22  किस्म के विविध वन हैं. छत्तीसगढ़ का कुल क्षेत्रफल 1,35,194 वर्ग किलोमीटर है जिसके 59772.३८९ वर्ग कि. मी. क्षेत्र में वन हैं. स्पष्ट है कि प्रदेश का 44 .2 प्रतिशत भाग वनों की शोभा की कहानी कह रहा है.

यह हमारे प्रदेश का गौरव है कि वह भारत के वन क्षेत्र के लगभग 12 .26 प्रतिशत हिस्से पर अधिकार रखता है. परन्तु कोई संदेह नहीं कि अंधाधुंध विकास के सर्व व्यापी दौर में प्राकृतिक संसाधनों को जिस तरह नुकसान पंहुचा है उससे हमारा प्रदेश भी अछूता नहीं रहा. यही कारण है कि विगत कुछ वर्षों में यहाँ की वन संपदा प्रभावित हुई है, जिसे मूल वैभव के अनुरूप संजोने व संवारने के हर संभव प्रयत्न भी किए जा रहे हैं. यह बेशक एक उत्तरदायी कदम है. प्रदेश ने समझा है कि बेशुमार जैविक दबाव के कारण हमारे वनों का जीवन सिमट रहा है. 50  प्रतिशत वनों के सामने उनके विकृत होते रूपों को देखकर लगता है कि उनके अस्तित्व का संकट मुंह बाए खड़ा है. फिर भी, ये सुखद संकेत है कि एक तरफ उजाड़ हो रहे वनों की रक्षा के तो दूसरी ओर संरक्षित वनों को अधिक उन्नत बनाने के कार्यक्रम तेजी से चलाये जा रहे हैं.

कौन नहीं जानता कि छत्तीसगढ़ के वनों का वैभव, साल और सागौन जैसे मूल्यवान वृक्षों से सुसज्जित है. दीगर वृक्षों में बीजा. साजा, धरवा, महुआ, तेंदू, आंवला, कर्रा और बांस का भी अहम स्थान है. यहाँ के वनों को विधिक आधार पर तीन वर्गों में विभाजित किया गया है, जिनमें आरक्षित, संरक्षित-सीमांकित तथा संरक्षित असीमान्कित वन क्षेत्र सम्मिलित हैं. इन वन वृत्तों में जगदलपुर, दुर्ग, कांकेर, बिलासपुर, रायपुर, सरगुजा शामिल हैं. एक अन्य विभाजन के अनुसार प्रबंधन की दृष्टि से छत्तीसगढ़ के वनों को चार भागों में बाँटा गया है. ये हैं - सागौन, साल, बांस और विविध वन, इन वनों के घनत्व में भी विविधता है. बस्तर प्रदेश के सबसे अधिक घनत्व वाला वन क्षेत्र है. इसी तरह जशपुर, सरगुजा, रायगढ़, धमतरी जिलों को भी घने वन क्षेत्रों वाले जिले का दर्ज़ा प्राप्त है.

साल और सागौन छत्तीसगढ़ में जंगल के स्वर्ण के समान हैं. इसमें भी साल का प्रमुख स्थान है. यही कारण है की साल को हमारे यहाँ राज्य वृक्ष का दर्ज़ा मिला है. उधर सागौन के नैसर्गिक वन राजनांदगाँव, उत्तर रायपुर, भानुप्रतापपुर एवं नारायणपुर वन मंडलों में मिलते हैं. प्रदेश में मिश्रित वनों में साजा, बीजा, धावड़ा, हल्दू, अंजन, खम्हार, तेंदू, महुआ. हर्रा, बहेड़ा, आंवला, पलसा,, बाँस, सवाई आदि उपलब्ध हैं. इन वनों में ग्राउंड फ्लोरा के रूप में अनेक औषधीय प्रजातियाँ प्राप्त हैं. इस प्रकार, छत्तीसगढ़ विपुल जैव विविधता का क्षेत्र है.यहाँ उपलब्ध बाँस को लघु वनोपज की श्रेणी में रखा गया है. बाँस प्रदेश के लगभग सभी क्षेत्रों में पाया जाता है. बताया जाता है कि सिर्फ बस्तर में बाँस की अस्सी से अधिक प्रजातियाँ मिलती हैं.

छत्तीसगढ़ में वन प्राकृतिक संपदा के साथ साथ पर्यावरण और जीवनोपयोगी उत्पादों के कारण अमूल्य निधि भी हैं. हमारी जीवन ऊर्जा को संरक्षित रखने और प्रदेश की खुश्हाकी के नए-नए द्वार खोलने में यहाँ के वनों की बड़ी भूमिका है. इससे निकटवर्ती राज्यों का सम्बन्ध भी जुड़ा है. छतीसगढ़ की नदियों से जल ग्रहण की सुविधा के कारण ये वन राष्ट्रीय महत्त्व के बन पड़े हैं. वन संपदा के इस महत्त्व को ध्यान में रखकर ही में वन-नीति  बनाई गई. इस दृष्टि से हमारा प्रदेश, भारत का संभवतः पहला राज्य है जिसने वन प्रबंधन को एक नई दिशा देने की ठोस पहल की है. सभी स्टारों पर मूल्यांकन और अनुश्रवण के माध्यम से वनों की सुरक्षा तथा वन संपदा के विकास की कारगर पहल की गयी है. मानव संसाधन विकास और प्रसिक्षण में माध्यम से प्रदेश का वन विभाग वन वैभव की संवृद्धि का सराहनीय प्रयास कर रहा है. इसमें जन सहयोग की अधिक उम्मीद स्वाभाविक है. बिगड़े वनों का सुधार, बाँस वनों का उद्धार, पर्यावरण वानिकी, सड़क निर्माण, पौध प्रदाय योजना आदि इस दिशा उठाए गए अन्य अहम् कदम हैं.

वन संपदा के रूप में छत्तीसगढ़ में मुख्य उत्पाद काष्ठ और जलाऊ लकड़ी है. इनमें इमारती लकड़ी वाली प्रजातियाँ भी शामिल हैं. वनोपज अधिनियम के माध्यान से प्रदेश में काष्ठ के व्यापार का राष्ट्रेय्करण किया गया है. वन संपदा शिल्क कला के प्रोत्साहन., विप्नान और प्रदेश की विश्व स्तरीय पहचान निर्मित करने में भी महत्त्व पूर्ण है. यहाँ साल, सागौन. बीजा, साजा, शीशम और खैर आदि राष्ट्रीय प्रजातियाँ हैं. मुख्य वनोपज के साथ साथ लघु वनोपज उत्पादन और संग्रहण में भी प्रदेश पीछे नहीं है. बॉस, तेंदूपत्ता, गोंड आदि के संग्रहण और विप्नान में प्रदेश की वन नीति तथा लघु वनोपज संघ की संयुक्त सकारात्मक भूमिका है.उन्हें चरण पादुकाओं का वितरण किया गया. अनेक नए उपायों से समय समय पर प्रोत्साहन भी दिया जता है. समूह जीवन बीमा योजना भी लागू है. वन संपदा के संरक्षण हेतु महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ाई जा रही है. बिगड़े बाँस वनों के सुधार की दिशा में भी अभिनव प्रयास किये जा रहे हैं. ग्राम विकास कार्यक्रम, हरियाली प्रसार योजना, नदी तट वृक्षारोपण कार्यक्रम, पथ वृक्षारोपण, वन मार्गों पर रपटा अवं पुलिया निर्माण, बो डीजल के लिए रतनजोत रोपण जैसे अनेक कार्यक्रम प्रदेश की वन संपदा के महत्त्व और विकास की जरूरत के जीवंत साक्ष्य है.

हम सब छत्तीसगढ़ वासियों का यह पुनीत कर्तव्य है कि हम अपनी वन संपदा को नष्ट होने से बचाएं. उसके विकास के क़दमों के हमकदम बनें. माटी महतारी का ऋण चुकाने के लिए जल जमीन और वन की रक्षा का संकल्प लें और हर संभव सहयोग भी दें विश्वसनीय छत्तीसगढ़, सबके विश्वस्त सहयोग पर ही अपनी वास्तविक ऊंचाई प्राप्त कर सकेगा.

======================================








Tuesday, July 31, 2012

बड़ा फ़र्क है उम्र के बीतने और उम्र को जीतने में !


ज़िन्दगी सचमुच एक पहेली है. जब आप युवा होते हैं तब जो कुछ आप देखते हैं, उस पर यकीन भी करना सीख जाते हैं, किन्तु जब  बुढ़ापा  आता है, तब आप समझ पाते हैं कि पहले जो कुछ देखा और माना था, वह हवा में बने महल या पानी में खींची गयी लकीरों से अधिक और कुछ भी नहीं है. इसके अलावा एक दूसरा चित्र भी संभव है. वह यह कि युवावस्था से ही यदि बढ़ती उम्र के प्रति आप सजग रहें, तब महसूस होगा कि ज़िन्दगी हर मोड़ पर, हर परिवर्तन, हर चुनौती को उसके सही सन्दर्भ में जानने-समझने और देखने का अवसर सुलभ करवा रही है. आपके चेहरे पर आहिस्ता-आहिस्ता सलवटें तो उभरेंगी ज़रूर, परन्तु आपकी आत्मा की ताजगी हमेशा बनी रहेगी.

यहाँ फिर यह सवाल किया जा सकता है कि अगर जोश और जश्न की उम्र में, बढ़ती उम्र का ख्याल न रहा हो, तब ढलती उम्र के प्रहारों का सामना कैसे करें ? ठहरिये, इसका भी हल है कि आप मार्क ट्वेन के इन शब्दों को दिलोदिमाग में बिठा लें कि अगर आप चिंतित हैं कि आप बूढ़े हो गए हैं, केवल तब आप मुश्किल में पड़ेंगे, पर इसके विपरीत आप वृद्धावस्था के मानसिक भार से मुक्त रहते हैं तो उम्र की कोई भी ढलान आपमें थकान पैदा न कर सकेगी.

हमारे बहुतेरे बुज़ुर्ग, अक्सर अपने दौर, अपने ज़माने, बीते हुए दिन या बड़ी मशक्कत के बाद हासिल की गई किसी कामयाबी की कहानी सुनाते थकते नहीं हैं. उन्हें अक्सर अपने 'अनुभव' पर आत्म मुग्ध होकर ये कहते सुना जा सकता है कि  बेटे यह मत भूलो कि हमने धूप में केश सफ़ेद नहीं न किये हैं ! चलिए, मान भी लें कि बढ़ी उम्र के साथ अनुभव भी बढ़ता गया, जानकारी भी बढ़ती गई, भले-बुरे का भेद भी बेहतर समझ में आने लगा. पर क्या इससे यह निष्कर्ष निकाल लेना उचित होगा कि उम्र के साथ चीजों को देखने का नज़रिया भी बदल गया ? उम्र बढ़ी तो परिपक्वता भी बढ़ गयी ? या फिर कुछ ज़्यादा बरस जी लेने से ज़िन्दगी में कुछ ज्यादा खुशियाँ जुड़ गईं ? अगर इस प्रश्नों का उत्तर 'हाँ' है तो कुछ कहने की ज़रुरत ही नहीं है. परन्तु ज़वाब 'नहीं' मिले तो तय मानिये कि उम्र के तज़ुर्बे और तज़ुर्बे की उम्र के बीच अभी बड़ा फासला है।

दरअसल हम बढ़ती उम्र को सम्मान का अनिवार्य अधिकार मान बैठे हैं. जब वह सम्मान न मिले तो शिकायत का सिलसिला शुरू होते देर नहीं लगती कि क्या करें आज की पीढ़ी तो कुछ सुनने या समझने को तैयार ही नहीं है, बुजुर्गों की किसी को कोई परवाह नहीं रह गई, सब अपने में मशगूल हैं वगैरह...वगैरह. परन्तु कभी ये भी तो सोचा जाए कि अब तक क्या जिया, समाज से कितना लिया और  उसे कितना वापस लौटाया ? कितने मित्र बनाए, कितने अपनों को खो दिया ?, कितनी ज़िंदगियों में मुस्कान बिखेरी, कितनों की हँसी छीन ली ? ये कुछ बातें हैं जो दर्पण में अपना अक्स ईमानदारी से देखने आहूत करती हैं कि आप उम्र बीतने और उम्र को जीतने के बीच अंतर की पड़ताल कर सकें संभव है कि समय से उभरे चोट के ऐसे निशान अब भी बाकी हों जो आपको बीती हुई बात को भुला देने से रोकते हों, आपके भीतर एक कभी ख़त्म न होने वाली दर्द भरी दास्तान, आपको हमेशा बेचैन बनाए रखती हो,फिर भी अब्राहम लिंकन के ये शब्द याद रखने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि बुढ़ापे में ये न देखा जाए कि जीवन में कितने बरस जुड़े, बल्कि देखना तो यह चाहिए कि आपने स्वयं उसमें कितने वर्ष जोड़े। यह भी कि उम्र के हर दौर में आपकी ज़िन्दगी आपके चेहरे से बयां हो जाती है. उस पर नाज़ करें न कि उसे झुठलाने की जुगत में आप सिर्फ दूसरों पर नाराज़ होते रहें।

एक और दृष्टिकोण यह भी तो हो सकता है कि आप उम्र खो देने के अफ़सोस से उबरने की हर संभव कोशिश करें और खुशियों के इंतज़ार को नई आरज़ू के उपहार में बदल कर दिखा दें. ऐसे लोग भी हुए हैं जो उम्र जैसी किसी तहकीकात को कभी पसंद नहीं करते. जैसे कि एलिजाबेथ आर्डन के ये शब्द कि "मुझे उम्र में कोई दिलचस्पी नहीं है. जो लोग मुझे अपनी उम्र बताते हैं उनकी नादानी पर मुझे तरस आता है. वास्तव में आप उतने ही बूढ़े हैं, जितने आप खुद को मान बैठे हैं ।"

कुछ बातें हैं जिन्हें बढ़ती उम्र के खाते से बाहर कर देना आसान नहीं है। उदाहरण के लिए शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिवर्तन के कारण आप अकेलापन अनुभव करते हों. परिवार का साथ छूट जाने या सहयोग न मिलने या फिर अपनी ही विरासत से हाथ धो बैठने की टीस आपके भीतर हमेशा के लिए घर कर गई हो. पर यदि गहराई में जाएँ तो लगेगा कि जो चीजें आपके हाथ में नहीं हैं, जिन्हें आप न तो बदल सकते हैं, न ही वापस हासिल कर सकते हैं, उनके लिए मन भारी रखना, हर पल 'काश !.... काश !! ऐसा होता' जैसे ख्यालों में डूबे रहना, कोई हल तो नहीं है.

अब वो दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या ये मुमकिन है आप कि आप उसमें अपनी मर्जी के रंग भर सकेंगे ? नहीं न ? तो क्या ये अधिक अच्छा नहीं होगा कि आप हताशा से बचें, बची हुई साँसों को जियें। अपनी सेहत को, उम्र के शेष वर्षों को पूरे धीरज के साथ किसी की अमानत मानकर सहेजकर रखें ?

माना कि उम्र की एक ख़ास दहलीज़ पर समाज में सक्रिय सहभागिता न होने या मानसिक रूप से बदलती परिस्थितियों से ताल-मेल न बिठा पाने के कारण या फिर काम-काज की ज़िन्दगी पर विराम लग जाने की वज़ह से या फिर अपनों के बेगाने-से व्यवहार या उनकी रोजमर्रे की दुत्कार के चलते आप नकारात्मक भावों से ग्रस्त हों, लेकिन यह भी याद रखना अच्छा होगा कि पूरी दुनिया भी अगर ठुकरा दे या दुश्मन बन जाए तब भी यही उम्र परमात्मा से मित्रता करने का, एकाकीपन को भरने का स्वर्णिम काल होता है. यह आपकी आस्था और नज़रिए पर निर्भर है कि आप दुष्कर को सुखकर बना लें. बुढ़ापे को जीना भी एक बड़ी रणनीति की अपेक्षा करता है।

एक समय था कि बच्चे जीवन भर बड़ों के साथ रहते थे. अब वह धारा बदल चुकी है. पहले तीन पीढ़ियाँ एक छत के नीचे रहती थीं. अब 'न्यूक्लियर फेमिली' का ज़माना है. पति-पत्नी दोनों काम पर जा रहे हैं. बच्चे स्कूल में पढ़ते और रहते भी हैं. बड़े-बुजुर्ग, घर पर केवल इंतज़ार में दिन काट रहे हों तो आश्चर्य क्या है ? पहले जीवन धान और धर्म का था, हम और हमारा की भावना सर्वोपरि थी. अब मैं और मेरा का बोलबाला है. समझने की बात ये है कि ऐसे हालात के बीच या इससे अलग और भी परिस्थियाँ हो सकती हैं आप महसूस कर रहे हों कि "तमाम उम्र मैं एक अजनबी के घर में रहा, सफ़र न होते हुए भी किसी सफ़र में रहा"... फिर भी सफ़र तो जारी रहेगा ही. ये सफ़र भी सुहाना हो सकता है...बशर्ते कि आप मानें बुढापा कोई बीमारी नहीं बल्कि एक नया अवसर है।

अंत में बस इतना ही कि -


किसी की चार दिन की ज़िन्दगी में सौ काम होते हैं,

किसी का सौ बरस का जीना भी बेकार होता है।

किसी के एक आँसू पर हजारों दिल तड़पते हैं,

किसी का उम्र भर का रोना भी बेकार होता है।।

=============================================






Sunday, July 29, 2012

संबंधों की जड़ता का यथार्थ चित्र है 'कफ़न'




उपन्यास सम्राट के नाम से सुप्रसिद्ध मुंशी प्रेमचन्द उर्दू का संस्कार लेकर हिन्दी में आए और हिन्दी के महान लेखक बने। उन्होंने हिन्दी को अपना खास मुहावरा और खुलापन दिया। कथा लेखन के क्षेत्र में उन्होंने युगान्तरकारी परिवर्तन किए। आम आदमी को उन्होंने अपनी रचनाओं का विषय बनाया और दमन, शोषण और भ्रष्ट चेहरों की गिरफ्त में पिसती उनकी ज़िन्दगी की समस्याओं पर खुलकर कलम चलाते हुए उन्हें समाज के सही नायकों के पद पर आसीन किया।


प्रेमचंद ने साहित्य को कल्पना लोक से सच्चाई के धरातल पर उतारा। वे साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जमींदारी, कर्जखोरी, गरीबी, उपनिवेशवाद, पूंजीवाद, सामाजिक विषमता और संवेदना के तिरोभाव  पर आजीवन लिखते रहे। वे आम भारतीय के रचनाकार थे।

 प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक हैं। उन्होंने हिन्दी कहानी में समाज को खोखला करने वाले भ्रष्ट और दोहरे चरित्रों का खुलासा करते हुए ज़मीनी सच्चाई को स्वर देने की एक नई परम्परा शुरू की। आज भी प्रेमचंद के ज़िक्र के बगैर हिन्दी भाषा और  साहित्य की विरासत या भारत के भविष्य का कोई भी विमर्श यदि अधूरा माना जाता है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

प्रेमचंद ने लगभग तीन सौ कहानियां लिखकर राष्ट्र भारती के कोष को समृद्ध किया है। उनकी कहानियों में जगह-जगह पर वंचितों के लिए संवेदना और सोये हुए लोगों के लिए झकझोर कर जगा देने वाली भाषा का रूप सहज देखा जा सकता  है। भाषा को संवेदना और संवेदना को भाषा बना देने वाली कला का अनोखा उदाहरण है मुंशी प्रेमचंद की विश्व प्रसिद्द कहानी कफ़न। हिन्दी में इसे प्रगतिशीलता और नई कहानी की ज़मीन पर बार-बार देखने और समझने-समझाने का दौर चला, वह आज भी निरंतर है।

कफ़न में कहानीकार ने तीन दृश्य उपस्थित किये हैं। पहले में घीसू और माधव के आलू खाकर अजगर की तरह पड़  जाने और बुधिया के प्रसव पीड़ा से कराहते रहने का है। दूसरे  में बुधिया की मृत्यु और बाप-बेटे द्वारा कफ़न के लिए पैसे माँग  लाने का है। तीसरा दृश्य कफ़न खरीदते हुए 'दैव कृपा'  से मधुशाला में पहुँचने और नशे में मदमस्त होकर डूब जाने का है।

कहानी के पहले और तीसरे दृश्य में विरोधी रंगों का प्रयोग कर कहानीकार ने जिस तल्ख़ अंदाज़ में व्यंग्य का सहारा लेकर समाज की विसंगत और दोमुंही व्यवस्था का रेशा-रेशा उदघाटन किया है, उससे कफ़न कहानी को बेजोड़ होने का दर्ज़ा स्वाभाविक रूप से मिल गया है।

पहले दृश्य में लेखक ने ठाकुर की बारात का स्मृति-दृश्य उपस्थित  किया है। जीवन की एक मात्र लालसा वह भोजन ही है, किन्तु वास्तविक धरातल पर पिता-पुत्र में चोरी के भुने हुए आलुओं पर टूट पड़ने की प्रतिस्पर्धा है। भूख को बेसब्र कर देने वाला वातावरण स्वादिष्ट भोजन के सौभाग्य की लालसा को चरम तक पहुंचा देता है। यही कारण है कि कहानी के अंत में घीसू और माधव मधुशाला पहुंचकर अपने 'अनपेक्षित सौभाग्य' पर खूब खुश होते हैं और बुधिया की तरफ संकेत कर कहते हैं कि  मरते-मरते हमारी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई। इस तरह कफ़न कहानी का पहला दृश्य ही कहानी के अंत की आधार  बन जाता है।

विडंबना देखिये कि बाप-बेटे दोनों अपनी ही बहू या पत्नी के मानवीय संबंधों को ताक़  पर रखकर ज़बान जल जाने की परवाह न करते हुए भुने हुए आलू खाने की स्पर्धा में जुटे हैं। यहाँ ठाकुर की बारात  के व्यंजनों की तुलना में घीसू और माधव की भूख को मापा जा सकता है।भूख और पचास पूरी के बीच अंतर समाज की वषमता का ही एक रूप है। इस अंतर को दोनों जैसे एक ही दिन में मिटा देने के लिए टूट पड़ते हैं।

घीसू के लिए ठाकुर का भोज परम मुक्ति का मार्ग है। माधव उसकी प्रत्याशा में बेचैन है। यहाँ मानवीय रिश्ते जड़ हो जाते हैं। आलू खाकर पिता-पुत्र पानी पीते हैं और पाँव पेट में डालकर सो जाते हैं।
उधर बुधिया कराह रही है। पर दोनों बेखर जैसे हैं। भूख के आगे उनकी चेतना जड़ हो गई है। कहानी के आरम्भ में मुंशी जी ने जिस बुझे हुए अलाव का उल्लेख किया है, वह वास्तव में मानवीय संबंधों के बुझते जाने का प्रतीक है .

कहानी के प्रारम्भ में  पाठक का आक्रोश  घीसू और माधव की बेदर्दी पर हो सकता है, पर लेखक की दूरदृष्टि इस आक्रोश को सामाजिक व्यवस्था की कमजोरियों  की तरफ स्थानांतरित कर देती है। घीसू ने भली भांति  जान लिया है की जब सब कुछ झोंक देने का परिणाम भी कुछ नहीं है तो इतनी मेहनत  करने का क्या फायदा ? कहानी के दूसरे  दृश्य में चरित्र के दुहरे रंगों को उजागर किया गया है। घीसू और माधव को संवेदना का मुखौटा पहनाकर कहानीकार ने गहरा व्यंग्य किया है। जीवन भर यह दिल कठोर बना रहता है किन्तु मृत्यु के समय औपचारिक संवेदना व्यक्त कर कर्तव्यों की इति  श्री समझ लेते हैं।

तीसरे दृश्य में बाप-बेटे कफ़न खरीदने बाज़ार जाते हैं। कफ़न पसंद नहीं आता और शाम ढल जाती है। दोनों समाज की व्यवस्था को जली-कटी सुनाते हुए दैवी  प्रेरणा  से मधुशाला पहुँच जाते हैं। उधर लोग बुधिया की मिट्टी को उठाने के लिए बांस-वांस की तैयारी करते हैं और उनके निकटतम जो लोग हैं वे इस वक्त शान से पूरियों पर टूटे हुए हैं। यद्यपि इस हालात में भी उन्हें लोक निंदा का ख़याल आता है पर दोनों दार्शनिकों वाले अंदाज़ में अपने मन को समझा लेते हैं। इस तरह चेतना का अलाव पूरी तरह बुझ जाता है। दोनों गाते हैं, नाचते हैं और मदमस्त होकर गिर पड़ते हैं और मानवीय संबंधों की जड़ता को सामाजिक यथार्थ के स्तर  पर उद्घाटित करने वाली इस कहानी का अंत हो जाता है। व्यवस्था की विषम चट्टान पर मानवीय चेतना खुद पथरा जाती है।

कहानी के अंत में यद्यपि  लगता है कि कोई समाधान नहीं मिलता किन्तु प्रेमचंद जी जैसे कथा लेखक समाधान से अधिक सवाल छोड़ जाने में यकीन करते थे शायद, यही कारण है कि  वे और उनके सवाल आज भी प्रासंगिक हैं. कफ़न... कहानी की शक्ति का परिचायक तो बना ही, वह भविष्य की कहानी का संकेत भी बन गया।

=======================================


ज़िन्दगी की मांग बस इतनी !


============================

बहुत विचित्र है मानव मन. कभी यह मन अपने अदृश्य पंखों से हिमालय की ऊँचाइयों तक पहुँचना चाहता है, कभी उन्हीं पंखों को समेटकर सागर की गहराइयाँ नापना चाहता है. कभी धूमिल अतीत  को याद करता है, तो कभी स्वप्निल भविष्य में खो जाता है हमारा मन.सिर्फ़ वर्तमान को छोड़कर काल के सभी खण्डों में भटकने का आदी हो जाता है मानव मन.

परन्तु, जीवन इतना भोला भी नहीं है की मन की यायावरी के खाते में,मनचाही सारी चीज़ें डाल दे. न ही जीवन इतना क्रूर है कि जो मन आज की सच्चाई को जिए, हक़ीकत के रूबरू हो उसे बरबस बिसार दे. इसलिए स्मरण रखना होगा कि जीवन का एक ही अर्थ है वह जो है आज और अभी. कहीं और नहीं, बस यहीं.

आप इस क्षण में जहाँ हैं, वहाँ जो हैं, जैसे भी हैं, जीवन की संभावना जीवित है. जीवन. वर्तमान का दूसरा नाम है. गहराई में पहुँचकर देखें तो मन के हटते ही जीवन का सूर्य चमक उठता है. इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि मन को लेकर मन भर बोझ लिए चलने वाले के हाथों ज़िन्दगी के संगीत का सितार कभी झंकृत नहीं हो सकता.

जहाँ जीवन है वहाँ यह चंचल मन पल भर भी ठहर नहीं सकता. आप जो घट चुका है,उसमें कण भर भी न तो कुछ घटा सकते हैं और न ही उसमें रत्ती भर कुछ जोड़ना संभव है. दरअसल जो घट चुका वह अब है ही नहीं. और जो अभी घटा ही नहीं है वह भी आपकी पहुँच से बाहर है. फिर वह क्या है जिसे कहीं और खोजने की कोई ज़रुरत नहीं है ?

ज़ाहिर है कि है तो केवल वही जो अभी है, यहीं है. इस क्षण है. वह जो न तो घटा है और न घटेगा बल्कि वह जो घट रहा है. यहाँ अगर थोड़ी सी भी चूक हुई कि आप भटक जायेंगे. क्योंकि हाथों में आया एक पल, पलक झपकते ही फिसल जाता है. वह क्षण जो आपको अनंत के द्वार तक ले जाने की शक्ति रखता है. आपकी ज़रा सी चूक या भूल हुई कि वही क्षण सिमटकर विगत बन जाएगा. फिर वह आपके चेतन का नहीं,, मन का हिस्सा बन जाएगा. मीरा ने यदि कहा है कि 'प्रेम गली अति सांकरी' और जीसस ने भी पुकारा है कि समझो 'द्वार बहुत संकरा है' तो उसके पीछे शास्वत की लय है. अनंत का स्वर है.

जीवन का जो क्षण हाथ में है उसमें जी लेने का सीधा अर्थ है भटकाव की समाप्ति. वहाँ न अतीत का दुःख-द्वंद्व है, न भविष्य की चिंता. यही वह बिंदु है जहाँ आप विचलित हुए कि जीवन आपसे दूर जाने तैयार रहता है. हाथ में आए जीवन के किसी भी क्षण की उपेक्षा, क्षण-क्षण की गयी शास्वत की उपेक्षा है. यह भी याद रखना होगा कि क्षण को नज़रंदाज़ करने पर वही मिल सकता है जो क्षणभंगुर है. वहाँ अनंत या शांत चित्त का आलोक ठहर नहीं सकता.

शायद वर्तमान छोटा होने कारण भी आपके समीप अधिक टिक न पाता हो. क्योंकि बीता हुआ समय बहुत लंबा है और जो आने वाला है उसकी भी सीमा तय करना आसान नहीं है. इसलिए, मन उसके पक्ष में चला जाता है जिसमें ऊपर का विस्तार हो. वह अतीत में जीता है या भविष्य में खो जाता है. सोचता है मन कि अभी तो बरसों जीना है. आज और अभी ऐसी क्या जल्दी है कि बेबस और बेचैन रहा जाए ?

पर भूलना नहीं चाहिए कि अपने वर्तमान को भुलाकर कुछ भी हासिल किया जा सके यह मुमकिन नहीं है. द्वार तक पहुँचकर स्वयं द्वार बंद कर देना समझदारी तो नहीं है न ? अतीत की अति से बचने और भविष्य को भ्रान्ति से बचाने का एक ही उपाय है कि अपने आज का निर्माण किया जाए. जिसने यह कर लिया समझिये वह मन के भरोसे जीने की जगह पर मन को जीतने में सफल हो गया. प्रकृति अभी है, यहीं है. जाने या आने वाले की फ़िक्र नहीं, जो है उसका ज़िक्र ही ज़िन्दगी है... ज़िन्दगी जिसकी मांग बस इतनी है कि आप हर क्षण को सिर आँखों पर बिठाएँ, जीवन का क़र्ज़ चुकाएँ.

=================================================