Saturday, October 4, 2008

मिलेगी एक दिन मंज़िल....!

न जाने दीप कितने रोज़
जलते और बुझते हैं
मगर जो चल रहे हैं लोग
बोलो कब वो रुकते हैं
कभी गर कारवां बन जाए
तो तय है बताऊँ मैं
मिलेगी एक दिन मंज़िल
भले रस्ते बदलते हैं।
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12 comments:

mehek said...

कभी गर कारवां बन जाए

तो तय है बताऊँ मैं

मिलेगी एक दिन मंज़िल

भले रस्ते बदलते हैं।

wah bahut badhiya

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

कभी गर कारवां बन जाए
तो तय है बताऊँ मैं
मिलेगी एक दिन मंज़िल
भले रस्ते बदलते हैं।

manvinder bhimber said...

मिलेगी एक दिन मंज़िल

भले रस्ते बदलते हैं।
बहुत सुन्दर रचना है।

Anil Pusadkar said...

bahut badhiya.

Anil Pusadkar said...

bahut badhiya.

dr. ashok priyaranjan said...

prakhar abhivyakti.

http://www.ashokvichar.blogspot.com

Udan Tashtari said...

बहुत खूब, जैन साहब!!!

गुरतुर गोठ said...

अडबड दिन बाद आपके ब्‍लाग म आयेंव जैन साहब, आपके कबिता मन ला पढ के तो हिरदे गदगद हो जथे, अंतस के भूख अउ बाढ जथे, अइसे लागथे कि जैन साहब ह येला मोरे बर लिखे हे ।

श्रीकांत पाराशर said...

Bilkul sahi kaha- Milegi ek din manzil, bhale hi raste badalte hain. Jain saheb, aapki chhoti hon ya badi, sabhi rachnayen ucchh koti ki hoti hain, badhai.

Dev said...

न जाने दीप कितने रोज़
जलते और बुझते हैं
मगर जो चल रहे हैं लोग
बोलो कब वो रुकते हैं

Really great.....
U have a deep eyes...
http://dev-poetry.blogspot.com/2008/08/blog-post_3922.html

अजित वडनेरकर said...

आमीन.....
विजयादशमी की शुभकामनाएं

shama said...

Pehlee baar aapke blogpe aayee...harek kavita/rachana behad pasand aayee...mukhodgat karneka man hai...Kin, kin alfaazonko dohraunMere blogpe aaneka snehil nimantran detee hun!