Friday, June 27, 2008

क़द...!


अपने क़द को

ध्यान में रखकर

उसने खड़ी कीं

ऊँची दीवारें

और बनाया

एक आलीशान महल

अब देखिए

महल ऊँचा हो गया

और उसका क़द....!

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17 comments:

Meg said...

Todo mundo remando na piroca havaiana!

berto xxx said...

yeah! thats awsome!! i like it!


berto xxx

Luna said...

Olha o quibe!!!

रंजू ranju said...

सुंदर .

मीत said...

बहुत बढ़िया.

Advocate Rashmi saurana said...

bhut khub.sundar rachana ke liye badhai.

mehek said...

bahut khub

DR.ANURAG said...

kya bat kahi....

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत बढ़िया...

अशोक पाण्डेय said...

छोटी लेकिन बेधक कविता।
लोग दीवारों को उंचा करते वक्‍त यह ध्‍यान नहीं रखते कि ईश्‍वर ने उनके कद की उंचाई कितनी तय कर रखी है।

महेन said...

काफ़ी कुछ कहने का मन कर रहा है थोड़ी सी पंक्तियां पढ़कर। आपने खूब शब्दों की कंजूसी करके भी सबकुछ कह दिया।
शुभम।

Lavanyam - Antarman said...

बडी बात कह दी आपने ..

डा० अमर कुमार said...

मनन करने को बाध्य करती रचना

Udan Tashtari said...

बहुत गहरी रचना!! साधुवाद.

Rajesh Roshan said...

गहरी रचना....

seema gupta said...

kmal ka likha hai

Regards

Dr. Chandra Kumar Jain said...

शुक्रिया....शुक्रिया.....शुक्रिया
आप सब का बहुत...बहुत...शुक्रिया.
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डा.चन्द्रकुमार जैन