Friday, April 1, 2011

नया मुक्तक.


हर रात के पीछे प्रभात ढूंढता हूँ मैं,

गर्द के भी नीचे जवाहरात ढूंढता हूँ मैं।

ढूंढने की आदत से इस तरह मजबूर हूँ,

बेबात में भी अक़्सर कोई बात ढूंढता हूँ मैं

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Saturday, March 26, 2011

मुझे कुछ नहीं आता...


तुमने ठीक ही कहा

कि मुझे कुछ नहीं आता


आखिर आता ही क्या है मुझे?

मैं नहीं कर सकता झूठा वादा

नहीं दे सकता किसी को धोखा

झूठ नहीं बोल सकता

जल्दी ऊंचाइयां छूने की चाह में

तिलांजलि नहीं दे सकता

अपने संस्कारों को

आगे बढ़ने की होड़ में

नहीं छोड़ सकता अपनों को


इसीलिए मुझे कुछ नहीं आता

तुमने ठीक ही कहा

सरवाइव नहीं कर सकता

इस शहर में...

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गुरू सरन लाल की रचना साभार प्रस्तुत.

Thursday, March 17, 2011

सुर्ख़ हथेलियाँ


पहली बार
मैंने देखा
भौंरे को कमल में
बदलते हुए,
फिर कमल को बदलते
नीले जल में,
फिर नीले जल को
असंख्य श्वेत पक्षियों में,
फिर श्वेत पक्षियों को बदलते
सुर्ख़ आकाश में,
फिर आकाश को बदलते
तुम्हारी हथेलियों में,
और मेरी आँखें बंद करते
इस तरह आँसुओं को
स्वप्न बनते
पहली बार मैंने देखा।
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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की कविता साभार प्रस्तुत

Saturday, March 12, 2011

अगले जनम में...!


अगले जनम में
तुम बन जाना ख़ुशी
मैं बनूंगा दुःख
तब हरेक होंठ पर
लाल फूल सा खिल जाना तुम
मैं भी बहूंगा
हरेह आँख से
झरने सा

अगले जनम में
तुम बन जाना मिसरी
मैं बनूंगा नमक
तब तुम घुलकर मीठा करना
दूध का जीवन
मैं भी करता रहूँगा दाल को खारा

अगले जनम में
तुम बन जाना समुद्र
मैं बनूंगा चाँद
तब तुम अपने बालक ज्वार को
तट पर गोद लिए आना
मैं भी टहलाने लाऊंगा
अपनी बिटिया चांदनी को

अगले जमन में
तुम बन जाना कागज़
मैं बनूंगा कलम
तब तुम धरती सा उपजाऊ बन जाना
मैं भी हल की तरह चलूंगा
तब ज़रूर लहलहायेगी कविता की फसल।
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रंजीत भट्टाचार्य की रचना साभार प्रस्तुत.


Thursday, January 20, 2011

थोड़ा सा; अशोक वाजपेयी


अगर बच सका तो
वही बचेगा हम सबमें
थोड़ा-सा आदमी –
जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता,
अपने बच्चे के नम्बर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,
जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर
सबसे पहले अस्पताल पहुँचाने का जतन करता है,
जो अपने सामने हुई वारदात की गवाही देने से नहीं हिचकिचाता –
वही थोड़ा-सा आदमी –
जो धोखा खाता है पर प्रेम करने से नहीं चूकता,
जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिए
दूसरे बच्चों को थिगड़े पहनने पर मजबूर नहीं करता,
जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,
जो अपनी चुपड़ी खाते हुए दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है,
वही थोड़ा-सा आदमी –
जो बूढ़ों के पास बैठने से नहीं ऊबता
जो अपने घर को चीज़ों का गोदाम होने से बचाता है,
जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है
और दुनिया को नरक बना देने के लिए दूसरों को ही नहीं कोसता.
वही थोड़ा-सा आदमी जिसे ख़बर है कि
वृक्ष अपनी पत्तियों से गाता है अहरह एक हरा गान,
आकाश लिखता है नक्षत्रों की झिलमिल में एक दीप्त वाक्य,
पक्षी आँगन में बिखेर जाते हैं एक अज्ञात व्याकरण
वही थोड़ा-सा आदमी –
अगर बच सका तो वही बचेगा।
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सादर, साभार प्रस्तुत.

Wednesday, December 29, 2010

होना चाहता हूँ मैं बीज...!


बीज से सीखा है मैंने.
सीखा है मैंने
उर्वर-धरती की कोख में
ख़मोशी से
उतर जाना
घुल-मिल जाना
इसकी प्यारी मिट्टी से.
अँखुआना
चुप्पी तोड़ना
और ज़मीं फाड़कर बाहर आना
बीज से ही सीखा है
लहलहाना
कैद परतों से
बाहर आना
धरती की खुली सतह पर
मुस्तैद खड़ी उस फसल के मानिंद
इसलिए -
होना चाहता हूँ मैं बीज...
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श्री रामेश्वर की कविता साभार प्रस्तुत.

Thursday, December 23, 2010

कविता ; क्षणांश भी....!


पत्थर मारने पर भी
फूल देते हैं वृक्ष
नुकीले हल से
वक्ष को छलनी करने पर भी
फसल देती है धरती
तिल-तिल जलकर भी
खाना पकाती है आग
धुआँ घोलने पर भी
प्राण वायु देती है हवा
सूरज लोहे जैसा लाल तपकर भी
देता है रोशनी
यह सब नहीं सोचता
शांत मन से मनुष्य
वरना उसे इंसान बनने में
नहीं लगता क्षणांश भी !
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श्री विजय राठौर की कविता साभार प्रस्तुत.