Wednesday, March 31, 2010

आदमजात हुए क्यों बौने ?

चांदी-सी रातें, दिल सोने,
फिर भी अपने-अपने रोने।
घर में रहे विदेशी होकर,
सुख-दुःख की खा-खाकर ठोकर।
हो न सके हम नमक ठीक से,
निगल रहे हैं ग्रास अलोने।
झिलमिल कोई सुबह न कौंधी,
सांझ पड़े गहराई रतौंधी।
शादी हुई उधारी वाली,
हो न सके फिर अपने गौने।
अपनी रातें रहीं हुआतीं,
बिला गए दिन संगी-साथी।
चांदी खोटी,खोटे सोने,
आदमजात हुए क्यों बौने ?
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नईम साहब की रचना साभार प्रस्तुत.

4 comments:

अमिताभ मीत said...

शुक्रिया जैन साहब नईम साहब की रचना पढवाने का.

Udan Tashtari said...

आभार,, अच्छा लगा नईम साहेब को पढ़कर!

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

शायद आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर भी हो!
सूचनार्थ!