Wednesday, September 17, 2008

ज़िंदगी है काग़जों के घर-सी...!

उठ रही है आस्था की अर्थी
वो मना रहे हैं आज बरसी

पुल बना दिया गया नदी पर
बूँद के लिए नदी है तरसी

नीर भरी कल्पना-बदरिया
विवश हुई 'औ' जहाँ भी बरसी

उग गए वादों के चंद पौधे
चाह लगी धरती की पर-सी

जंगलों में थीं मिलीं जो किरणें
छुप गईं देखो कहीं लहर-सी

गज़ब है ये दौर देखिए तो
ज़िंदगी है काग़जों के घर-सी
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8 comments:

Anil Pusadkar said...

क्या बात कही डाक्साब

श्रीकांत पाराशर said...

Jee karta hai ki aapki kalam chum loon. Dr saheb bahut badhia likhte hain aap.Aapki har post padhta hun main.

Advocate Rashmi saurana said...

नीर भरी कल्पना-बदरिया
विवश हुई 'औ' जहाँ भी बरसी
bhut sundar jari rhe.

Udan Tashtari said...

गज़ब है ये दौर देखिए तो
ज़िंदगी है काग़जों के घर-सी


-बहुत उम्दा!!

pallavi trivedi said...

उग गए वादों के चंद पौधे
चाह लगी धरती की पर-सी
bahut behtareen....

अभिषेक ओझा said...

सही बात है !

Dr. Chandra Kumar Jain said...

शुक्रिया सम्मान्य मित्रों
आप सब का.
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चन्द्रकुमार

makrand said...

गज़ब है ये दौर देखिए तो
ज़िंदगी है काग़जों के घर-सी
bahut khub