Thursday, March 25, 2010

झूठे का मुँह काला नहीं देखा !

कहावत है, ज़बां पर सत्य की ताला नहीं देखा
मगर हर शख्स तो सच बोलने वाला नहीं देखा
अगर जागी तलब तो आँख से पी ली, मगर हमने
कभी सागर नहीं ढूँढा, कभी प्याला नहीं देखा
पहुँचना था जिन्हें मंज़िल पे वो कैसे भी जा पहुँचे
डगर की मुश्किलें या पाँव का छाला नहीं देखा
मुहब्बत सिर्फ एक एहसास से बढ़कर बहुत कुछ है
वफ़ा की आँख में हमने कभी जाला नहीं देखा
तुम्हारा मानना होगा कि सच का बोलबाला है
मगर हमने यहाँ झूठे का मुँह काला नहीं देखा
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श्री मनोज अबोध की ग़ज़ल साभार.

3 comments:

रंजना said...

Sarthak सुन्दर रचना...

वीनस केशरी said...

बहुत बढ़िया

एक शब्द में - उम्दा

श्याम कोरी 'उदय' said...

...बहुत सुन्दर, बेहतरीन गजल,बधाई!!!!