Wednesday, August 20, 2008

जाने कितने मीत होंगे...!

तुम जलो तो साथ रोशन
जाने कितने दीप होंगे
तुम चलो तो हमक़दम बन
जाने कितने मीत होंगे
आदमी को आदमी की
नज़र से बस देखना
जो मिलेंगे सच कहूँ मैं
वो बड़े विनीत होंगे
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10 comments:

अशोक पाण्डेय said...

कविता में आप ने बहुत अच्‍छा संदेश दिया है, आभार। आदमी को बस आदमी की नजर से देखा जाए तो फिर दुनिया में कोई समस्‍या ही नहीं रहेगी।

सतीश सक्सेना said...

ईश्वर आपकी आशा पुरी करें ! शुभकामनायें !

Udan Tashtari said...

क्या बात है!

pallavi trivedi said...

waah...bahut badhiya.

राज भाटिय़ा said...

आप की कविता साकार हो जाये, हम सब जाग जाये,धन्यवाद

Ila's world, in and out said...

बहुत दिनों बाद आपके चिट्ठे पर आयी हूं,सारी कवितायें पढ कर बहुत अच्छा लगा.आपकी सेन्सिटिविटी और रचनात्मकता दोनों ही प्रणाम की हकदार हैं.सादर प्रणाम.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

आदमी को आदमी की
नज़र से बस देखना

बहुत बढ़िया लिखा है आपने

Anil Pusadkar said...

bahut sunder bhav aur chitra-sanyojan bhi.badhai.kabhi raipua aayen to miliyega achha lagega

शोभा said...

बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई

Dr. Chandra Kumar Jain said...

आप सब का आभार
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अनिल भाई,
आज ही रायपुर गया था.
मावलीप्रसाद साहित्य पीठ में
व्याख्यान देने.स्पेक्ट्रम में था आयोजन.
फिर कभी आया तो ज़रूर मिलूंगा आपसे.
मुझे भी खुशी होगी.
आपका
डा.चन्द्रकुमार जैन