Tuesday, September 9, 2008

इति...हास !..एक शब्द-चित्र !!

इतिहास में जब हो
हास और उपहास की इति
तब होता है
विश्वास का अथ
कहानी अतीत की
स्मरण की रीत की
सत्य के नवनीत की
हार और जीत की
भर देती है झोली
नव-ज्ञान की
खिल उठते हैं
प्रसून अंतर्मन के
इसीलिये इतिहास-सूत्र हैं
हितकारी जन-जन के
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10 comments:

रंजन said...

अच्छी व्यख्या की आपने इतिहास की

रंजन मोहनोत
aadityaranjan.blogspot.com

श्रीकांत पाराशर said...

jaandar.

Anil Pusadkar said...

achhi vyakhya hai.

संगीता पुरी said...

बहुत अच्छी परिभाषा इतिहास की

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

itihas ke sandarbh me achchi paribhasha. thanks

रंजना said...

lajawaab vyakhya hai.bahu sundar.

शोभा said...

बहुत सुंदर लिखा है. बधाई

Udan Tashtari said...

अच्छी व्यख्या-बहुत सुंदर!!


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आपके आत्मिक स्नेह और सतत हौसला अफजाई से लिए बहुत आभार.

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही अच्छा धन्यवाद

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बहुत-बहुत शुक्रिया
आप सब का.
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