Tuesday, April 15, 2008

सच्चा संत.


संत किसी अंत से नहीं डरता
कठिनाइयाँ उसकी पगडंडियाँ हैं
कष्ट उसे पथ सुझाते हैं
वन-उपवन का सौन्दर्य
उसे रिझाता नहीं
स्वर्ग का सुख-वैभव भी
उसे भाता नहीं
संत तो हिमगिरि के
गर्भ से उत्पन्न होकर
सिंधु-पथ गामी बनने में ही
जीवन की सार्थकता मानता है
सिंधु के समान हो जाना ठानता है
जो जनता है कि
आत्मा की विभूति अनंत है
वही सच्चे अर्थों में संत है !

3 comments:

अतुल said...

सही बात.

राज भाटिय़ा said...

चन्द्रकुमार जी आप ने बहुत अच्छी व्याखा की हे सचे संत की,ओर पुरी कविता ही सतं मय हो गई हे किस लाईन की तारीफ़ करु किसे छोडु, मुझे तो सारी लाईने ही भाई हे,धन्यवाद इस सुन्दर कविता के लिये.

नीरज गोस्वामी said...

जैन साहेब
बहुत सुंदर लिखा है आप ने. मेरी संत की परिभाषा भी आप ने पढी होगी:
संत है वो की जो रहा करता
भीड़ के संग भीड़ से कटके
नीरज