Saturday, April 4, 2009

औरत की पीठ.

औरत की पीठ

उसका इतिहास है

उस पर ज़ुल्म का असर

वहाँ देखो

अपने सीने को अगर

उसने छिपा रखा हो
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श्री रघुवीर सहाय की कविता साभार.

9 comments:

Udan Tashtari said...

अद्भुत!!

Rachna Singh said...

bahut hi sateek aur adhbhut

Mired Mirage said...

देखना ही यदि चाहते तो शायद देखने लायक निशान पीठ या मन पर अंकित न होते। यहाँ तो ऐसे अंधे हैं जो केवल अपने मन का देखते, सुनते, महसूस करते हैं।

आज के वातावरण में ऐसी कविताओं की बहुत आवश्यकता है। एक भी सोया जाग जाए तो भी बहुत होगा।

घुघूती बासूती

"अर्श" said...

behad adbhut.......

मीत said...

आभार !!

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर.
धन्यवाद

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee said...

सूत्र कविता। प्रभावी व सहज।

अजित वडनेरकर said...

वाह..
आभार डाक्टसाब...

श्यामल सुमन said...

छोटी किन्तु गम्भीर रचना। कहते हैं कि-

इतिहास निकलता है मेरी ही कलम से।
कागज की कमी होगी तो चेहरे पे लिख देंगे।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com